सवाल दर सवाल

मायावती की प्रेशर तो शिवराज की लिबरल पॉलिटिक्स ! राकेश अग्निहोत्री ‘सवाल दर सवाल’ नया इंडिया

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मायावती की प्रेशर तो शिवराज की लिबरल पॉलिटिक्स !

(विधानसभा चुनाव तो बहाना बहन जी का असली निशाना लोकसभा)

कौन माई के लाल  से नाराज सवर्णों को  शिवराज राज ने दी बड़ी राहत)

बसपा सुप्रीमो मायावती का उत्तरप्रदेश की धरती से मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ के चुनाव के लिए उम्मीदवारों के ऐलान और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा के साथ एससीएसटी एक्ट में बिना जांच के किसी की गिरफ्तारी नहीं किए जाने का भरोसा दिलाए जाने से कई सवाल खड़े हो गए.. मध्यप्रदेश की राजनीति में इन घोषणाओं का से क्या नाराज समन मतदाता भाजपा के साथ फिर लौटेंगे और खासतौर से मायावती के प्रभाव वाले अनुसूचित जाति के मतदाता भाजपा से ज्यादा सीधे तौर पर कांग्रेस को नुकसान पहुंचाएंगे क्योंकि मायावती ने राहुल गांधी और कमलनाथ की कांग्रेस से दूरी बना ली है…सवाल बसपा का क्या कांग्रेस से बहनजी का मोह भंग हो चुका है..? और दिखाने के लिए मोदी भाजपा और संघ उनके निशाने पर हैं? क्या लोकसभा चुनाव के लिए महागठबंधन की संभावनाओं को खुद मायावती ने पलीता लगा दिया या फिर यह बसपा सुप्रीमो की प्रेशर पॉलिटिक्स है.. जो उन्होंने छत्तीसगढ़ में कांग्रेस से निष्कासित अजीत जोगी के साथ गठबंधन बनाकर चुनाव लड़ने का ऐलान किया.. तो मध्यप्रदेश में सिर्फ 22 सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए.. सवाल ये भी खड़ा होता है कि मायावती के इस फैसले से मोदी-शाह और भाजपा क्या राहत महसूस कर रहे हैं और बसपा ने कांग्रेस को बड़ा झटका देते हुए अपनी लाइन नए सिरे से तय कर ली है.. जो उत्तरप्रदेश में सपा से गठबंधन की संभावनाओं को सम्मानजनक समझौते से जोड़ती रही हैं? बड़ा सवाल ये खड़ा होता है कि क्या कमलनाथ की कोशिश विफल रही तो फिर इसकी वजह क्या है? क्या सिर्फ बात सीटों की संख्या और समझौते की या फिर इसके पीछे कोई और बड़ी वजह रही या फिर कमलनाथ की कांग्रेस पर नए सिरे से सारे विकल्प को ध्यान में रखते हुए सोचने का दबाव है..? सवाल यह भी खड़ा होता है क्या यह बसपा सुप्रीमो की प्रेशर पॉलिटिक्स या फिर कांग्रेस बसपा के बीच फ्रेंडली मुकाबले की स्क्रिप्ट का हिस्सा है और असली पटकथा का अभी इंतजार करना चाहिए..
— मध्य प्रदेश की सियासत में जब आरक्षण और SC ST एक्ट समर्थक और विरोधियों ने कांग्रेस और भाजपा दोनों की नाक में दम कर रखा है तब शिवराज सिंह चौहान ने सरमन मतदाताओं का भरोसा बरकरार रखने के लिए यह ऐलान कर दिया कि मध्य प्रदेश में एससी एसटी एक्ट के नए स्वरूप के बावजूद बिना जांच के कोई गिरफ्तारी नहीं होगी.. तो क्या इससे बसपा समर्थक अनुसूचित जाति का मतदाता भाजपा उस शिवराज से कहीं नाराज तो नहीं हो जाएगा यह वह मतदाता है जो कभी कांग्रेस का परंपरागत वोट रहा लेकिन मायावती और भाजपा के साथ चला गया