सवाल दर सवाल

शाह से पहले ‘सहस्रबुद्धे’ की सक्रियता के मायने.. राकेश अग्निहोत्री ‘सवाल दर सवाल’ नया इंडिया

Frame_20180706_23_26_42
सवाल दर सवाल, राकेश अग्निहोत्री, नया इंडिया

(शाह से पहले ‘सहस्रबुद्धे’ की सक्रियता के मायने)
राष्ट्रीय संगठन महामंत्री रामलाल के संभागीय दौरे अभी पूरे ही नहीं हुए थे कि राष्ट्रीय उपाध्यक्ष विनय सहस्रबुद्धे की लंबे अरसे बाद धमाकेदार एंट्री के साथ मध्यप्रदेश में सक्रियता गौर करने लायक है.. वह भी तब जब शिवराज सिंह चौहान जनआशीर्वाद यात्रा पर निकलने जा रहे हैं और इसकी सफलता का जिम्मा चुनाव प्रबंधन की कमान संभालने वाले केंद्रीय मंत्री नरेंद्र तोमर ने राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रभात झा और उनकी टीम को सौंपी है.. ऐसे में सवाल खड़ा होना लाजमी है कि क्या प्रदेश प्रभारी विनय सहस्रबुद्धे मिशन मोदी लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए अमित शाह के संभागीय दौरों से पहले जमीनी हकीकत को नए सिरे से जानने की कोशिश करेंगे, जिसमें रामलाल के ज्यादा गहराई पर जाते हुए क्रॉस वेरिफिकेशन भी संभव है.. सहस्रबुद्धे नर्मदापुरम संभाग की बैठक ले चुके हैं और अब इस सिलसिले के उज्जैन और इंदौर से आगे बढ़ने की संभावना है, जहां जनआशीर्वाद यात्रा के आगाज के मौके पर खुद अमित शाह समेत दूसरे बड़े नेता भी मौजूद रहेंगे.. यदि यह लाइन आने वाले दिनों में आगे बढ़ती हुई नजर आती है तो फिर इसमें संकेत स्पष्ट तौर पर छुपे हैं कि राष्ट्रीय नेतृत्व का हस्तक्षेप अब आने वाले समय में मध्यप्रदेश में बढ़ेगा और यह सब कुछ देखने को भी मिलेगा, वह भी तब जब चेहरे के तौर पर शिवराज को मैदान में जनता के बीच में उतार दिया जायेगा..

