सवाल दर सवाल

‘जनआशीर्वाद’ से पहले शिवराज का ‘दर्शन शास्त्र’ और सवाल..! राकेश अग्निहोत्री ‘सवाल दर सवाल’ नया इंडिया

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सवाल दर सवाल, राकेश अग्निहोत्री, नया इंडिया
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‘जनआशीर्वाद’ से पहले शिवराज का ‘दर्शन शास्त्र’ और सवाल..!

 

(मिशन 2018 के लिए शिवराज की फिलॉस्फी और ‘जीत का फार्मूला’)
जनआशीर्वाद यात्रा पर निकलने से पहले शिवराज के दर्शन ने जिस बेबाकी, सख्ती और अपेक्षाओं के साथ आत्मविश्वास पर यकीन करने को मजबूर किया, वो गौर करने लायक है.. मध्यप्रदेश में लगातार चौथी बार और खुद शिवराज के नेतृत्व में जीत की हैट्रिक बनाने के लिए वो उनकी सिर्फ सजगता, सतर्कता, समन्वय की मिसाल ही नहीं, बल्कि चुनौतियों का एहसास भी कराता है.. अधिकारियों और मंत्रियों को एक साथ शिवराज का ये संदेश कि सस्ती लोकप्रियता और सिर्फ वोट के लिए वो खजाना नहीं खोलते, बल्कि अमीरों से लेकर गरीबों को पैसा बांटना, उन्हें उनका हक देना ये उनकी फिलॉस्फी है.. शायद मुख्यमंत्री का ये स्पष्ट संदेश अधिकारियों, मंत्रियों और दूसरे जनप्रतिनिधियों के लिए था.. जो कहीं ना कहीं सरकार की योजनाओं पर पैसे का दुरुपयोग का आरोप लगाकर गाहे-बगाहे नेतृत्व की नीति-नीयत पर सवाल खड़ा कर नेतृत्व का मजाक उड़ाते रहे हैं.. लंबे अरसे बाद कड़क मिजाज शिवराज सामने आए तो उन्होंने लंबे सियासी अनुभव की अपनी ठसक का एहसास दर्शन के साथ कराया.. शिवराज ने साफ कर दिया कि भ्रम ना पालें और ना ही भ्रम फैलाएं.. क्योंकि ये उनका सोचा-समझा फैसला है और अन्याय के खिलाफ इस कर्तव्य को वो हर हाल में निभाएंगे.. वो यहीं नहीं रुके, बल्कि लगे हाथ ये भी कह दिया कि ये उनकी अपनी सरकार है और जैसा वो चाहते हैं वैसा ही होना चाहिए.. ये सारगर्भित और एक से ज्यादा बार रिपीट करती हुई टिप्पणी की यदि तह तक जाया जाए.. तो मध्यप्रदेश के इतिहास में सबसे ज्यादा कार्यकाल के मुख्यमंत्री के तौर पर शिवराज एक ऐसी लाइन खींचना चाहते हैं, जिसे मिटाना विरोधी तो दूर.. पार्टी के अंदर भी किसी दूसरे मुख्यमंत्री के लिए आसान नहीं होगा.. जो एक और चुनाव अपनी उपलब्धियों और पुण्याई के दम पर ही जीतना चाहते हैं.. लेकिन यदि उनकी फिलॉस्फी पर गौर करें तो शायद सरकार आना-जाना, चुनाव जीतना-हारना उनके लिए उतना ही मायने रखता है, जितना एक पार्टी और प्रदेश के मुख्यमंत्री के लिए.. वो शायद अब इससे आगे की सोचने लगे हैं, जो सिर्फ कर्तव्य नहीं, बल्कि जवाबदेही का भी एहसास कराता है.. जिनके अंदर गरीब, बेसहारा, मजदूर और दूसरे उपेक्षित यानी न्याय की अपेक्षा के साथ अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति को उसका हक दिलाने के लिए किसी भी हद तक जाने का मानस बना चुका है.. जिसे शायद अमीर और गरीब के बीच बढ़ती खाई ने झकझोरकर रख दिया है और वो सियासी हितों के संरक्षण से आगे सामाजिक सरोकार के मोर्चे पर कुछ ऐसा कर देना चाहते हैं, जिससे आने वाली पीढ़ी जब याद करे तो शिवराज के मुख्यमंत्री रहते उनके फैसलों को याद किया जाए.. वल्लभ भवन से उन्होंने उस संदेश को और स्पष्टता के साथ जिम्मेदार अधिकारियों और मंत्रियों की मौजूदगी में आगे बढ़ाया, जिसे कुछ दिन पहले ही उन्होंने सागर दौरे के दौरान सामने रखा था.. ‘अमीरों से खींचो और गरीबों को सींचो’ की बात को शिवराज का फार्मूला करार दिया था.. जिसका बड़ा लक्ष्य सिर्फ सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, मकान, दुकान