था अब जब बसपा सुप्रीमो ने कांग्रेस से दूरी बढ़ाते हुए मध्यप्रदेश में अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है तो फिर अनुसूचित जाति का वोटर क्या बसपा के साथ खड़े होकर कांग्रेस को नुकसान पहुंचाएगा.. भाजपा शिवराज और मायावती दोनों के इस बयान में अपना फायदा ज्यादा ढूंढ रही है.. तो सवाल यह भी खड़ा होता है 25 सितंबर को जब नरेंद्र मोदी और अमित शाह जंबूरी मैदान से कार्यकर्ता महाकुंभ में चुनाव का शंखनाद करेंगे तब वह संसद में संशोधित कानून के नाम पर वर्ग विशेष को लुभाने की कोशिश करेंगे या फिर शिवराज की इस नई लाइन पर अपनी सहमति देंगे सवाल यह भी खड़ा होता है.. क्या शिवराज ने मोदी को भरोसे में लेकर यह घोषणा की है या फिर दिल्ली में खत्म हुए भविष्य के भारत सेमिनार में संघ प्रमुख मोहन भागवत की लाइन को आगे ..उन्होंने मध्यप्रदेश में बढ़ा दिया है लेकिन संवैधानिक तौर पर क्या यह संभव है और राज्य सरकार को इसकी छूट मिलेगी..
बसपा ने जिन 22 उम्मीदवारों के नामों का ऐलान किया है.. उनमें अनुसूचित जाति के लिए 6 तो अनुसूचित जनजाति के लिए 5 सीट आरक्षित हैं, जबकि सामान्य वर्ग से 11 उम्मीदवार उतारे हैं.. इनमें बसपा के चार वर्तमान विधायकों में से 3 को टिकट दिया गया है, जबकि दिमनी से बलवीर सिंह दंडोतिया का नाम इस सूची में नहीं है.. यदि क्षेत्र विशेष पर गौर किया जाए तो विंध्य, ग्वालियर, चंबल और बुंदेलखंड जहां बसपा का दखल रहा.. सबसे पहले उम्मीदवारों के चेहरे सामने ला दिए.. जहां कांग्रेस और भाजपा से सीधे दो-दो हाथ उसे करना होगा.. तो उत्तरप्रदेश में जिस समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन बनाकर सम्मान के साथ आगे बढ़ने की बात मायावती कहती रही हैं.. उस समाजवादी पार्टी का भी इनमें से कुछ सीटों पर हस्तक्षेप से इनकार नहीं किया जा सकता.. मायावती और बसपा के प्रदेश अध्यक्ष के बयान समय के साथ कांग्रेस पर दबाव बनाने की कोशिश से जोड़कर देखे जाते रहे हैं.. कुछ दिन पहले ही कमलनाथ ने बसपा के साथ कांग्रेस के गठबंधन को अंतिम रूप दिए जाने की बात कही थी, लेकिन सवाल ये भी खड़ा होता है कि छत्तीसगढ़ में बसपा ने अजीत जोगी की पार्टी से समझौता करके क्या भाजपा से ज्यादा कांग्रेस की जड़ों में मट्ठा डालने का प्रबंध कर दिया है, जबकि मायावती लखनऊ और दिल्ली से मोदी सरकार को हराने की कसमें खाती रही हैं.. छत्तीसगढ़ की सियासत से दूर मध्यप्रदेश में बसपा का दखल रहा है, लेकिन सीमित क्षेत्र तक अब पार्टी की ओर से जोर देकर प्रचारित किया जा रहा है कि वह मध्यप्रदेश की सभी विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़ा करेगी… तो क्या ये मान लिया जाए कि मध्यप्रदेश के लिए उम्मीदवारों की पहली सूची का मतलब प्रेशर पॉलिटिक्स है और कांग्रेस पर दबाव बनाने में मायावती सफल रहीं.. लोकसभा चुनाव से पहले जिन तीन राज्यों में भाजपा काबिज है उनमें मध्यप्रदेश भी शामिल है और जिस भाजपा को पानी पी-पीकर मायावती कोसती रही हैं वहां गठबंधन की संभावनाओं