मध्यप्रदेश में फिलहाल विधानसभा चुनाव 2018 की तैयारियों को लेकर एक साथ कई मोर्चों पर प्रवास, बैठक, रणनीति और भी बहुत कुछ चल रहा है, चाहे फिर वह राष्ट्रीय संगठन महामंत्री रामलाल के संभागीय दौरे हों और इस दौरान जिला स्तर के चुनिंदा कार्यकर्ताओं से संवाद और इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए हर जिले में दो वरिष्ठ नेताओं की जोड़ी को जिला स्तर तक पहुंचाना.. जहां से खबर अच्छी नहीं आ रही, क्योंकि इन बैठकों में सीमित लोग ही पहुंच रहे हैं और संवाद एकतरफा है.. कई जिम्मेदार नेता इस बैठक में नहीं बुलाए जाने से नाराज हैं तो कुछ पहुंचकर भी मौन होकर रह गए हैं.. क्योंकि यह वही चेहरे हैं, जो सरकार में या तो मंत्री हैं और संगठन में जिम्मेदार पदाधिकारी, और नाराजगी इन्हीं लोगों से निचले स्तर के पदाधिकारियों की रही है.. बस क्षेत्र बदलकर प्रदेश नेतृत्व ने इन दोनों को यह सोचकर आगे बढ़ाया कि जमीनी हकीकत उन्हें जानने को मिलेगी.. संगठन नहीं चाहता है कि जनआशीर्वाद यात्रा के दौरान शिवराज की मौजूदगी में पार्टी की गुटबाजी खासतौर से टिकट की दावेदारी को लेकर रस्साकशी सामने आए.. इससे पहले प्रभारी मंत्री से लेकर प्रदेश अध्यक्ष और संगठन महामंत्री भी डैमेज कंट्रोल को मजबूर हो चुके हैं.. रामलाल और विनय सहस्रबुद्धे दिल्ली लौट चुके हैं.. यदि संघ के नुमाइंदे के तौर पर संगठन मंत्रियों की टीम का प्रतिनिधित्व कर रहे रामलाल के पास मध्यप्रदेश का जिम्मा है तो अमित शाह की टीम में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के तौर पर विनय सहस्रबुद्धे लंबे अरसे बाद सक्रिय हुए हैं और जबलपुर से लेकर भोपाल में उनकी मौजूदगी इस बात का संकेत है कि नए प्रदेश प्रभारी की तलाश और किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाने के बाद सहस्रबुद्धे मध्यप्रदेश लौटे हैं.. यदि उन्होंने होशंगाबाद संभाग की बैठक ली तो वो संगठन की दृष्टि से 10 संभागों तक जरूर पहुंचेंगे.. यह सिलसिला यदि जनआशीर्वाद यात्रा के साथ-साथ आगे बढ़ेगा तो फिर इसका मतलब शिवराज से ज्यादा मिशन मोदी होगा, जो नई संभावनाओं को जन्म देता तो नए सवाल भी खड़े करेगा..  क्या नरेंद्र मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री बनाने से पहले शिवराज का मुख्यमंत्री बनना हाईकमान के लिए भी अब जरूरी नहीं, मजबूरी बन चुका है.. क्योंकि मध्यप्रदेश में सरकार बनेगी तभी उसके बाद होने वाले लोकसभा चुनाव में भाजपा 29 लोकसभा सीटें जीतना चाहेगी.. यदि चौथी बार भाजपा की सरकार बनाने का ख्वाब पूरा नहीं हो पाया तो इसका झटका मिशन 2019 यानी मोदी को लगना भी तय है.. शायद यही वजह है कि राष्ट्रीय नेतृत्व ने एक ओर शिवराज सिंह चौहान को पार्टी का चेहरा बनाकर जनआशीर्वाद यात्रा की हरी झंडी दी तो दूसरी ओर अमित शाह अपनी सक्रियता मध्यप्रदेश में बढ़ाने वाले हैं, जिनके दौरों की पटकथा शायद प्रदेश प्रभारी विनय सहस्रबुद्धे को ही लिखना होगी.. जो भी हो शाह की लाइन को तो वो आगे बढ़ाएंगे ही.. क्योंकि अभी तक अमित शाह के मध्यप्रदेश के संभागीय दौरों की तारीख