सवाल दर सवाल

कांग्रेस: राहुल के शिव, नाथ के राम लगाएंगे नैया पार..! राकेश अग्निहोत्री ‘सवाल दर सवाल’ नया इंडिया

सवाल दर सवाल, राकेश अग्निहोत्री नया इण्डिया
कांग्रेस: राहुल के शिव, नाथ के राम लगाएंगे  नैया पार..!
महंगाई का कारण बने पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतें और उससे पहले आरक्षण के समर्थन और विरोध में बनते-बिगड़ते जातीय समीकरणों को इंगित करने वाले एक हफ्ते में दो भारत बंद के नफा-नुकसान का आंकलन भाजपा, कांग्रेस और दूसरे राजनीतिक दल करने को जब मजबूर हैं.. तब मोदी और राहुल फिर आमने-सामने खड़े हो गए.. वो बात और है कि दोनों नेता भले ही व्यंग्य-कटाक्ष के जरिए एक-दूसरे पर हमला बोलते रहे हों.. फिलहाल राफेल से लेकर रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ मुकदमा और नेशनल हेराल्ड मामले में पूरे गांधी परिवार, सोनिया राहुल और प्रियंका के खिलाफ भाजपा ने मोर्चा खोल रखा है.. तो मेहुल चौकसी की चर्चा ने सियासत गरमा दी.. पॉलिटिक्स में परसेप्शन और टाइमिंग की गंभीरता को समझा जाए.. तो सवाल खड़ा होता है कि क्या राहुल गांधी सी आक्रामक राजनीति को ध्यान में रखते हुए भाजपा ने पलटवार के साथ अपने हमले तेज कर संदेश सिर्फ कांग्रेस को नहीं, बल्कि महागठबंधन से जुड़े राजनीतिक दलों और उनके नेताओं को भी दे दिया है कि मिशन 2019 की राह में जो भी रोड़ा बनेगा वो मोदी और शाह के निशाने पर होगा.. यह सवाल इसलिए क्योंकि जनता की सबसे बड़ी समस्या पेट्रोल-डीजल से जुड़े मुद्दे पर यदि मायावती और अखिलेश दोनों ने दूरी बनाई.. तो उधर ममता बनर्जी भी दूर हो गईं.. तो क्या इसे भाजपा की सफल रणनीति माना जाए.. इससे पहले सवर्णों ने आरक्षण के विरोध में पूरे भारत में जो माहौल बनाया.. क्या उसने भी मायावती को खासतौर से कांग्रेस से दूरी बनाने को मजबूर किया या फिर ये दोनों की रणनीति का हिस्सा माना जाए.. जो सवर्ण और अनुसूचित जाति-जनजाति दोनों वोटों में सेंध लगाने की रणनीति बना रहे हैं.. ऐसे में सवाल यह भी खड़ा होता है कि क्या भाजपा राहुल गांधी के हिंदुत्व के एजेंडे को पचा नहीं पा रही.. खासतौर से कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष की कैलाश मानसरोवर यात्रा.. जिससे लौटने के बाद राहुल गांधी मध्यप्रदेश की यात्रा और भोपाल रोड शो के दौरान एक नया संदेश देश को दे सकते हैं.. क्योंकि कमलनाथ की कांग्रेस भी भाजपा की दुखती रग राम वन गमन पथ की दुर्दशा को बड़ा मुद्दा बनाने की फिराक में एक नई यात्रा निकालने का ऐलान कर चुकी है.. तो सवाल यह खड़ा होता है कि पिछले 1 हफ्ते में दो भारत बंद के बाद जो माहौल देश में बना है क्या एक हफ्ते बाद भोपाल यात्रा के दौरान राहुल गांधी बैकफुट पर खड़े नजर आएंगे या फिर गुजरात-कर्नाटक की तर्ज पर फ्रंट फुट पर आकर मोर्चा खोल वो मोदी-शाह के मिशन 2019 के रथ को पंचर करने के लिए मध्यप्रदेश से कांग्रेस को एक नई दिशा देने में सफल होंगे…बड़ा सवाल कैलाश मानसरोवर यात्रा से लौटे राहुल गांधी की शिव भक्ति और मध्यप्रदेश में राम वन पथ गमन यात्रा शुरू कर कमलनाथ का हिंदुत्व प्रेम क्या कांग्रेस की चुनावी नैया पार लगाएगा..?
