सवाल दर सवाल

‘मोदी सरकार’ ताकत बनेगी या ‘शिवराज की कमजोरी’ राकेश अग्निहोत्री ‘सवाल दर सवाल’ नया इंडिया

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‘मोदी सरकार’ ताकत बनेगी या ‘शिवराज की कमजोरी’

 

(राहुल गांधी का रोड शो क्या मोदी शाह और शिवराज के महाकुंभ का एजेंडा बदल देगा..?)
मोदी सरकार में नोटबंदी फेल होने और जीएसटी से व्यापारियों की बढ़ती नाराजगी के बीच.. पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों से.. जब चुनावी साल में भाजपा डैमेज कंट्रोल को मजबूर हुई.. तब राफेल सौदे और विजय माल्या-अरुण जेटली कनेक्शन ने मोदी-शाह की समस्या में इजाफा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है.. बीजेपी की सबसे पराक्रमी यह जोड़ी भले ही मिशन 2019 को लेकर सक्रिय हो गई हों, लेकिन भाजपा की सबसे बड़ी चिंता सेमीफाइनल माने जाने वाले राजस्थान, छत्तीसगढ़, मिजोरम के साथ मध्यप्रदेश विधानसभा के चुनाव को लेकर बढ़ गई है.. जहां शंखनाद करने के लिए कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी खुद 17 सितंबर को भोपाल आ रहे हैं.. वो भी तब जब भाजपा का पूरा फोकस अमित शाह का दौरा स्थगित किए जाने के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की जनआशीर्वाद यात्रा पर है.. ऐसे में सवाल खड़ा होना लाजमी है कि कैलाश मानसरोवर यात्रा से लौटने के बाद विजय माल्या-अरुण जेटली की मुलाकात और राफेल सौदे पर कांग्रेस का आक्रामक रुख क्या मिशन 2018 विधानसभा चुनाव के लिए अच्छा संकेत माना जाएगा? बड़ा सवाल राहुल गांधी मोदी और शाह के 25 सितंबर के भोपाल दौरे से पहले अपने रोड शो और सभा के दौरान क्या संघ पर अपने हमले जारी रखते हुए भाजपा में मोदी-शाह और अरुण जेटली की तिकड़ी पर सीधा निशाना साधकर भाजपा के अंदर अलग-थलग करने की कोशिश करते हुए नजर आएंगे.. लगभग उसी स्टाइल में जैसे भाजपा के निशाने पर सोनिया, राहुल और प्रियंका हैं..? फिर भी यह सवाल मौजू है ..क्या मोदी सरकार शिवराज की ताकत बनेगी या फिर कमजोरी क्योंकि राष्ट्रीय राजनीति में मोदी शाह और जेटली को विरोधियों के साथ-साथ भाजपा के अंदर से अरुण सॉरी यशवंत सिन्हा शत्रुघ्न सिन्हा जैसे नेता सी जी चुनौती देने का काम शुरू कर चुके हैं…कोई यह मानने को तैयार नहीं है कि मोदी और शाह की भाजपा में पकड़ कमजोर हुई लेकिन एनडीए गठबंधन मैं सब कुछ ठीक-ठाक नजर भी नहीं आता.. राष्ट्रीय कार्यसमिति में अमित शाह को लोकसभा चुनाव तक के लिए राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए जाने पर मुहर लग चुकी है लेकिन ना तो मोदी सरकार की 2014 वाली चमकदार छवि देखने को मिल रही और ना ही भाजपा और गठबंधन की मजबूती.. ऐसे में सभा चुनाव से पहले छत्तीसगढ़ राजस्थान मिजोरम और मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव का महत्व बढ़ गया..
