सवाल दर सवाल

बसपा, सपाक्स के फैसले से भाजपा को दोहरा फायदा ! राकेश अग्निहोत्री ‘सवाल पर सवाल’ नया इंडिया


  1. सवाल पर सवाल, राकेश अग्निहोत्री, नया इंडिया

 

बसपा, सपाक्स के फैसले से भाजपा को दोहरा फायदा !
हाथी ने छोड़ा हाथ तो क्या भाजश की भूमिका निभाएगा सपाक्स..?

मध्यप्रदेश में पिछले कुछ माह से सवर्णों और आरक्षण समर्थकों ने जो सियासी समीकरण बिगाड़ने का माहौल बनाया था ..उसमें सत्ता में रहते भाजपाअ पने सियासी हित तलाश रही है.. जो यह मानकर चल रही कि सपाक्स के उम्मीदवार चुनाव मैदान में कांग्रेस के अरमानों पर पानी फेर कर यदि भाजपा को फायदा पहुंचाएंगे ..तो कांग्रेस और बसपा की बढ़ती दूरियां भी भाजपा के लिए फायदेमंद साबित होगी जब अनुसूचित जाति वर्ग का वोट बसपा, कांग्रेस और भाजपा में बटेगा.. यानी सरकार के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी का तोड़ सपाक्सअजाक्स समर्थक मतदाताओं में भाजपा निकाल रही है.. और यदि ऐसे में अयोध्याआंदोलन नए सिरे से परवान चढ़ा तो भाजपा सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर इस जाति समीकरण में अयोध्या आंदोलन के नाम पर धर्म का  तड़का लगाकर फिर सत्ता की राह तलाश लेगी ..वह भी तब जब कांग्रेस पिछले तीन चुनाव की तुलना मेंबहुत बेहतर स्थिति पर आकर मध्यप्रदेश में खड़ी हो चुकी है… लगाकर इस बार सपाक्स के चुनाव लड़ने के फैसले के बाद.. बसपा का कांग्रेस से दूरी बनाकर चुनाव लड़ने का ऐलान.. यह सोचने को मजबूर करता है कि आखिर बदलते सियासी परिदृश्य में यह दो फैसले.. किसे, किस हद तक  और कितना नफा-नुकसान पहुंचाएंगे? बसपा सुप्रीमो मायावती ने दिग्विजय सिंह पर गठबंधन नहीं होने का ठीकरा फोड़ते हुए.. कहीं ना कहीं निशाना 2019 को लेकर साधा है.. वह भी राहुल-सोनिया से सहानुभूति जताते हुए.. तो दिग्विजय सिंह पहले ही सपाकस नेता हीरालाल त्रिवेदी को आरोपों के घेरे में खड़ा कर चुके हैं.. और सपाक्स, शक्ति प्रदर्शन के साथ सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुका है.. ऐसे में सवाल खड़ा होना लाजमी है कि पिछले 3 चुनाव में कांग्रेस से दूरी बनाकर विधानसभा चुनाव लड़ने वाली बसपा की इस बार भी दूरियां आखिर कांग्रेस और भाजपा किसे ज्यादा संकट में डालेगी? गठबंधन की कोशिश बसपा से ज्यादा कमलनाथ की कांग्रेस कर रही थी.. तो सवाल यह भी खड़ा होता है कि एट्रोसिटी एक्ट और आरक्षण विरोधी अभियान को लेकर मचे बवाल के बीच मायावती का कांग्रेस पर उसका अस्तित्व खत्म करने का गंभीर आरोप चुनाव में क्या गुल खिलाएगा? तो इससे पहले सवाल सपाक्स के समर्थन में आए सवर्ण जातियोंखासतौर से ब्राह्मण, बनिया, ठाकुर आखिर किसका नुकसान करेंगे? यह वर्ग सत्ता में रहते भाजपा के खिलाफ आग उगल रहा है.. लेकिन इस बात की गारंटीकौन ले सकता है कि भाजपा से नाराज है तो यह कांग्रेस के समर्थन में खड़ा होगा? बड़ा सवाल क्या सपाक्स का जोश चुनाव आते-आते खत्म हो जाएगा? या फिर 2008 विधानसभा चुनाव में संगठन भारतीय जनशक्ति की भूमिका में नजर आएगा?जब नाराज वोटर्स की बढ़त कांग्रेस हासिल नहीं कर पाई थी.. तो सवाल यह भी खड़ा होता है कि भाजपा और संघ आरक्षण एट्रोसिटी एक्ट के दम पर खुद कोअनुसूचित जाति-जनजाति का मसीहा पेश कर रही, ऐसे में क्या मायावती और राहुल गांधी के बिगड़ते रिश्ते का खामियाजा कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में भुगतना पड़ेगा..

