सवाल दर सवाल

{कमलनाथ की ‘कलमगिरी’ ज्योतिरादित्य का ‘दरबार’ } राकेश अग्निहोत्री ‘सवाल दर सवाल’ नया इंडिया

kj

{कमलनाथ की ‘कलमगिरी’ ज्योतिरादित्य का ‘दरबार’ }

{सिंधिया और नाथ कब होंगे चुनाव प्रचार में साथ साथ}

{. कांग्रेस की रणनीति या दोनों के बीच बढ़ती दूरी.!}
कांग्रेस में कुर्सी और चेहरे को लेकर बयानबाजी एक बार फिर नए सिरे से शुरू हो गई …चाहे फिर वह ज्योतिरादित्य का अपने संसदीय क्षेत्र में यह कहना कि उन्हें कुर्सी की चाह नहीं …या फिर कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव सज्जन सिंह वर्मा का वह बयान जिसमें उन्होंने कहा कि कमलनाथ और ज्योतिरादित्य के अलावा भी कोई नया चेहरा मुख्यमंत्री का दावेदार हो सकता है …इन दो महत्वपूर्ण बयानों से पहले प्रदेश प्रभारी दीपक बावरिया यह कह चुके कि कमलनाथ और सिंधिया में से ही कोई एक चेहरा सी एम बनेगा.. जिन्होंने उप मुख्यमंत्री की कुर्सी दलित नेता सुरेंद्र चौधरी के नाम लिख दी थी ..ये बयान उस वक्त आए हैं जब करीब दो महीने की कड़ी मशक्कत के बाद कमलनाथ की कलमगिरी रंग लाई और प्रदेश कांग्रेस पदाधिकारियों की नई टीम सामने आई ..जिसके भरोसे कांग्रेस लगातार तीसरी हार के बाद हर हाल में सत्ता में वापसी का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रही है.. ऐसे में सवाल खड़ा होना लाजमी, क्योंकि इन बयानों के बीच कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी को मध्य प्रदेश की जिस जोड़ी सिंधिया और नाथ पर भरोसा .. वह अपनी नई भूमिका में एक ही दिन ..एक ही समय.. एक दूसरे से काफी दूरी बनाते हुए अलग-अलग मोर्चे पर चिंतन और मंथन का सिलसिला नए सिरे से आगे बढ़ाने जा रहे हैं.. सवाल खड़ा होता क्या यह कमलनाथ की कांग्रेस की सोची समझी दूरगामी रणनीति है ..या फिर लाख सफाई के बावजूद इस जोड़ी के बीच बढ़ती दूरी माना जाए.. जिसे क्या सीएम इन वेटिंग के दावेदार से जुड़े बयानों से जोड़कर देखा जा सकता है… क्योंकि कलमगिरी की लंबी एक्सरसाइज के बाद कमलनाथ जब प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में अपनी नई टीम के साथ संवाद शुरू करेंगे तब ज्योतिरादित्य सिंधिया का दरबार बुंदेलखंड के खजुराहो में सजेगा.. तो सवाल चुनाव प्रचार की ओर बढ़ते कदम के बीच आखिर सिंधिया और नाथ एक साथ कब किस मंच पर नजर आएंगे.. क्या यह नए सिरे से नजर आ रही दूरियां कांग्रेस की रणनीति का हिस्सा है.. या फिर वाकई में दोनों के बीच फिर तालमेल कम घालमेल ज्यादा नजर आ रहा है.. खासतौर से ज्योतिरादित्य का कुर्सी से मोह भंग होने के बयान के बाद..