नहीं आई है तो उम्मीद की जा सकती है कि जुलाई के अंतिम हफ्ते या फिर 15 अगस्त के बाद उनके दौरे मध्यप्रदेश में चुनावी माहौल को एक अलग दिशा में ले जाएंगे.. अब चर्चा सिर्फ विधानसभा की नहीं, बल्कि लोकसभा की भी हो रही है और माहौल बनाने के लिए जरूरी है कि जिस कार्यकर्ता पर भाजपा को नाज है और जो उसकी ताकत है वो अपने आपको उपेक्षित ना समझे और उसकी नाराजगी समय रहते दूर कर दी जाए.. यह बात इसलिए क्योंकि अमित शाह भोपाल दौरे के दौरान कार्यकर्ताओं की नब्ज पर हाथ रखने के लिए ही ये कह कर गए थे कि इस बार चुनाव संगठन लड़ेगा.. मध्यप्रदेश में संगठन का चेहरा बदलकर राकेश सिंह को जिस तरह संभाग जिला स्तर पर सक्रिय किया जा रहा है और इससे पहले रोड शो के जरिए उनकी पीठ थपथपाई गई, ये सब एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा लगता है.. चुनाव प्रचार के इस प्रारंभिक दौर में जब चुनाव आचार संहिता नहीं लगी तब शिवराज की सभाओं में उमड़ रही भीड़ का बड़ा हिस्सा सरकार की योजनाओं से लाभान्िवत होने वाले हितग्राही हैं तो संगठन पीछे खिसक चुका है.. ऐसे में आने वाले समय में कार्यकर्ताओं की पूछ-परख बढ़ना तय है.. यदि अमित शाह चाहते हैं कि उन्हें जमीनी हकीकत और वास्तविकता का पता चले तो निजी एजेंसी द्वारा कराए गए सर्वे से ज्यादा जानकारी उन कार्यकर्ताओं से मिल सकती है, जिन्हें जिला स्तर से लेकर प्रदेश स्तर तक उन बैठकों में आमंत्रित नहीं किया जाता, जहां प्रदेश की गाइड लाइन आगे बढ़ाने के लिए ज्ञान पिलाया जाता है, तो अमित शाह के दौरे से पहले ये काम विनय सहस्रबुद्धे बखूबी कर सकते हैं.. क्योंकि उनकी मध्यप्रदेश में वापसी अमित शाह के आग्रह कहें या फिर निर्देश पर संभव हुई, इसलिए यदि उनकी बैठकों का क्राइटेरिया बढ़ा दिया जाएगा तो शायद सब कुछ अच्छा सुनने को ना मिले, लेकिन गलती-सुधार की गुंजाइश बढ़ जाएगी.. यह बात इसलिए क्योंकि राष्ट्रीय संगठन महामंत्री रामलाल के संभागीय दौरों के दौरान जाने-पहचाने, दबदबा रखने वाले वही चेहरे बैठक में नजर आए थे, जिनसे कार्यकर्ता खुश नहीं हैं, खासतौर से यदि विनय सहस्रबुद्धे सामूहिक बैठक की बजाए वर्तमान सांसद, विधायक, मंत्री, जिला पंचायत अध्यक्ष और निकाय चुनाव के प्रतिनिधियों से आगे पूर्व सांसद, विधायक, मंत्री और चुनाव हारने वाले नेताओं को अपनी बात रखने की छूट देंगे तो ही अकेले में ये लोग भाजपा की दशा और दिशा का सही आंकलन पेश कर सकते हैं.. क्योंकि अमित शाह खुद मिस्ड कॉल से बने एक करोड़ कार्यकर्ताओं की वेरिफिकेशन की आवश्यकता ये कहकर जता चुके हैं कि सबका अता-पता कागज में मौजूद है तो 30 लाख कार्यकर्ता क्या फर्जी हैं, तो इसकी सूची किसने तैयार की और जिन 70 लाख पर प्रदेश संगठन अपनी पीठ थपथपा रहा है क्या इनका क्रॉस वेरिफिकेशन किया गया.. क्या वॉट्सएप ग्रुप बन चुके हैं.. क्या बाइक सवार कार्यकर्ताओं सूची तैयार हो चुकी है.. ये वो सवाल हैं, जिसका जवाब प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह की टीम में शामिल महामंत्री, उपाध्यक्ष और मंत्री जैसे पदाधिकारियों के पास नहीं है..

