सवाल दर सवाल

‘नाथ’ का गणित बिगाड़ ‘कमल’ खिलाएंगे ‘आप’! राकेश अग्निहोत्री ‘सवाल दर सवाल’ नया इंडिया

सवाल दर सवाल, राकेश अग्निहोत्री, नया इंडिया

‘नाथ’ का गणित बिगाड़ ‘कमल’ खिलाएंगे ‘आप’!

राज्यसभा के उपसभापति चुनाव का एमपी कनेक्शन
राज्यसभा सांसद जिनका जनता से कोई सीधा लेना-देना नहीं, के साथ राजनीतिक दलों और उनके नेताओं ने उपसभापति के चुनाव में जो भूमिका निभाई उसने कहीं ना कहीं लोकसभा चुनाव 2019 धुंधली तस्वीर को थोड़ा ही सही स्पष्ट जरूर किया है….., तो कई महत्वपूर्ण संदेश भी एनडीए की जीत और यूपीए की हार के साथ जा चुके हैं.. 2014 में सबसे बड़ी और ताकतवर पार्टी भाजपा को कई राज्यों में विस्तार के बावजूद एनडीए के गठबंधन पर निर्भर होना पड़ा.. भाजपा को आंख दिखाने वाले उनके अपने सहयोगी दल जिसमें शिवसेना उसका समर्थन मिला तो मोदी और शाह ने नीतीश कुमार को सामने लाकर उड़ीसा की राजनीति में बीजेपी से सीधे मुकाबले की संभावना बरकरार रखते हुए भी बीजेडी का समर्थन जेडीयू उम्मीदवार के पक्ष में लेकर एनडीए को मजबूत किया.. स्वयं प्रधानमंत्री, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री ने महागठबंधन के पाले में जाने वाले कई दलों को एनडीए के साथ जोड़ा, तो दूसरी ओर राहुल गांधी ने मोदी विरोधी ज्यादातर दलों से समन्वय बनाकर कांग्रेस उम्मीदवार के पक्ष में वोट करवाया, लेकिन आम आदमी पार्टी खासतौर से अरविंद केजरीवाल से सार्वजनिक रूप  से ही नहीं पर्दे के पीछे भी दूरी बनाई, जिनके सांसद संजय सिंह से लेकर प्रवक्ता उम्मीदवार की हार के बाद राहुल गांधी को खरी-खोटी सुनाते हुए सामने आए.. आम आदमी पार्टी का कहना था कि राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति चुनाव में बिना शर्त समर्थन देने के बाद राहुल ने उनसे इस बार संपर्क नहीं किया, जबकि कभी उनके सहयोगी रहे नीतीश कुमार ने अपने उम्मीदवार के लिए समर्थन मांगा, लेकिन हमने मतदान का बहिष्कार कर दलों से दूरी बनाई..  आम आदमी पार्टी के निशाने पर जिस तरह राहुल गांधी आए उसके बाद लोकसभा तो दूर मध्यप्रदेश में नई हलचल देखने को मिल सकती है…, जहां केजरीवाल पहले ही दौरा कर चुके  तो कई सीटों पर आप ने अपने उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया है.. दिल्ली-पंजाब की तुलना में आप का मध्यप्रदेश में ना कोई जाना पहचाना बड़ा नेता उसके पास और ना ही कोई बड़ा नेटवर्क.. फिर भी जब छोटे क्षेत्रीय दल बसपा, सपा, गोंगपा, कांग्रेस के संपर्क में बने हुए हैं तब आप की नजर युवा मतदाताओं पर होगी, जो मीडिया से जुड़े लोगों को अपने उम्मीदवार के साथ भाजपा और कांग्रेस विरोधी महत्वाकांक्षी नेताओं को भी चुनाव में मैदान में उतार सकती है… तो सवाल यहीं पर खड़ा होता है कि जब कमलनाथ ने कई दलों से सीट समझौते की संभावनाओं को बरकरार रखा है, तब आम आदमी पार्टी आखिर कांग्रेस या फिर भाजपा किसको ज्यादा नुकसान पहुंचा सकती है.. कांग्रेस के लिए आप के खाते में जाने वाले वोटों को रोकना किसी चुनौती से कम नहीं होगा.. शिवराज को निशाने पर लेकर प्रचार में जुटी आप क्या इस चुनाव में भाजपा की मददगार साबित होगी? क्या आप एंटी इनकंबेंसी से प्रभावित मतदाताओं को अपने उम्मीदवारों के पक्ष में लामबंद कर सकेगी? मध्यप्रदेश में कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधा मुकाबला होता रहा है, लेकिन इस बार लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए गठबंधन की सियासत क्या विधानसभा चुनाव को एक नई दिशा देने का सामर्थ्य रखती है? आम आदमी पार्टी से स्वयंसेवी संगठन और युवा पीढ़ी जुड़ सकती है, बशर्ते उसके पास चुनाव में चेहरे हों.. सवाल राहुल गांधी से नाराज केजरीवाल और उनके नेता क्या मध्यप्रदेश में कमलनाथ की कांग्रेस का गणित बिगाड़ कर कमल खिलाने में जाने अनजाने बड़ी भूमिका निभाने वाले हैं? सवाल क्या भाजपा और शिवराज के रणनीतिकार आम आदमी पार्टी को जिसका फिलहाल मध्यप्रदेश में कोई अस्तित्व नहीं उसे मजबूत देखना चाहेंगे..?