पॉलिटिक्स में टाइमिंग और परसेप्शन कुछ ज्यादा ही महत्व रखते और इसके मायने निकालें जाना लाजमी है.. कम से कम मध्य प्रदेश कांग्रेस के अंदर जिम्मेदार नेताओं के बयान और पार्टी द्वारा दिए गए फैसले इस ओर इशारा करते कि कांग्रेस भले ही एकजुटता का दावा करें ..लेकिन पब्लिक में जो परसेप्शन बन रहा वह उसकी सियासी सेहत के लिए अच्छा नहीं माना जाएगा.. क्योंकि राहुल गांधी मध्यप्रदेश की धरती पर आकर सिंधिया और नाथ की जोड़ी को आगे करके दूसरे सभी नेताओं को बहुत पीछे कर चुके थे.. मंदसौर की सभा में राहुल गांधी ने कहीं ना कहीं सिंधिया के युवा होने और उनके पास समय होने की बात कह कर कमलनाथ को जरूर आगे लाकर खड़ा कर दिया था.. लेकिन यह जोड़ी उसके बाद अभी तक एक साथ नजर नहीं आ रही ..प्रदेश कांग्रेस कार्यालय की कुछ महत्वपूर्ण बैठकों को छोड़ दिया जाए तो दोनों नेता अलग-अलग समय में विदेश यात्रा कर चुके हैं.. पिछले दिनों जब ज्योतिरादित्य समिति की बैठक लेने भोपाल पहुंचे और प्रेस कॉन्फ्रेंस उन्होंने की थी ..तब कमलनाथ भोपाल से बाहर थे ..उसके बाद कमलनाथ भोपाल लौटे और लगातार बैठकों में व्यस्त.. इस बीच प्रदेश कांग्रेस की बहुप्रतीक्षित 90 सदस्य टीम सामने आ चुकी है.. जिसमें पहली बार कांग्रेस ने पदाधिकारियों की जाति का खुलासा कर मीडिया के मार्फत उसे कार्यकर्ता और जनता तक पहुंचाकर एक नई बहस छेड़ दी.. क्षेत्रीय जाति और गुटीय संतुलन बनाने की कोशिश के बावजूद जब कांग्रेस ने जल्द एक और सूची सामने आने का भरोसा दिलाया तो संदेश यही गया की एडजस्टमेंट में कहीं ना कहीं कोई चूक हुई.. जिससे समय रहते दुरुस्त करने की कोशिश जारी है ..इस टीम में नाथ सिंधिया के साथ दिग्गी राजा का दबदबा देखा जा सकता है ..तो तीन पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव ,कांतिलाल भूरिया और सुरेश पचौरी की स्थिति किसी से छुपी नहीं.. इस बीच पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव हो या फिर राहुल गांधी के करीबी मीनाक्षी नटराजन की नाराजगी चर्चा का विषय बन चुकी.. कमलनाथ की टीम में पिछले साढ़े चार साल तक कांग्रेस का झंडा लेकर संगठन के अस्तित्व को बचाने वाले उन नेताओं कोई स्थान नहीं मिला जिन्हें अरुण यादव समर्थक माना जाता था.. इन्हें शायद भाजपा से ज्यादा कांग्रेस ने बड़ा विरोधी लिया है.. दीपक बाबरिया कि उस गाइडलाइन की भी हवा निकल गई जिसमें उन्होंने चुनाव न लड़ने वाले नेताओं को संगठन में नवाजे जाने का भरोसा दिलाया था .. कई वर्तमान विधायक शामिल किए गए तो कई से दूरी बना ली गई .. 30% से ज्यादा ऐसे नए चेहरे इस टीम का हिस्सा बनने में सफल रहे जो इससे पहले 5 साल में कभी शायद ही प्रदेश कांग्रेस दफ्तर में नजर आए हो.. पदाधिकारियों की बैठक से पहले पूर्व सांसद पूर्व विधायक की बुलाई गई बैठक में मीनाक्षी नटराजन का मंच पर नहीं जाना और फिर बैठक से बाहर चला जाना जब विवादों का कारण बना तो सफाई देने के लिए वह वापस लौटकर भी आए लेकिन तब तक देर हो चुकी थी और संदेश यही गया कि सिर्फ अरुण यादव ही नहीं बल्कि मीनाक्षी नटराजन भी कमलनाथ की कार्यशैली से नाराज हैं.. उधर नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह हर समिति के पदेन सदस्य होने के बावजूद अभी तक अपने को उपेक्षित महसूस करते रहे.. कमलनाथ की नई टीम से ज्यादा चर्चा इन दिनों कांग्रेस जिम्मेदार नेताओं के बयानों की है.. जिसने कहीं ना कहीं एक बार फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी और कांग्रेस के चेहरे की चकल्लस और चिक-चिक को एक नई दिशा दे दी है ..