सितंबर के दूसरे पखवाड़े में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के साथ टीम शिवराज के रणनीतिकारों का जंबूरी मैदान में जमावड़ा लगने वाला है.. उससे पहले कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी चुनावी शंखनाद मध्यप्रदेश में रोड शो के जरिए भोपाल से करने वाले हैं.. तब मध्यप्रदेश में कांग्रेस और भाजपा नेताओं के आरोप-प्रत्यारोपों ने जो माहौल बनाया.. उसमें शिवराज और भाजपा, फिलहाल कमलनाथ और कांग्रेस पर भारी नजर आ रही है, लेकिन भाजपा भी मानती है कि कांग्रेस ने जमीनी लड़ाई लड़ने की तैयारियां पूरी कर ली हैं… तो राज्य स्तर पर तमाम मुद्दों और रणनीति से ज्यादा चर्चा इन दिनों राष्ट्रीय राजनीति की हो रही है.. उसकी अपनी वजह भी है.. मोदी-शाह से लेकर राहुल गांधी के रडार पर मध्यप्रदेश आ चुका है.. जिन्होंने अपनी-अपनी सुनियोजित योजना और रणनीति के तहत.. चुनावी बिसात पर अपने मुहरे फिट करना भी शुरू कर दिया है.. दिल्ली में तेजी से बदलते घटनाक्रम और सियासी समीकरण में इन दिनों चर्चा महागठबंधन, कांग्रेस से ज्यादा सोनिया, राहुल और प्रियंका की है.. तो भाजपा में भी ऐसी मोदी शाह और अरुण जेटली की तिकड़ी भी सुर्खियां बटोर रही है.. भाजपा नेतृत्व के निशाने पर कांग्रेस के एक परिवार के तीन नेताओं की तरह कांग्रेस भी जेटली, मोदी और शाह पर फोकस बनाए हुए.. भाजपा ने नेशनल हेराल्ड और जमीन घोटाले को लेकर कांग्रेस की नींद हराम कर रखी है.. तो वह विजय माल्या राहुल गांधी किंगफिशर कनेक्शन भी निकाल कर सामने ले आई है फिर भी राहुल बैकफुट पर आने की बजाय फ्रंट फुट पर आकर रफेल के साथ माल्या-जेटली कनेक्शन पर अपने आक्रमण तेज कर चुके हैं.. फिलहाल विकास पीछे छूट रहा और भ्रष्टाचार के आरोप गौर करने लायक हैं.. तो हिंदू-मुस्लिम पर बहस होने की बजाय पूरा फोकस देश की राजनीति का राफेल सौदे पर बना हुआ है.. रोज नई परतें खुल रही हैं.. रही-सही कसर अरुण जेटली और विजय माल्या की कथित मेल मुलाकातों ने पूरी कर दी है.. कैलाश मानसरोवर की यात्रा से लौटने के बाद राहुल और ज्यादा मुखर हुए हैं.. ऐसे में यूपीए और एनडीए गठबंधन से जुड़े गैर-भाजपा, गैर कांग्रेस राजनीतिक दलों की भूमिका भी अहम होती जा रही है, लेकिन इससे बड़ा सवाल मध्यप्रदेश को लेकर खड़ा होता है.. जहां शिवराज सिंह चौहान की दम पर भाजपा 25 सितंबर के प्रस्तावित चुनावी शंखनाद की तैयारी में जुट चुकी है.. पिछले कुछ महीनों में शिवराज की जनआशीर्वाद यात्रा से बनते बिगड़ते समीकरणों के बीच 1 सप्ताह में दो बार भारत बंद जिन कारणों से हुआ और जो स्थिति बनी.. उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.. जिस मध्यप्रदेश में किसान आंदोलन ने भाजपा की परेशानी बढ़ाई.. वहां शिवराज ने भावांतर योजना और उसके बाद कई बदलावों के साथ किसानों के खाते में बड़ी रकम पहुंचाकर इस आंदोलन की हवा निकालने में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन उसके बाद ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में भड़की हिंसा जिसका आव्हान अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग से जुड़े लोगों ने किया था…. शिवराज और भाजपा के लिए नई समस्या बनकर सामने आई, लेकिन