बॉक्स-1
भाजपा के राम वन पथ गमन को कांग्रेस ने बनाया सियासी हथियार
कैलाश मानसरोवर यात्रा से लौटे राहुल गांधी सॉफ्ट हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाते.. इससे पहले नेशनल हेराल्ड मामले में बीजेपी ने उनकी घेराबंदी जब तेज कर दी तब मध्यप्रदेश प्रवास के दौरान प्रस्तावित उनके रोड शो की सफलता पर जनता की नजर होगी.. राहुल के हिंदुत्व प्रेम को ध्यान में रखते हुए मध्यप्रदेश में टीम कमलनाथ भी इसे और हवा देने में जुट गई है.. चाहे फिर वो गौशाला हर पंचायत में बनाने का वादा हो या फिर संघ और भाजपा की दुखती रग रामपथ गमन के नाम पर कांग्रेस की नई यात्रा.. संदेश यह जा रहा है कि दिल्ली में राहुल से लेकर मध्यप्रदेश में कमलनाथ, सिंधिया, दिग्विजय सिंह सभी को भरोसा हो चला है कि राम उनका सियासी वनवास खत्म कर देंगे.. चर्चा है कि इस यात्रा को लेकर बनाई गई समिति के आव्हान पर 21 सितंबर से 9 अक्टूबर तक उस चिन्हित मार्ग पर कांग्रेस भगवा झंडे के साथ नजर आ सकती है.. जहां शिवराज सरकार के रहते भाजपा ने राम पथ बनाने की घोषणा की थी.. लेकिन योजना अंजाम तक नहीं पहुंची.. कांग्रेस के इस दांव को भाजपा की रणनीति की हवा निकालने से जोड़कर देखा जा रहा है.. कमलनाथ, ज्योतिरादित्य जैसे कांग्रेस में सीएम इन वेटिंग के दावेदार पहले ही महाकाल का आशीर्वाद लेकर उज्जैन से अपनी नई भूमिका का आगाज कर चुके हैं.. लेकिन सबसे चौंकाने वाला एलान रामपथ गमन यात्रा को माना जाएगा.. चित्रकूट विधानसभा उपचुनाव के दौरान उत्तरप्रदेश के लगी सीमा पर वहां के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछली दीपावली में दिए जलाए थे और एक बार फिर जब मध्यप्रदेश चुनाव के मुहाने पर खड़ा तब दीपावली को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस ने अपनी रणनीति का खुलासा कर दिया है.. पंचायत में गौशाला खोलने को लेकर कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के बयान को ना सिर्फ हिंदुत्व की सियासत, बल्कि संघ और भाजपा को वादाखिलाफी के साथ एक्सपोज करने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.. राहुल गांधी गुजरात चुनाव से लेकर कर्नाटक में पहले ही मंदिर-मंदिर जाकर कांग्रेस की उस लाइन को आगे बढ़ा चुके हैं.. जिस पर भाजपा अपना एकाधिकार मानती रही.. अब जब राहुल गांधी कार्यकर्ताओं से रूबरू होने के साथ रोड शो के जरिए राजधानी भोपाल में अपने समर्थकों और जनता से रूबरू होने जा रहे हैं.. वह भी कैलाश मानसरोवर की यात्रा से लौटकर. तब राम वनपथ गमन यात्रा सुर्खियां बटोर कर कांग्रेस के एजेंडे को बदलने का संकेत देने में कोई कसर नहीं छोड़ी है.. 