ताजा बयान कमलनाथ के मुकाबले कांग्रेस के चेहरे के दूसरे बड़े दावेदार माने जाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया का सामने आया है.. जिन्होंने अपने संसदीय क्षेत्र शिवपुरी में यह कहकर सबको चौंका दिया की कुर्सी कि उन्हें चाह नहीं.. वह तो बस प्रदेश में बदलाव चाहते हैं.. अपने क्षेत्र के उन मतदाताओं के बीच यह बयान आया है जहां मुंगावली कोलारस उपचुनाव के बीच अबकी बार सिंधिया सरकार के नारे गूंजते थे.. इसके साथ ही उनका एक और बयान जिसमें उन्होंने टिकट के दावेदारों में 30% नए चेहरों की आवश्यकता जताई है ..सिंधिया का यह बयान उस वक्त आया है ..जब वो अपनी नई भूमिका में अपनी समिति के सदस्यों से मेल मुलाकात का सिलसिला खजुराहो बुंदेलखंड से शुरू करने वाले हैं ..और इस दौरान वह आम सभा से दूरी बनाते हुए कार्यकर्ता और जनता दोनों के लिए उपलब्ध रहेंगे ..यानि कार्यकर्ताओं से क्षेत्र ,अपनी पार्टी कांग्रेस के बारे में सोच और भाजपा से मिलने वाली चुनौतियों को चिन्हित कर मुद्दों को तलाशने और तराशने की कोशिश करेंगे ..तब उन्होंने कुर्सी की चाह नहीं बस जरूरत है बदलाव की बात कह कर कहीं ना कहीं यह इशारा कर दिया है कि वह कांग्रेस की मजबूती और भाजपा को सत्ता से बाहर करने के लिए इस निर्णायक लड़ाई में कुर्सी को तिलांजलि देने को तैयार हैं ..इस बयान को राहुल गांधी के मंदसौर दौरे के बयान से जोड़कर देखा जाए.. तो सवाल यह खड़ा होता है क्या ज्योतिरादित्य ने कमलनाथ का रास्ता साफ करने का मन बना लिया है .. क्या यह दोनों ने एक दूसरे को भरोसे में लेकर किया है या फिर यह राहुल गांधी का हस्तक्षेप नजर आने लगा या फिर सिंधिया कांग्रेस संगठन की दिशा से संतुष्ट नहीं ..लेकिन दूसरी ओर कमलनाथ समर्थक कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव सज्जन सिंह वर्मा का एक और बयान नया विरोधाभास पैदा करता.. जिसमें उन्होंने कमलनाथ और सिंधिया दोनों चेहरों के अलावा तीसरे चेहरे की और यह कह कर इशारा किया कोई और भी प्रदेश का मुख्यमंत्री बन सकता है ..इससे पहले प्रदेश प्रभारी दीपक बावरिया के दो बयान पहला जिसमें उन्होंने कमलनाथ सिंधिया में से ही किसी एक के सीएम बनने की बात कही थी और दूसरा को बयान जिसमें डिप्टी सीएम के तौर पर दलित नेता सुरेंद्र चौधरी की दावेदारी को पुख्ता कर दिया था.. यदि सिर्फ कांग्रेस की रणनीति माना जाए तो फिर अस्पष्टता के चलते कांग्रेस में कार्यकर्ताओं का असमंजस और पार्टी का संकट बढ़ सकता है.. सवाल सिर्फ कांग्रेस के नेताओं के बयान से ही खड़े नहीं होते बल्कि पार्टी के फैसले भी उसके अंतर्द्वंद को रेखांकित करते हैं ..