जब संघ प्रमुख मोहन भागवत और साधु-संत अयोध्या में मंदिर निर्माण का
मुद्दा फिर गरमाने में जुटे हैं.. तब लोकसभा चुनाव से पहले मध्यप्रदेश
विधानसभा चुनाव के लिए फिलहाल 2 बड़े फैसले गौर करने लायक हैं.. पहला
कर्मचारी-अधिकारी संगठन सपाक्स का सभी सीटों पर विधानसभा चुनाव लड़ना और
दूसरा गठबंधन की कोशिशों को बड़ा झटका देते हुए बसपा का कांग्रेस से दूरी
बनाकर अकेले चुनाव लड़ना.. सवाल यही पर खड़ा होता है कि क्या यह फैसले
सवर्णों और गैर सवर्णों के बीच छिड़ी आंदोलन की जंग के चलते चुनाव में
जातीय समीकरणों को प्रभावित करेंगे? दूसरा बड़ा सवाल क्या गठबंधन की
सियासत ने मिशन 2019 लोकसभा चुनाव से पहले महागठबंधन की हवा निकालकर जिन
नए समीकरणों को जन्म दिया है क्या उससे भाजपा मोदी और शाह को राहत
मिलेगी? या फिर गुत्थी इतनी उलझ गई है कि यह सब नहीं होगा.. पहले बड़े
फैसले पर गौर किया जाए तो सपा ने एन चुनाव के पहले जो माहौल बनाया उसकी
उम्मीद इस संगठन के जिम्मेदार पदाधिकारियों को भी नहीं थी.. तो आम जनता
में यही धारणा थी कि नेतृत्व विहीन सपाक्स चुनाव में कोई फैक्टर नहीं
होगा.. आंदोलन और बगावत के सुर चुनाव से मतदान तक मध्यप्रदेश में देखने
को मिलते रहेंगे.. यह कहना फिलहाल जल्दबाजी होगी.. किंतु, परंतु और
कयासबाजी पर यदि गौर करें तो सपाक्स संगठन ने ब्राह्मण, ठाकुर के साथ उस
ओबीसी वोट बैंक को भी साधने की कोशिश की है, जो एक साथ मिलकर पिछले तीन
चुनाव में भाजपा को बढ़त दिलाते रहे.. जिसे भाजपा अपना परंपरागत वोट भी
मान बैठी है.. उसकी वजह अयोध्या आंदोलन, राम मंदिर और दूसरे कारण हो सकते
हैं.. लेकिन सपाक्स की चुनाव में मौजूदगी यदि सुनिश्चित हुई और जाने
पहचाने चेहरों ने एन टाइम पर संगठन से दूरी बनाकर भाजपा और कांग्रेस से
संपर्क नहीं किया.. तो सपाक्स उम्मीदवार क्या अपने दम पर चुनाव जीत
पाएंगे? या फिर नुकसान पहुंचाएंगे? तो ज्यादा किसको भाजपा या कांग्रेस
को.. सत्ता के खिलाफ मोदी और शिवराज से यह वर्ग यदि नाराज नजर आ रहा तो
सवाल यहीं पर खड़ा होता है कि माई का लाल खुद को बता कर सवर्ण मतदाता
क्या बड़ी संख्या में भाजपा को सबक सिखाने के लिए कांग्रेस और राहुल
गांधी के बारे में खड़ा नजर आएगा.. राहुल ने कैलाश मानसरोवर से लौटकर और
हिंदू समर्थक नेता की इमेज बनाने में काफी हद तक सफल रहे हैं.. सपाक्स ने
पिछले दिनों राजधानी भोपाल में डेरा डालकर कलियासोत मैदान से अपनी ताकत
का इजहार किया था.. तो सरकार से नाराज और आरक्षण विरोधियों को भरोसा है
कि आचार संहिता लगने के बाद सपाक्स समर्थक भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों
के लिए ज्यादा सिर दर्द साबित हो सकते हैं.. जिन पर प्रशासन की सख्ती