पर विराम लगाते हुए बसपा ने क्या भाजपा को मजबूत होने का मौका नहीं दे दिया..? त्रिकोणीय मुकाबले में नुकसान कांग्रेस का होना तय है.. फिर भी यदि राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो ये सब कुछ अंतिम नहीं है और इंतजार करना चाहिए.. कहीं ये कांग्रेस और बसपा के बीच फ्रेंडली मुकाबले की पटकथा की पहली कड़ी तो नहीं है.. यदि ऐसा है तो क्या कांग्रेस एससी-एसटी और सवर्णों के बढ़ते आंदोलन से भयभीत है, जो वो मायावती से दूरी बनाने को मजबूर हुई है.. या फिर कांग्रेस की रणनीति आरक्षण समर्थकों की पैरोकार बसपा से दूरी बनाते हुए भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले सवर्ण मतदाताओं को रिझाने की है.. और शायद यही वजह है कि बसपा से नजदीकियां बढ़ाने से ज्यादा दिलचस्पी दूरी बनाने में उसने ली है.. या फिर कमलनाथ मायावती की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पाए.. चाहे फिर बात सीट शेयरिंग की हो या फिर हिडन एजेंडे की.. जहां तक बात मायावती की है तो उत्तरप्रदेश से बाहर पिछले दिनों कर्नाटक में एचडी कुमारस्वामी की जेडीए से समझौता करके अपना विधायक उन्होंने विधानसभा में पहुंचाया था.. जहां कांग्रेस और भाजपा दोनों मुकाबले में थे.. तो क्या कुमारस्वामी की तरह छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी उनकी पसंद बनकर सामने आए हैं तो मध्यप्रदेश में क्या उत्तर प्रदेश से ही ताल्लुक रखने वाले अखिलेश यादव और सपा से भी गठबंधन की संभावनाएं मध्यप्रदेश में खत्म मान ली जाएं..? सवालों की फेहरिस्त में क्या इस बात की भी गुंजाइश बनती है कि छत्तीसगढ़ से लगी सीटों पर अजीत जोगी भी बसपा के साथ मिलकर मध्यप्रदेश में अपने उम्मीदवार उतारें तो सवाल ये भी खड़ा होता है कि क्या ये गठबंधन लोकसभा चुनाव तक चलेगा या फिर कोई और फार्मूले के साथ दोनों सामने आ सकते हैं? आखिर मायावती के निशाने पर फोन भाजपा या फिर कांग्रेस क्योंकि मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़ में उनके उम्मीदवार की मौजूदगी से भाजपा को कम कांग्रेस को ज्यादा नुकसान होने से इनकार नहीं किया जा सकता है.. सवाल यह भी खड़ा होता है कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस से यदि बसपा दूरी बनाती है तो क्या सपा और बसपा जैसे उम्मीदवार दबाव बनाने में सफल होंगे या फिर कांग्रेस ने मिशन 2019 को ध्यान में रखते हुए इन तीन राज्यों में भाजपा से सीधे मुकाबले में महागठबंधन से जुड़ने वाले संभावित राजनीतिक दलों को संदेश दे दिया है कि मोदी के खिलाफ विपक्ष की एकजुटता नहीं होने का खामियाजा सिर्फ कांग्रेस नहीं बल्कि राज्यों की राजनीति में सक्रिय क्षेत्रीय दलों को भुगतने के लिए तैयार रहना होगा क्योंकि कांग्रेस इन दोनों का दबाव लोकसभा चुनाव को लेकर है और इन विधानसभा चुनाव में यदि कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के दबाव में आ गई तो फिर लोकसभा चुनाव में सीट शेयरिंग पर दूसरे दलों का दबाव ज्यादा बढ़ सकता है..