यह सवाल इसलिए क्योंकि जिस प्रदेश कांग्रेस की टीम के भरोसे कमलनाथ की कांग्रेस विधानसभा से लेकर लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन और सत्ता में वापसी की उम्मीद लेकर आगे बढ़ रही है.. उसकी पहली बैठक कमलनाथ ने उस दिन ही बुलाई है जब उनके जोड़ीदार ज्योतिरादित्य सिंधिया दिल्ली और भोपाल से दूर मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड के खजुराहो में छतरपुर पन्ना टीकमगढ़ के अपनी संभागीय प्रचार समिति सदस्यों से मुलाकात करेंगे .. वह बात और है कि आम सभा से दूरी बनाते हुए क्षेत्र की जनता और कार्यकर्ता के लिए भी वह व्यक्तिगत तौर पर इस दिन खजुराहो में संवाद संपर्क और समन्वय के लिए उपलब्ध रहेंगे .. यानी पहली बार अपने संसदीय क्षेत्र और प्रदेश कांग्रेस कार्यालय से दूर चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष की भूमिका में ज्योतिरादित्य सिंधिया का दरबार सजेगा और इसमें कार्यकर्ता अपनी बात कह सकेंगे.. लेकिन सवाल इसलिए खड़ा होता है क्योंकि यह पहला मौका होगा जब लंबे अरसे बाद कमलनाथ की टीम सामने आई और उसकी पहली महत्वपूर्ण बैठक होने जा रही है.. जिसमें परिचय के अलावा शीर्ष नेतृत्व की गाइड लाइन और संगठन की अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं से अपेक्षाओं के साथ चुनाव के लिए उनकी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सुनिश्चित की जा सकती है.. ऐसे में राहुल गांधी द्वारा बनाई गई जोड़ी में सिर्फ कमलनाथ का बतौर प्रदेश अध्यक्ष इस बैठक में शामिल होना उनका हक है और जिम्मेदारी भी.. लेकिन जोड़ी के दूसरे महत्वपूर्ण सदस्य ज्योतिरादित्य सिंधिया का इसी दिन भोपाल से दूर पूर्व निर्धारित कार्यक्रम में व्यस्त रहना नए सवाल खड़ा करता है.. सवाल यह है क्या कमलनाथ को राहुल गांधी द्वारा बनाई गई जोड़ी जिसमें उनके सहयोगी ज्योतिरादित्य के साथ कांग्रेस इस चुनाव में जा रही है को यदि इस महत्वपूर्ण बैठक में बुलाया जाता तो क्या यह जोड़ी और मजबूत नजर नहीं आती .. पार्टी संगठन के संविधान और पार्टी प्रमुख के नाते कमलनाथ का यह अपना विशेषाधिकार है.. लेकिन दूसरे नेताओं के मुकाबले नाथ सिंधिया यदि संयुक्त तौर पर इस बैठक में मौजूद रहते ..तो शायद कार्यकर्ताओं तक और बेहतर और प्रभावी संदेश जाता.. क्या इससे कमलनाथ की टीम से सिंधिया की नाराजगी से जोड़कर देखा जाना सही होगा ..सवाल क्या यह कांग्रेस की रणनीति है जो हर नेता को फ्री फॉल के तहत छूट दे दी गई है कि वह अपने दायरे में रहकर प्रचार की रणनीति को आगे बढ़ाएं.. या फिर कमलनाथ यह नहीं चाहते थे कि दिग्विजय सिंह अरुण यादव, कांतिलाल भूरिया ,सुरेश पचौरी घर विवेक तनखा ,सत्यव्रत चतुर्वेदी जैसे नेताओं को नजरअंदाज कर सिर्फ सिंधिया को पार्टी के सबसे बड़े फोरम पर बुलाया जाए ..यह बात इसलिए कि कुछ समितियों की बैठक में सिंधिया और नाथ संयुक्त और पर नजर आ चुके हैं.. क्या यह जरूरी नहीं था कि जिन नए पुराने चेहरों के साथ पदाधिकारियों की टीम को अंतिम रुप दिया गया और जिनकी इस चुनाव प्रचार में अपने अपने क्षेत्र में बड़ी भूमिका होगी ..वह एक बार पहले ही ज्योतिरादित्य प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में कमलनाथ की मौजूदगी में मुलाकात कर लेते.. क्योंकि जनता के बीच प्रचार में बड़ी भूमिका ज्योतिरादित्य ही निभाने वाले हैं..