ठीक एक साल पहले 8 अगस्त की देर रात गुजरात राज्यसभा चुनाव में जब अमित शाह और स्मृति ईरानी की जीत के साथ कांग्रेस के अहमद पटेल जीते थे तो भाजपा प्रबंधन पर सवाल खड़े किए गए थे.. राज्यसभा में पहुंचने के बाद भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भरोसे में लेकर उपसभापति के चुनाव में जो बिसात बिछाई उस ने न सिर्फ उनके उम्मीदवार की जीत सुनिश्चित की बल्कि यूपीए में कलेह भी बढ़ा दी.. कांग्रेस के साथ कई दल अंत समय तक जुड़े रहे बावजूद इसके राज्यसभा के उपसभापति चुनाव में एनडीए की जीत यूपीए महागठबंधन में दरार डालने में सफल रही.. कई क्षेत्रीय दलों के पाला बदलने के बीच आम आदमी पार्टी ने मतदान का बहिष्कार कर जिस तरह सीधे राहुल गांधी को खरी-खरी सुनाई उससे बीजेपी खुश हो सकती है, जिसके मजबूत प्रबंधन ने न सिर्फ जीत हासिल की, बल्कि विरोधियों के खेमे में मोदी को हराने के लिए कांग्रेसमुक्त महागठबंधन की बहस को आगे बढ़ाया.. आम आदमी पार्टी जिस तरह मोदी से ज्यादा राहुल को कोस रही  और मायावती से लेकर ममता का गुणगान कर रही है.. उसका मतलब साफ है कि लोकसभा से पहले राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में कांग्रेस की मुखालफत उसकी प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर होगी… चाहे फिर इसका सीधा फायदा भाजपा को ही क्यों ना मिले? ऐसे में सवाल खड़ा होना लाजमी है कि मध्यप्रदेश में जब कमलनाथ की कांग्रेस बसपा, सपा, गोंगपा के साथ शरद यादव के तीसरे मोर्चे से समन्वय बनाकर शिवराज की भाजपा को हराने के लिए आगे बढ़ रही है तब आम आदमी पार्टी की भूमिका को इस चुनाव में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, जो कांग्रेस का सिरदर्द बढ़ाने के साथ उस भाजपा को राहत जरूर देगा, जिसके गणित को विरोधियों के गठबंधन की राजनीति गड़बड़ा सकती थी.. सवाल खड़ा होना लाजमी है कि क्या राज्यसभा से बाहर अब आम आदमी पार्टी नए सिरे से मध्यप्रदेश में चुनावी रणनीति बनाएगी, जिसने कई सीटों पर पहले ही उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं..सवाल क्या भाजपा भी आम आदमी पार्टी को मध्यप्रदेश में मजबूत देखना चाहेगी? सवाल कांग्रेस का गणित बिगाड़ कर क्या आप के उम्मीदवार कमल खिलाएंगे..?