फिलहाल देखी जा सकती है.. सवाल यह भी क्या सपाक्स का आंदोलन जिसमें भाजपा
कार्यकर्ता नेता भी शामिल नजर आए कहीं परदे के पीछे इसे संघ का समर्थन तो
हासिल नहीं था… सवाल यह भी खड़ा होता है कि सपाक्स समर्थक सवर्णों के
विरोध में ना सिर्फ सामने, बल्कि आरक्षण विरोधियों की जमकर खैर खबर लेने
वाली मायावती और उनकी बसपा की कांग्रेस से गठबंधन खत्म हो जाने का असर
चुनाव की इस बेला पर कितना पड़ेगा.. मायावती ने जिस तरह सांसद और पूर्व
मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के सिर पर ठीकरा फोड़कर मध्यप्रदेश में अकेले
चुनाव लड़ने का ऐलान किया है वह निश्चित तौर पर भाजपा को राहत देने वाला
तो कांग्रेस की चिंता बढ़ाने के लिए काफी है.. मायावती ने सोनिया गांधी
और राहुल गांधी से सद्भाव बनाए रखने के संकेत देते हुए कांग्रेस पर बसपा
को खत्म कर देने का गंभीर आरोप भी लगाया है.. यह स्थिति उस वक्त निर्मित
हुई जब दिग्विजय सिंह ने मायावती पर सीबीआई के दबाव के चलते गठबंधन नहीं
करने का आरोप लगाया… मध्यप्रदेश की राजनीति में इससे पहले भी कांग्रेस
और बसपा कभी गठबंधन के साथ चुनाव नहीं लड़े.. लेकिन भाजपा के मुकाबले
बसपा कांग्रेस के ज्यादा करीब नजर आती है.. मायावती कुछ दिन पहले
छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी के साथ गठबंधन बनाकर चुनाव में जाने के संकेत दे
चुकी थीं और शायद उन दबाव बढ़ रहा था कि जल्द वह सभी उम्मीदवार घोषित
करें और इसी तारतम्य में 22 सीटों के उम्मीदवार घोषित किए जा चुके हैं..
मायावती कर्नाटक चुनाव के बाद सोनिया गांधी और राहुल गांधी के साथ एक मंच
पर बहुत करीब नज़र आई थीं तो उत्तर प्रदेश के कैराना-गोरखपुर उपचुनाव में
रणनीति के तहत सपा को सपोर्ट कर उन्होंने महागठबंधन मजबूत बनाने के संकेत
दिए थे.. सवाल यहीं पर खड़ा होता है कि क्या मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव
अकेले लड़ने का ऐलान कर मायावती ने 2019 को ध्यान में रखते हुए सोनिया और
राहुल पर दबाव बनाया है कि वह सम्मानजनक समझौते का रास्ता निकालें.. नहीं
तो विधानसभा के बाद लोकसभा चुनाव में भी यही स्थिति निर्मित होगी.. वह
बात और है कि उत्तर प्रदेश चुनाव को ध्यान में रखते हुए अखिलेश लगातार
मायावती से संपर्क बनाकर एक स्पष्ट और समन्वयवादी समझौते की गुंजाइश
तलाशते रहे.. अखिलेश ने मध्यप्रदेश में गठबंधन टूटने पर चिंता जताई और
उम्मीद जताई कि कांग्रेस बड़ा दिल दिखाए.. लेकिन मध्यप्रदेश विधानसभा
चुनाव को लेकर बसपा का कांग्रेस से दूर अकेले चुनाव लड़ना इस माहौल में
किसे ज्यादा नुकसान पहुंचाएगा.. सवाल यह भी खड़ा होता है कि एट्रोसिटी