के मोर्चे पर विकास तक सीमित ना रहते हुए सामाजिक सरोकार के मोर्चे पर गरीब, बेसहारा, मजदूर की मुख्यमंत्री और उनकी सरकार की अपेक्षाओं से होती है.. शायद मुख्यमंत्री का दीर्घ अनुभव उन्हें ये सोचने को मजबूर करता है कि अमीरों और गरीबों के बीच में खाई आज भी मौजूद है.. शिवराज को जनहितैषी अपनी सरकार की उन्हीं योजनाओं पर यकीन है.. जो समाज का कायाकल्प कर प्रदेश को एक नई दिशा दे सकता है.. पहली बार मुख्यमंत्री की शपथ लेने के बाद जब उन्होंने लाड़ली लक्ष्मी योजना लागू की थी तब अधिकारियों द्वारा फंड को लेकर तमाम अड़चनें डालने की कोशिश की गई थी.. उस वक्त चौहान की दृढ़ता और दबाव के चलते ही इस योजना को अंजाम तक पहुंचाया गया, जिसने विधानसभा चुनाव जिताने में भाजपा की बड़ी मदद की थी.. समझा जा सकता है कि अब जब किसान, मजदूर, गरीब, युवा, छात्र वर्ग को भरोसे में लेने के बड़े लक्ष्य को लेकर जब भाजपा और शिवराज आगे बढ़ रहे हैं, तब फंड एक बड़ी समस्या के तौर पर अधिकारियों द्वारा सामने लाया जाता है.. ऐसे में शिवराज के इस दर्शन को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा.. वो भी तब जब मुख्यमंत्री अपनी इन्हीं योजनाओं के दम पर हितग्राहियों को भरोसे में लेकर जनता का आशीर्वाद एक बार फिर चाहते हैं.. कोई स्पष्ट संदेश मंत्रियों से ज्यादा अधिकारियों के लिए छुपा है कि वो बिना वजह कमियां निकालने की बजाय सुविधा और सरल व्यवस्था के साथ हितग्राहियों को उनका हक समय रहते दिलवाने में अपनी भूमिका इमानदारी से निभाएं.. इससे पहले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मंत्रियों और अधिकारियों को केंद्र में प्रस्तावित योजनाओं के लिए तत्परता दिखाने की सलाह भी दे दी.. यही नहीं, मोदी सरकार जो उनकी अपनी भाजपा की सरकार है उससे प्रदेश का हक जरूर लिया जाएगा और इसके लिए बतौर मुख्यमंत्री शिवराज का हस्तक्षेप भी देखने को मिलेगा.. कह सकते हैं कि जनआशीर्वाद यात्रा पर निकलने से पहले या यूं कहें कि चुनावी मोड में जाने से पहले अधिकारियों और मंत्रियों की संयुक्त बैठक के जरिए शिवराज ने अपनी फिलॉस्फी और जीत का फार्मूला ही नहीं, बल्कि दृढ़ता के साथ अपने बुलंद इरादे दिखा दिए..

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{‘जनआशीर्वाद’ के लिए जरूरी और कसौटी पर होगा ‘सुशासन’}
पिछले दो विधानसभा चुनाव में शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री रहते मतदाताओं ने निर्णायक समर्थन दिया तो नेतृत्व पर भरोसा भी जताया.. 2008 और 2013 के विधानसभा चुनाव में निकाली गई जनआशीर्वाद यात्रा ने प्रदेश में जो माहौल बनाया उससे कांग्रेस बहुत पीछे छूट गई.. यह वह दौर था जब केंद्र में भाजपा की सरकार नहीं थी और सब कुछ शिवराज ने अपने दम पर हासिल किया.. बीजेपी के परंपरागत वोट बैंक में इजाफा हुआ तो सीटों का ग्राफ जरूर ऊपर-नीचे हुआ.. सत्ता में रहते बीजेपी को मजबूत कैडर और कमजोर कांग्रेस का फायदा मिला, तो इसमें निर्णायक भूमिका निभाई शिवराज फैक्टर ने.. जिसे उनकी सहृदयता विनम्रता समन्वय और उदारता के साथ चौमुखी व्यक्तित्व के प्रति आकर्षण उनकी सरकार की जनहितैषी योजनाओं से जोड़कर देखा जाएगा, जिसने जाति धर्म से ऊपर विभिन्न वर्ग के मतदाताओं और उनके परिवार को व्यक्तिगत आर्थिक मदद पहुंचाई.. कुल मिलाकर शिवराज के नेतृत्व में हुए दो विधानसभा चुनाव में प्रदेश की जनता ने भाजपा के विकास के एजेंडे पर मुहर लगाई.. यानी सरकार की उपलब्धियां और शिवराज का व्यवहार और पुण्याई रंग लाई.. जो उनकी कमजोरियों और दूसरे विवादों पर भारी साबित हुई ..