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राज्यसभा ने दिखाई लोकसभा की राह…
राज्यसभा में उपसभापति का चुनाव सिर्फ जीत-हार के गणित तक सीमित नहीं रहा.. वह भी तब जब इस चुनाव का सीधे जनता से कोई लेना देना नहीं.. यह राजनीतिक दलों की संख्या गणित, समन्वय से ज्यादा सुविधा की सियासत बना.. यह परिणाम मोदी, भाजपा, एनडीए और उनके विरोधियों का कांग्रेसमुक्त महागठबंधन को एक्सपोज़ करने के नए फार्मूले के तौर पर सामने आया.. जिसने कहीं ना कहीं राजनीतिक दलों और उनके नेताओं की सियासत में संकल्प से आगे समन्वय और सुविधा की सोच की तस्वीर को और स्पष्ट करने की कोशिश की.. 2014 में कौन, कहां, किसके साथ खड़ा था और अब लोकसभा चुनाव 2019 और उसके बाद  वह कहां अपनी सुविधा से अपनी पोजीशन ले सकता है, इसके संकेत भी देखने को मिले.. बीजेपी इस चुनाव के लिए नीतीश कुमार की जेडीयू से जुड़े हरिवंश को आगे लाकर अपने विरोधियों जो कांग्रेस के साथ महागठबंधन का हिस्सा बन सकते थे, उसमें सेंध लगाने में सफल रही.. भाजपा और एनडीए ने राहुल को अछूत साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, तो आम आदमी पार्टी ने गैर कांग्रेस मोदी विरोधी महागठबंधन को वक्त की आवश्यकता बना डाला.. विपक्ष की एकजुटता पर नए सिरे से सवाल खड़े होने के बावजूद तो कहीं ना कहीं कांग्रेस यह संदेश देने में सफल रही कि भाजपा खासतौर से मोदी विरोध की लड़ाई के नेतृत्व में राहुल गांधी को नजरअंदाज कर नहीं लड़ी जा सकती.. 50 राज्यसभा सांसद वाली कांग्रेस को सपा, तृणमूल, लेआउट, पीडीपी, बसपा, डीएमके का खुला समर्थन मिला तो आरजेडी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, केरल कांग्रेस, आईयूएमएल, जेडीएस एनडीए के विरोध में एक साथ देखे गए.. व्यक्तिगत तौर पर कई सांसदों के साथ क्षेत्रीय दलों की इस चुनाव में गैरमौजूदगी नए सिरे से बहस का मुद्दा बनी.. एनडीए से जुड़े सभी सांसदों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया.. चाहे फिर जेडीयू के अलावा नाराज चल रही शिवसेना, अकाली ही क्यों न हों तो नीतीश और मोदी की पहल पर  बीजेडी के अलावा अन्नाद्रमुक निर्दलीय मनोनीत और अमर सिंह का भी साथ मिला… जबकि  यूपीए से जुड़े समाजवादी पार्टी, खुद कांग्रेस, टीएमसी, डीएमके के करीब 8 सांसदों ने  दूरी बनाई, जिन्होंने अपने पत्ते नहीं खोले,  जिसे गठबंधन की नई राजनीति में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.. यूपीए को संभावित 111 में से 105 तो एनडीए को 125 सांसदों का समर्थन मिला, जबकि बहुमत के लिए 122 के मैजिक फिगर तक पहुंचना जरूरी था.. ऐसा नहीं कि इस हार से कांग्रेस वाकिफ नहीं थी बावजूद उसने समर्थक जनों के सभी सदस्यों की सदन में मौजूदगी के लिए मोर्चाबंदी पुख्ता नहीं की… शायद राहुल गांधी और उनके रणनीतिकारों की मंशा देश को यह संदेश देने की थी मोदी और शाह से सीधी टक्कर लेने में राहुल भले ही अभी सक्षम ना हो लेकिन इस लड़ाई को वह अधूरी छोड़ने को तैयार नहीं है… शायद कांग्रेस यह देखना चाहती थी  कि दबाव और सुविधा की राजनीति में कौन से दल है जो  मोदी का विरोध तो करते हैं  निगम एंड टाइम पर पाला बदल लेते हैं.. राहुल की नजर खासतौर से उत्तर प्रदेश महाराष्ट्र बिहार उड़ीसा के साथ आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में थी जहां गठबंधन के साथ कांग्रेस को आगे बढ़ना है.. तो बड़ा सवाल क्या राज्यसभा के उपसभापति चुनाव की जीत-हार में लोकसभा चुनाव 2019 के लिए संदेश छुपा है, जिसे समझा जाना चाहिए.. आखिर मोदी और राहुल के आमने-सामने खड़े नजर आने के बीच गठबंधन की राजनीति किस दिशा की ओर जा रही..

उच्च सदन से निकले सवाल
– नीतीश को भरोसे में लेकर इसे मोदी का मास्टर स्ट्रोक माना जाए या फिर गठबंधन की राजनीति मोदी की मजबूरी एनडीए मजबूत करना
– क्या लोकसभा चुनाव तक एनडीए इसी तरह मजबूत बना रहेगा, या फिर मोदी और राहुल विरोध में तीसरा मोर्चा की सुगबुगाहट फिर बढ़ेगी
– उपसभापति केस चुनाव में नीतीश को मोदी द्वारा दिए गए महत्त्व से शिवसेना और अकाली कि नाराजगी तो नहीं बढ़ेगी
– क्या मोदी और राहुल दोनों कमजोर गठबंधन में एनडीए मजबूत यूपीए महागठबंधन एक्सपोस हुआ?
– क्या लोकसभा चुनाव में भाजपा सिर्फ मोदी के दम पर विरोधियों को हराने में सक्षम नहीं रही?
– क्या नीतीश कुमार एनडीए गठबंधन का मोदी के बाद दूसरा बड़ा चेहरा बनकर सामने आए जिनका दावा लोकसभा चुनाव में भी मजबूत होगा?
– क्या इस चुनाव के बाद शिवसेना से महाराष्ट्र में रिश्ते सुधरेंगे और दोनों विधानसभा चुनाव साथ लड़ेंगे?
– क्या राहुल की दिलचस्पी मोदी और एनडीए को मात देने से ज्यादा महागठबंधन को एक्सपोस करने की थी जिससे कांग्रेस की राह आसान हो?
– गठबंधन  के सहयोगियों का भरोसा कांग्रेस और राहुल की तुलना में क्या भाजपा और मोदी ने जीता?
– मोदी विरोधियों यानी महागठबंधन की तस्वीर क्या उपसभापति के चुनाव ने साफ कर दी?