सवाल दर सवाल

ओपिनियन पोल ः तो क्या कांग्रेस के अच्छे दिन आएंगे… राकेश अग्निहोत्री’ सवाल पर सवाल नया इंडिया

सवाल दर सवाल, राकेश सिंह उतरी नया इंडिया
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ओपिनियन पोल ः तो क्या कांग्रेस के अच्छे दिन आएंगे…

वसुंधरा और रमन के मुकाबले शिवराज साबित होंगे गैंम चैंजर?
नरेंद्र मोदी की केंद्र में सरकार बनने के बाद भाजपा शासित गुजरात के बाद.. लोकसभा चुनाव से पहले राजस्थान के मुकाबले मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में यदि मुकाबला कांटे का नजर आ रहा है.. तो सवाल खड़ा होना लाजमी है कि क्या सत्ता हाथ से जाने की वजह सिर्फ राज्य सरकार के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी है.. या फिर मोदी सरकार के साइड इफेक्ट.. चुनावी गणित को गड़बड़ा रहे हैं.. क्योंकि  मध्य प्रदेश पहुंचे अमित शाह ने  यह कहकर फिर चौंका दिया  किया चुनाव सीएम मंत्री और विधायक का नहीं  बल्कि राष्ट्रीय अध्यक्ष और उसके कार्यकर्ताओं का है …तो क्या मोदी की नेतृत्व क्षमता के दम पर छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में 15 साल से सत्ता में रहते भाजपा के लिए फिलहाल संभलने का मौका नजर आ रहा है.. गुजरात में कांटे की टक्कर में भाजपा की वापसी हो चुकी है, लेकिन वसुंधरा राजे सरकार के लिए मोदी का नेतृत्व ताकत साबित होता हुआ नजर नहीं आ रहा.. एकतरफा मुकाबले में भाजपा बहुत पीछे खड़ी है.. अलबत्ता छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में कांग्रेस की बढ़त को भाजपा चुनौती मानने को तैयार नहीं है.. तो सवाल यहीं पर खड़ा होता है कि जिन राज्यों में भाजपा की सरकार नहीं थी यदि मोदी और शाह के नेतृत्व में वहां कमल खिला और गठबंधन के साथ सरकार बनाने में वह सफल रही.. तो क्या कर्नाटक के बाद भाजपा की कमजोरियां राज्य सरकार की नई चुनौती बनकर सामने हैं.. खासतौर से जहां वह सत्ता में है तो फिर सवाल क्या इसे बुलंद हौसले और आक्रमक प्रचार के साथ राहुल गांधी की सियासत में मजबूत होती पकड़ मानी जाए.. जो मोदी विरोधी क्षेत्रीय दलों के मुकाबले इन दिनों सीधे प्रधानमंत्री को चुनौती दे रहे हैं और रफेल के मुद्दे ने उनकी स्वीकार्यता ही नहीं, समझ को भी सामने ला दिया है.. वह बात और है कि महागठबंधन की मजबूती के लिए जरूरी समन्वय-सामंजस्य बनाने में राहुल गांधी सफल नहीं हो पाए.. तो फिर सवाल क्या मध्यप्रदेश में शिवराज को सिंधिया और नाथ की जोड़ी भले ही चुनौती नहीं दे पा रही.. लेकिन राहुल गांधी की एंट्री से न सिर्फ शिवराज पिछड़ गए.. बल्कि मोदी और शाह चाहकर भी उन्हें उस तौर पर स्थापित नहीं कर पा रहे.. जैसा 2013 और 2008 विधानसभा चुनाव में शिवराज नजर आ चुके हैं.. तो बड़ा सवाल क्या इसके लिए शिवराज से ज्यादा मोदी सरकार के विवादित फैसले जिम्मेदार हैं.. या फिर राहुल, कमलनाथ और सिंधिया मध्यप्रदेश के मतदाताओं का शिवराज से मोहभंग कराने के अपने प्रयास में सफल होते हुए नजर आ रहे हैं.. सवाल कहीं ना कहीं कांग्रेस और बसपा की भीड़, बढ़ती दूरियां तो शिवराज के कौन माई के लाल से लेकर