2004 शिवराज सरकार के रहते राम वन पथ गमन की चर्चा शुरू हुई थी.. 2007 में चित्रकूट में, 2008 में विद्वानों की समिति का गठन और इसका सर्वेक्षण 2009-10 किया गया.. लेकिन उसके बाद यह योजना ठंडे बस्ते में चली गई.. पौराणिक मान्यता है कि भगवान राम, सीता और लक्ष्मण 14 साल के वनवास के दौरान चित्रकूट से आए थे और अमरकंटक होते हुए रामेश्वर की ओर निकल गए थे.. जो आज के चित्रकूट सतना, रीवा, पन्ना, छतरपुर, शहडोल, अनूपपुर जिलों से जुड़ती है.. गुजरात चुनाव के बाद से मध्यप्रदेश के नेता भी हिंदुत्व की लाइन पर आगे बढ़ते हुए नजर आने लगे हैं.. विधानसभा चुनाव के परवान चढ़ते ही कांग्रेस के सभी दिग्गज नेताओं के माथे पर भगवा, पीला चंदन, त्रिपुंड और टीका देखा जा सकता है.. तो गले में इस रंग का पट्टा.. जिसके जरिए कांग्रेस हिंदुत्व और हिंदू समर्थकों का भरोसा नए सिरे से जीतने की जुगत में है.. जो भी हो पिछले 4 महीनों में कमलनाथ की कांग्रेस ने यदि सामाजिक सरोकार के मोर्चे पर अपना दखल बढ़ाया है.. तो शिवराज सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए हिंदुत्व की राजनीति का कोई मौका नहीं छोड़ा.. कह सकते हैं कि दिग्विजय सिंह की नर्मदा यात्रा के बाद कमलनाथ और ज्योतिरादित्य भी भगवान राम के ज्यादा नजदीक आ जाएं.. तो सवाल यहीं पर खड़ा होता है कि क्या कांग्रेस यह मान चुकी है कि अब संगठन के भरोसे चुनाव में उसकी नैया पार नहीं लगने वाली और उसे बहुसंख्यक मतदाताओं के बीच अपना भरोसा बढ़ाना होगा.. तो देखना दिलचस्प होगा कि कैलाश मानसरोवर यात्रा से लौटे राहुल गांधी देश के हृदय प्रदेश मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में रोड शो के दौरान आखिर जिन मुद्दों को उठाते हैं.. उसमें हिंदुत्व को कितनी प्राथमिकता दी जाती है.. खुद कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मानसरोवर यात्रा से लौटे तो कमलनाथ ने राम पथ वन गमन यात्रा को हरी झंडी देकर एक ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की है, जो भाजपा की दुखती रग में शामिल हो सकती है.. संघ के झंडे से जुड़े इस मार्ग पर पिछले एक दशक में जो काम हो जाना चाहिए था वो दूर-दूर तक नजर नहीं आता..

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माया के बयान के बाद बसपा-कांग्रेस गठबंधन क्या मध्यप्रदेश में खटाई में!