तीसरे कार्यकाल में भी शिवराज के पास ऐसी कई योजनाएं हैं, जिसके जरिए वो मजदूर, गरीब, बेसहारा, विद्यार्थियों और युवाओं का वोट और सपोर्ट दोनों हासिल करने का दावा उनके समर्थक कर सकते हैं, लेकिन मिशन-2018 विधानसभा चुनाव इस बार एक अलग परिदृश्य में होने जा रहा है.. जब चुनौतियां सिर्फ विरोधी ही नहीं, बल्कि पार्टी के अंदर से भी भाजपा को मिल सकती हैं.. चाय फिर इसकी वजह है विधायकों और मंत्रियों के ख़िलाफ़ प्रति नाराजगी और सरकार के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी और इसे दूर करने के लिए वर्तमान विधायकों की बड़ी संख्या में टिकट काटना ही क्यों ना हो.. सीधी चुनौती देने के लिए मैदान में कमलनाथ और ज्योतिरादित्य की जोड़ी के साथ पिछले चुनाव के मुकाबले कांग्रेस की ज्यादा मजबूती और गंभीरता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.. तो केंद्र से लेकर राज्य और नगरीय निकायों में भाजपा का कब्जा होने के कारण एंटी इनकम्बेंसी का खतरा पार्टी के सामने मुंहबाए खड़ा है, जिससे प्रदेश और राष्ट्रीय नेतृत्व अंजान नहीं है, तो पिछले दिनों मंत्रियों और विधायकों के खिलाफ उनके क्षेत्र में बढ़ती नाराजगी, विरोध-प्रदर्शन भी किसी चुनौती से कम नहीं है और जब विकास का श्रेय लूटने के लिए पार्षद-विधायक को और विधायक-सांसद को और मंत्री को लेकर भाजपा में साफ विभाजन नजर आ रहा हो, तब राजधानी के कोलार क्षेत्र की घटना को भाजपा एक उदाहरण के तौर पर ले सकती है.. यदि ऐसी ही स्थिति दूसरे विधानसभा और संसदीय क्षेत्र में है तो इस आक्रोश और विवाद को समय रहते भाजपा को समेटना होगा.. क्योंकि कांग्रेस ने भी विकास की आड़ में भ्रष्टाचार को एक बड़ा मुद्दा बनाने की ठानी है, ऐसे में शिवराज के विकास के दावे और उसकी जमीनी हकीकत से आगे बात जो बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता वह है सुशासन पर सवाल खड़े किए जा सकते है.. जिसका जवाब भी शिवराज को देना ही होगा.. जिसके लिए उन्होंने मानस भी बना लिया है वह हर हाल में अपनी योजनाओं का निचली स्तर तक क्रियान्वन सुनिश्चित करना चाहते.. यात्रा पर निकलने से पहले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने वल्लभ भवन में भले ही अधिकारियों और मंत्रियों को अपनी फिलॉस्फी और फार्मूले से अवगत करा दिया हो, लेकिन कमजोर कड़ी आज भी लोअर ब्यूरोक्रेसी ही मानी जा रही है.. मतदाता और जनता से लेकर छोटे अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच भाजपा का कार्यकर्ता यदि कमजोर कड़ी बनकर सामने आया है तो उसकी वजह है जिला, तहसील और ब्लॉक स्तर पर अधिकारियों की मनमानी, जिस पर आरोप है कि उसने शिवराज की विकास की प्राथमिकताओं को पलीता लगाया.. क्योंकि जो शिवराज चाहते उसका सीधा फायदा सबको मिल रहा हो ऐसा नहीं ..बिना किसी लेन-देन यदि जनता का काम नहीं हो रहा है तो भ्रष्टाचार का एक बड़ा मुद्दा बनना तय है.. जनआशीर्वाद यात्रा के दौरान शिवराज सरकार की उपलब्धियों का एक बड़ा पैकेज जब अपने उद्बोधन के जरिए जनता के बीच रखेंगे, तब सवाल योजनाओं से आगे उनके क्रियान्वयन और परिणाम को लेकर भी खड़े हो सकते हैं.. यही नहीं, सरकार का डिलीवरी सिस्टम यदि प्रभावी और असरदार साबित नहीं हुआ तो शिवराज की योजनाओं पर पानी फिरने से कोई रोक नहीं सकता.. यहीं पर सवाल खड़ा होता है कि विकास के एजेंडे पर बनी भाजपा की सरकार