मोदी सरकार के एट्रोसिटी एक्ट को लेकर खड़े हो चुके और भाजपा की ताकत और उसका विश्वास का केंद्र सिर्फ शिवराज बनकर रह गए.. तो लाख टके का सवाल जीत की हैट्रिक लगा चुकी भाजपा क्या मध्यप्रदेश में चुनाव की तारीख के ऐलान के बाद कांग्रेस को मात दे पाएगी तो कैसे.. वह कौन सा फार्मूला होगा क्या टिकट वितरण में निष्पक्षता सरकार के खिलाफ इस मामूली एंटी इनकंबेंसी के संदेश को एक नई दिशा दे सकेगी या फिर मध्यप्रदेश में कांग्रेस के अच्छे दिन आने वाले हैं…

विधानसभा चुनाव की तारीखें घोषित होने के बाद सामने आए.. एबीपी न्यूज के ओपिनियन पोल में राजस्थान और छत्तीसगढ़ के मुकाबले मध्यप्रदेश को भले ही बेहतर माना गया.. लेकिन तीनों राज्यों में कांग्रेस की सत्ता में वापसी के संकेत दिए जा रहे हैं.. भाजपा की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया बड़े अंतर से मुकाबले से बाहर नजर आ रही  तो रमन सिंह कांटे की लड़ाई में पिछड़ गए.. जब चुनावों की तारीखें घोषित हो रही थीं तब बीजेपी और कांग्रेस के दिग्गज नेता एक-दूसरे को निशाने पर ले रहे थे.. मध्यप्रदेश में कांग्रेस बेहतर होने के बावजूद शिवराज इस ओपिनियम के मुताबिक यह साबित करते हुए देखे जा सकते हैं कि 15 साल की जो एंटी इनकंबेंसी किसी सरकार के लिए मुसीबत बन सकती है.. शिवराज की लोकप्रियता के मुकाबले ज्योतिरादित्य ने कमलनाथ के मुकाबले भले ही बढ़त बना रखी हो लेकिन वह भी व्यक्तिगत स्तर पर काफी पीछे हैं.. वह बात और है कि शिवराज और भाजपा से नाराज साधु संत कमलनाथ को अगला मुख्यमंत्री का आशीर्वाद दे रहे हैं और सिंधिया सर्वे और ओपिनियन पोल में कांग्रेस  की अंदरूनी राजनीति में उनसे बहुत आगे है.. जहां तक बात अमित शाह के बयान की तो लगता है राष्ट्रीय नेतृत्व यह मानकर चल रहा है कि विधायक मंत्री ही नहीं मुख्यमंत्री के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी मोदी के मिशन उन्हें इस पर पानी फेर सकती है इसलिए अमित शाह ने खुद को कार्यकर्ता से जोड़कर इस चुनाव कॉलोनी का आवाहन किया ..तो क्या शिवराज इस एंटी इनकंबेंसी को नरेंद्र मोदी और अमित शाह के दम पर डिसाइडिंग फैक्टर नहीं बनने देंगे.. क्या इस कांटे के मुकाबले की वजह शिवराज सरकार की उपलब्धियां, मोदी सरकार की धमक और अमित शाह का प्रबंधन ही है.. या फिर चेहरा और नेतृत्व विहीन नाथ-सिंधिया की गफलत में उलझी कांग्रेस और उसका भाजपा के मुकाबले कमजोर संगठन.. शिवराज को ताकत देकर मैदान में वसुंधरा और रमन सिंह के मुकाबले खड़ा किए हुए है.. सवाल यह भी खड़ा होता है कि कांग्रेस इस स्थिति में यदि दो कदम आगे दिख रही है तो क्या इसका श्रेय राहुल गांधी के नेतृत्व को जाता है.. जिन्होंने राफेल जैसे मुद्दे पर मोदी को सीधे निशाने पर लेकर मध्यप्रदेश के कार्यकर्ताओं में एक ऐसा जोश भर दिया है, जो गुटबाजी भूलकर सत्ता का वनवास खत्म करने के लिए मोर्चा खोल चुके हैं.. क्या इस ओपिनियन पोल के सामने आने के बाद अब प्रचार के दौरान सीधा मुकाबला नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के बीच आकर सिमट जाएगा.. या फिर इस बार फिर कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया, दिग्विजय सिंह, अरुण यादव, सुरेश पचौरी, सत्यव्रत चतुर्वेदी जैसे क्षत्रप जो कभी कमजोर कड़ी साबित होते रहे हैं.. अब बेहतर समन्वय के दम पर मजबूत और निर्णायक साबित होंगे.. क्योंकि मध्यप्रदेश में भाजपा पिछले 2 महीने से शिवराज और उनकी जनआशीर्वाद यात्रा पर फोकस बनाए हुए है.. इस दौरान अमित शाह जबलपुर, उज्जैन और भोपाल में एक बार फिर मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री शिवराज को बनाए जाने का ऐलान करने को मजबूर हुए.. जिन्होंने भोपाल में ही कहा था कि इस बार चुनाव कार्यकर्ता लड़ेगा.. तब यह संदेश गया कि शिवराज के चेहरे से राष्ट्रीय नेतृत्व दूरी बना रहा है.. लेकिन रमन सिंह, वसुंधरा और शिवराज तीनों को पार्टी ने अपना मुख्यमंत्री का दावेदार बताया.. मध्यप्रदेश में शिवराज के करीबी रहे नंदकुमार सिंह चौहान को हटाकर राकेश सिंह को भाजपा का नया प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था.. तो सवाल यहीं पर खड़ा होता है कि 15 साल की भाजपा सरकार के खिलाफ यदि एंटी इनकंबेंसी के चलते कोई विरोध में लहर नहीं है तो इसकी वजह क्या शिवराज की स्वीकार्यता, मेहनत की पराकाष्ठा, उनकी विनम्रता, सरकार की उपलब्धियां हैं या फिर कांग्रेस की कमजोरियों के कारण वह वसुंधरा के मुकाबले बहुत ज्यादा मजबूत बने हुए हैं.. सवाल मोदी सरकार के एट्रोसिटी एक्ट में बदलाव के मध्यप्रदेश में साइड इफेक्ट को लेकर भी खड़े हो रहे हैं.. तो पदोन्नति में आरक्षण जैसे ज्वलंत मुद्दे पर सपाक्स संगठन का चुनाव लड़ने का ऐलान ही नहीं, बल्कि बहुत कम अंतर से कांग्रेस की बढ़त को मायावती की राहुल गांधी और कमलनाथ से बढ़ती दूरियां क्या प्रभावित करंेगी तो कितना.. यह सवाल मायने रखता है.. अमित शाह के मालवा दौरे के दौरान सपाक्स समर्थकों का विरोध प्रदर्शन और पुलिस द्वारा उनकी गिरफ्तारी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.. तो अखिलेश यादव ने भी कांग्रेस से दूरी बनाकर सपा के चुनाव मैदान में जाने का ऐलान कर दिया है.. कह सकते हैं कि शिवराज के खिलाफ वह माहौल कम से कम न्यूज चैनल का ओपिनियन पोल नहीं बता रहा है.. जो कांग्रेस की राह आसान कर देता.. चुनाव की तारीखें घोषित होने पर यह माहौल शिवराज और भाजपा के लिए संभलने का मौका.. ओपिनियन पोल के मुताबिक भाजपा शासित तीनों राज्यों में कांग्रेस सत्ता में वापसी कर रही लेकिन लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी इन राज्यों में भी भाजपा की बढ़त बनाए हुए हैं.. तो सवाल कांग्रेस के लिए अपने कुनबे को एकजुट रखते हुए भाजपा विरोधियों के साथ फ्रेंडली मुकाबले की स्थिति निर्मित कर अपनी बढ़त बरकरार रखने का अवसर साबित हो सकता है.. क्योंकि ओपिनियन पोल में बीजेपी को 108 तो कांग्रेस को 122 सीटें दी गईं.. छत्तीसगढ़ में बीजेपी को 40 तो कांग्रेस को 47 सीट देते हुए अन्य के खाते में 3 सीट गईं तो राजस्थान में बीजेपी 56 तो कांग्रेस 142 और 2 अन्य के साथ इन तीनों राज्यों में सत्ताधारी भाजपा के खिलाफ कांग्रेस का सियासी वनवास खत्म होता हुआ दिखाया गया है..