मध्यप्रदेश में कमलनाथ ने गोंगपा, सपा के साथ जिस बसपा से गठबंधन के संकेत देते हुए मायावती की सोनिया-राहुल से बढ़ती नजदीकियों के जरिए.. मोदी-शाह और शिवराज की नींद उड़ाने की कोशिश की थी.. उसे एक बार फिर बड़ा झटका खुद बसपा सुप्रीमो मायावती ने दिया है.. पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दाम के विरोध में महाबंद से दूरी बनाने वाली मायावती ने दूसरे दिन प्रेस कॉन्फ्रेंस कर भाजपा के साथ कांग्रेस को आरोपों के कटघरे में खड़ा कर जो संदेश दिया.. उसमें एक बड़ा संकेत यह भी छुपा था कि उत्तरप्रदेश में सपा-बसपा के बीच महागठबंधन में कांग्रेस के लिए ज्यादा गुंजाइश नजर नहीं आती है.. यह कहना भले ही जल्दबाजी हो.. क्योंकि लोकसभा चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन इस बयान के बाद इसका असर मध्यप्रदेश में कांग्रेस के भाजपा विरोधी गठबंधन पर पड़ने से इनकार नहीं किया जा सकता है.. कोई बड़ी बात नहीं कि सोनिया-राहुल और प्रियंका के खिलाफ आक्रामक हुई मोदी सरकार के रवैये को देखते हुए मायावती कांग्रेस से दूरी बनाने को मजबूर हुई हों, लेकिन इस गठबंधन की पहली परीक्षा तो मध्यप्रदेश में होना है.. जहां बसपा अभी तक अकेले चुनाव लड़ती रही है और जो भाजपा ही नहीं, कांग्रेस का चुनावी गणित बिगाड़ने में सक्षम है.. मायावती के इस बयान के बाद कांग्रेस खासतौर से कमलनाथ को नए सिरे से रणनीति बनाने को मजबूर होना पड़ सकता है.. राष्ट्रीय स्तर पर आरक्षण विरोधियों के सफल भारत बंद के बाद तेल की बढ़ती कीमतों के विरोध में महाबंद का कांग्रेस द्वारा आव्हान की कड़ियों को यदि जोड़कर देखा जाए.. तो फिर बसपा की कांग्रेस से बढ़ती दूरियों को समझा जा सकता है.. सवर्णों के महाबंद के बाद कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने गरीब ब्राह्मणों के लिए आरक्षण की पैरवी कर कांग्रेस की एक नई लाइन को आगे बढ़ाया था.. तो यह बात बसपा को कितनी रास आई होगी.. कहना जल्दबाजी होगी.. यह कहना भी गलत नहीं होगा कि मायावती और सोनिया अपने पत्ते महागठबंधन को लेकर अभी नहीं खोलना चाहते.. यदि उत्तर प्रदेश में भी सपा-बसपा एक साथ और कांग्रेस अलग से भाजपा विरोधियों के मुकाबले मैदान में नजर आई.. तो क्या उसे भाजपा के समर्थक वोटों में कांग्रेस की सेंध लगाने की कोशिश से जोड़कर देखा जा सकता है.. यह वो सवाल है, जो आरक्षण विरोधियों के महाबंद के बाद जातीय समीकरणों को गड़बड़ाता हुआ नजर आता है.. इससे पहले राष्ट्रीय स्तर पर रामविलास पासवान के दबाव में मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार कर संसद में संशोधन करवाया था.. जिसमें कांग्रेस का समर्थन उसे हासिल हुआ, लेकिन इसके बाद भाजपा का वोट बैंक माने जाने वाले सवर्णों ने सड़क पर उतरकर अपनी ताकत दिखाकर भाजपा को सोचने पर मजबूर किया और राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में मोदी-शाह की मौजूदगी में इसके संकेत भी देखने को मिले.. तो छत्तीसगढ़ की तुलना में सोशल इंजीनियरिंग को ये नए जातीय समीकरण राजस्थान से लेकर मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में गड़बड़ाने का सामर्थ्य रखते हैं.. खासतौर से मध्यप्रदेश में बसपा-कांग्रेस की बढ़ती नजदीकियों पर सबकी नजर रहेगी..वहीं दूसरी ओर कांग्रेस दोनों भारत बंद में अपने हित तलाश रही है.. तो उसे भरोसा है कि पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दाम से नाराज आम जनता का मोदी और शिवराज से मोहभंग होगा तो अनुसूचित जाति-जनजाति से लेकर सवर्ण मतदाताओं में खींचती नजर आ रही लकीर भाजपा को ज्यादा नुकसान पहुंचाएगी तो इसका फायदा कांग्रेस उठा सकती है..