बॉक्स

मोदी, शाह और शिव को नरोत्तम से बड़ी उम्मीदें


संसदीय मंत्री नरोत्तम मिश्रा को चुनाव अभियान के लिए नरेंद्र सिंह तोमर की अगुवाई में बनाई गई समिति में यूं तो तीन दूसरे नेताओं के साथ सह संयोजक बनाया गया है, लेकिन राजनीतिक समन्वयक के तौर पर एक बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई है.. सरकार के प्रवक्ता और विधानसभा के अंदर फ्लोर मैनेजमेंट की बड़ी जिम्मेदारी निभाते हुए संसदीय मंत्री ने विरोधियों का ह्रदय परिवर्तन कर उन्हें भाजपा के पाले में लाने का काम कई बार किया.. पिछले चुनाव में तत्कालीन संगठन महामंत्री अरविंद मेनन और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, प्रदेश अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर को भरोसे में लेकर बसपा, सपा, कांग्रेस के अंदर खूब सेंध लगाई.. विधायक रहते सदस्यता पर खतरा जब न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद टल चुका है तब नरोत्तम के हौसले बुलंद हैं.. सदन के अंदर शिवराज के संकटमोचक कहे जाने वाले नरोत्तम अब शिवराज को भरोसे में लेकर लगातार आगे बढ़ते जा रहे हैं, जिन्होंने मुख्यमंत्री रहते नरोत्तम को मंत्रिमंडल से बाहर किए जाने की सोची भी नहीं थी, लेकिन यह भी सच है कि प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर उनका दावा कारगर सिद्ध नहीं हुआ.. सांसद राकेश सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया.. प्रदेश में मंत्री रहते मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से लेकर दिल्ली में राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से उनका समन्वय हमेशा चर्चा का विषय बना रहा.. उत्तरप्रदेश से लेकर गुजरात विधानसभा चुनाव में सक्रियता ये संदेश दे गई थी कि वो अमित शाह के भरोसेमंद टीम में शामिल हो चुके हैं.. ऐसे में अपवादस्वरूप एक-दो नेताओं को छोड़ दिया जाए तो शिवराज के भरोसेमंद और उनके प्रतिस्पर्धी लगभग सभी नेताओं को काम पर लगा दिया गया है.. पिछले दिनों चौधरी राकेश सिंह की नरोत्तम मिश्रा के साथ भाजपा दफ्तर में संगठन महामंत्री सुहास भगत से मुलाकात पर गौर किया जाए तो संकेत साफ है कि राजनीतिक समन्वयक के तौर पर नरोत्तम मिश्रा आने वाले समय में कोई ना कोई नया धमाल करने वाले हैं, चाहे फिर वो शिवराज सिंह चौहान की जनआशीर्वाद यात्रा के दौरान विरोधियों का हृदय परिवर्तन हो या फिर अमित शाह के दौरे के दौरान नए सिरे से उनकी सक्रियता.. क्योंकि विनय सहस्रबुद्धे अमित शाह के प्रतिनिधि के तौर पर संभागीय बैठक शुरू करने जा रहे हैं तो शायद शिवराज सिंह चौहान और राकेश सिंह की व्यस्तता के बाद नरोत्तम मिश्रा ही वो चेहरा होंगे, जो सहस्रबुद्धे के साथ नजर आ सकते हैं.. क्योंकि यदि जबलपुर की गोपनीय बैठक से बाहर निकलकर आई खबर पर यकीन किया जाए तो विनय सहस्रबुद्धे और नरोत्तम मिश्रा आने वाले दिनों में अमित शाह के संभागीय दौरे के दौरान ज्यादा सक्रिय भूमिका में नजर आ सकते हैं, जिन्होंने मुख्यमंत्री शिवराज के साथ इन दिनों ज्यादा बेहतर तालमेल बना रखा है, चाहे फिर वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में मोहनपुरा के मंच से सिंचाई मंत्री के तौर पर नरोत्तम मिश्रा का उद्बोधन हो या फिर मुख्यमंत्री से उनकी बढ़ती मेल-मुलाकात, निश्चित तौर पर कोई खिचड़ी पक रही है.. वैसे भी कांग्रेस गठबंधन के साथ बसपा, सपा और बसपा से जब नजदीकी बढ़ा रही है या फिर सपाक्स, किसान संगठन और भी बरसात के इस मौसम में बाहर निकल आए सियासी दल और उनके नेता सरकार पर दबाव बनाने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने दे रहे, तब नरोत्तम मिश्रा जैसे नेताओं की भाजपा में अहमियत बढ़ना तय है तो भाजपा का एक बड़ा ब्राह्मण चेहरा बनकर पहले ही स्थापित हो चुका है..