एक्ट आरक्षण के मुद्दे पर भाजपा ही नहीं संघ की बार-बार सफाई किस वर्ग के
मतदाताओं को कमल खिलाने को मजबूर करेगी और क्या कांग्रेस से दूरी बनाएगा
या फिर भाजपा और कांग्रेस दोनों को सबक सिखाने के लिए अनुसूचित जाति के
वोटर मायावती के साथ होगे… कांग्रेस बदलती रणनीति के तहत मायावती जिससे
सपाक्स ने सवर्ण वोट को भाजपा से दूर रखने की योजना बनाई क्या वह
कांग्रेस के नजदीक पहुंचेगा..सवाल यह भी खड़ा होता है कि क्या नाराज
सवर्ण मतदाता नोटा या फिर सपाक्स  और कांग्रेस उम्मीदवारों का समर्थन कर
बिखर जाएगा.. यदि  चुनाव के दौरान अयोध्या में मंदिर निर्माण का मामला
गर्म आता है  तो भाजपा का यह परंपरागत वोट बैंक पार्टी की ओर लौटेगा  या
फिर सपाक्स और कांग्रेस के साथ  खुद को ज्यादा कंफर्टेबल महसूस करेगा
…मान भी लिया जाए कुछ भी हो सकता तो  होगा.. लाख टके का सवाल यह है कि
इसका सीधा फायदा सत्ताधारी भाजपा को होगा.. जो नुकसान  नाराज मतदाता
कांग्रेस की बढ़त बढ़ाकर भाजपा और शिवराज का कर सकते थे.. वह संभव नहीं
होगा.. क्या 2008 में जो भूमिका उमा भारती की भारतीय जनशक्ति ने शिवराज
और भाजपा के वोट बैंक काटकर बनाई थी.. सपाक्स उसी लाइन पर आगे बढ़ाते हुए
नजर आएगा.. इसीलिए भाजपा निश्चित है.. उस वक्त भी कांग्रेस और बसपा के
बीच ना तो गठबंधन हुआ था और ना ही दूसरे दल खुलकर भाजपा विरोध के साथ
कांग्रेस के बगल में खड़े नजर आए थे.. तो सवाल सपाक्स की मौजूदगी और बसपा
की कांग्रेस से गठबंधन की संभावनाओं पर पूर्ण विराम लगने के बाद क्या
भाजपा राहत महसूस कर रही होगी.. जो राज्य के साथ केंद्र में काबिज है और
प्रबंधन के इस दौर में उसकी नजर उन चेहरों पर पहले ही लग चुकी है, जो
किसी भी संगठन से जुड़े हों.. लेकिन भाजपा के पाले में लाया जा सकता है..
तो क्या इसके लिए शिक्षाकर्मियों की लड़ाई और आंदोलन करने वाले मुरलीधर
पाटीदार को भाजपा का टिकट मिलने से जोड़कर देखा जा सकता है.. तो सवाल
नेतृत्व विहीन सपाक्स क्या चुनाव आचार संहिता लगने के बाद ज्यादा आक्रामक
होगा.. या फिर चुनाव आते-आते  प्रबंधन और अर्थ  की जरूरतों की कमी में
यह आंदोलन बिखर जाएगा…या भाजपा ही नहीं कांग्रेस की भी परेशानी
बढ़ाएगा.. सपा-बसपा जो उत्तर प्रदेश में नजदीक आए वह भी मध्यप्रदेश में
अलग-अलग मैदान में मोर्चा खोलने वाले हैं.. मायावती की बसपा को अजाक्स का
समर्थन मिलना चाहिए.. लेकिन सवाल यह भी क्या एट्रोसिटी एक्ट और आरक्षण के
बढ़ते विवाद के बाद कांग्रेस भी मायावती और बसपा से दूरी बनाने का विकल्प
खोलकर चल रही थी.. जिससे अब बदलते सियासी परिदृश्य में बसपा और कांग्रेस
के बीच फ्रेंडली मुकाबले की भी संभावनाओं पर पूर्ण विराम लग जाएगा..