सुशासन की कसौटी पर कितना खरा उतर रही और कितना कारगर सिद्ध हो रहा है, चाहे फिर वो किसान, मजदूर, गरीब वर्ग के लिए शुरू की गई आर्थिक योजनाएं ही क्यों ना हों.. यदि समय पर इसका लाभ हितग्राहियों को नहीं मिल रहा तो फिर जनता का आक्रोश यदि क्षेत्र के विधायक और मंत्री के खिलाफ ही सही देखने को मिले या वो जनआशीर्वाद यात्रा के दौरान नारेबाजी के तौर पर सामने आए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए.. बतौर मुख्यमंत्री शिवराज के लिए जरूरी है कि वो अपने व्यक्तिगत खुफिया तंत्र के जरिए जमीनी हकीकत की सच्चाई को जानें और आलोचना को भी सकारात्मक तौर पर लें, जिससे समय रहते कमजोर कड़ियों को दुरुस्त किया जा सके ..जिससे इसका फायदा कम से कम कांग्रेस को तो ना मिले.. शिवराज का जादू पिछले दो चुनाव में जनता के सिर चढ़कर बोलता रहा है, लेकिन इस बार वक्त का तकाजा और उम्मीद दोनों कि इस यात्रा में शिवराज नया क्या परोस सकते हैं.. इस बार जननायक की छवि उनके साख एक बार फिर कसौटी पर होगी, जिनसे सिर्फ कार्यकर्ताओं की ही नहीं, बल्कि मतदाताओं द्वारा नई उम्मीद बढ़ाना भी लाजमी है.. चुनौती सिर्फ प्रशासनिक व्यवस्था में कसावट की नहीं, बल्कि सियासी भी है, क्योंकि जैसे-जैसे जनआशीर्वाद यात्रा निकलेगी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के संभागीय दौरे भी शुरू हो चुके होंगे.. यही नहीं, पिछली बार केंद्र में भाजपा सरकार नहीं थी, इसलिए सर्वे-सर्वा शिवराज थे, लेकिन इस बार मोदी और शाह की ताकत का फायदा भी मुख्यमंत्री उठाना चाहेंगे.. जितना जरूरी शिवराज के लिए सरकार बनाना है उससे ज्यादा जरूरी राष्ट्रीय नेतृत्व के लिए मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार होना है.. ऐसे में सियासी तौर पर भाजपा के नेताओं और जिम्मेदार कार्यकर्ताओं की जवाबदेही भी बनती है, चाहे फिर वो शिवराज की जनआशीर्वाद यात्रा हो या इस दौरान अमित शाह के संभागीय दौरे और प्रदेश संगठन द्वारा चलाए जा रहे कार्यक्रम.. एक साथ तीन मोर्चों पर भाजपा को अपनी सक्रियता बनाए रखते हुए चौथे मोर्चे पर पहले के मुकाबले ज्यादा मजबूत कांग्रेस को जवाब देना भी किसी चुनौती से कम नहीं होगा.. क्योंकि कमराबंद बैठकों के बाद अब नाथ और सिंधिया की जोड़ी भी पब्लिक के बीच जाने वाली है.. शिवराज का लक्ष्य सभी 230 विधानसभा सीटों पर जनआशीर्वाद के साथ पहुंचना है.. 15 अगस्त के बाद ये यात्रा जब परवान चढ़ रही होगी तब प्रदेश में सियासी मोर्चे पर तस्वीर लगभग स्पष्ट हो चुकी होगी.. भाजपा के अंदर नेताओं की भूमिका बदल चुकी है.. शिवराज के साथ इस बार मास्टर ऑफ मैनेजमेंट अरविंद मेनन नहीं, बल्कि उनकी जगह सुहास भगत ले चुके हैं, तो प्रदेश भाजपा अध्यक्ष रहते नरेंद्र सिंह तोमर इस बार चुनाव प्रबंधन अभियान के प्रमुख की भूमिका में होंगे.. निश्चित तौर पर स्व. अनिल दवे की कमी यदि शिवराज और उनके रणनीतिकारों को महसूस होगी.. तो राज्य के साथ केंद्र सरकार की योजनाओं के क्रियान्वयन भी भाजपा के लिए डिसाइड फैक्टर साबित हो सकता है.. सबसे बड़ी चुनौती सोशल मीडिया के मोर्चे पर शिवराज और उनकी भाजपा को मिलने वाली है, तो मोदी और शाह की दिलचस्पी और हस्तक्षेप को भी टीम शिवराज को समझना होगा.. कुल मिलाकर कार्यकर्ता, प्रबंधन और मीडिया के मोर्चे पर भाजपा के सामने इस बार जनआशीर्वाद यात्रा से लेकर चुनाव प्रचार के समापन तक कई अतिरिक्त चुनौतियां सामने आने वाली हैं तो सुशासन का इस चुनाव में एक बड़ा मुद्दा बनना तय है..