संबल योजना के साथ वर्ग की आर्थिक मदद करते हुए शिवराज उससे भी काफी हद तक बचकर आगे निकल गए, पर संसद में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदलने के लिए लाए गए संशोधन के बाद अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग भाजपा के साथ खड़ा नजर आता.. उससे पहले सवर्णों ने आरक्षण विरोधी रुख अख्तियार कर भाजपा के वोट बैंक को प्रभावित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी.. स्वस्फूर्त इस बंद से मध्यप्रदेश अछूता नहीं रहा और इस दौरान परंपरागत वोट बैंक पिछड़ा वर्ग का मतदाता क्षत्रिय, ब्राह्मण वैश्य के साथ मुस्लिम भी द कराए गए बंद के साथ खड़ा नजर आया.. शिवराज लगातार अपनी जनआशीर्वाद यात्रा जारी रखकर जो भीड़ जुटा रहे हैं.. वो विपक्ष के लिए चिंता बना हुआ , लेकिन अब जब दिल्ली की राजनीति में राष्ट्रीय स्तर पर रफेल सौदे के साथ जेटली-माल्या कनेक्शन पर कांग्रेस आक्रामक हो चुकी है.. तब राहुल गांधी के भोपाल दौरे का महत्व बढ़ जाता है, जो पिछले मंदसौर दौरे के दौरान सत्ता में आने पर 10 दिन के अंदर किसानों का कर्ज माफ करने का ऐलान कर चुके हैं.. इस बार राहुल किन मुद्दों के साथ भोपाल पहुंचेंगे, ये देखना दिलचस्प होगा, लेकिन भाजपा की समस्या यहीं खत्म नहीं होती कि कांग्रेस और राहुल गांधी, शिवराज को निशाने पर लेंगे.. या फिर उनकी प्राथमिकताओं में मोदी चाय और जेटली रहेंगे.. भाजपा को चिंता अब नए सिरे से इस बात की सता रही है कि मोदी-शाह और जेटली-माल्या प्रकरण पर जो परसेप्शन पब्लिक के बीच बन रहा है आखिर वो क्या है..? क्या भाजपा नेताओं के तर्क या फिर कांग्रेस के तथ्य मतदाताओं को रिझा रहे हैं? सवालों की नई फेहरिस्त यहीं से खड़ी होती है.. पिछले 6 महीने में नोटबंदी, जीएसटी, पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दाम जैसे प्रकरण पर मोदी सरकार की वादाखिलाफी जब मोदी सरकार के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी के संकेत दे रही है तब ‘ना खाऊंगा ना खाने दूंगा’ का जुमला उछालने वाली मोदी सरकार पर राफेल सौदे और जेटली-माल्या प्रकरण ने आग में घी का काम किया है और इसका खामियाजा क्या मोदी से ज्यादा शिवराज सरकार को भुगतना पड़ेगा? जहां लोकसभा से पहले विधानसभा चुनाव की सरगर्मियां तेज हो चुकी है.. सवाल यह भी कि किसान आंदोलन, दलित हिंसा और सवर्णों का आंदोलन से बाहर निकलने की जुगत में जुटी शिवराज सरकार के लिए राहुल गांधी का ये दौरा एक नई मुसीबत बनकर सामने आएगा, जिनके निशाने पर मोदी-शाह और जेटली के होने से इनकार नहीं किया जा सकता.. शिवराज और भाजपा सरकार के खिलाफ पिछले डेढ़ दशक में सरकार रहती जिस एंटी इनकंबेंसी की आशंका अभी तक मोदी और शाह को सताती रही क्या अब शिवराज को राहुल गांधी और महागठबंधन के निशाने पर मोदी शाह जेटली के आने का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है.. या फिर शिवराज से लेकर मोदी सरकार इस दोहरे नए संकट से जूझना आसान नहीं होगा क्योंकि जमीनी लड़ाई के लिए कांग्रेस कि मध्यप्रदेश में कमर कस चुकी… लाख टके का सवाल 17 सितंबर का प्रस्तावित राहुल गांधी का रोड शो क्या मोदी शायद शिवराज के 25 सितंबर के महाकुंभ का एजेंडा बदल देगा..