सवाल दर सवाल

भाजपा के ‘बावरिया’ की नींव या प्रबंधन पर चोट…

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सवार दर सवाल, राकेश अग्निहोत्री , नया इंडिया
भाजपा के ‘बावरिया’ की नींव या प्रबंधन पर चोट…
क्या सहस्रबुद्धे ने मोदी और शाह की गाइडलाइन को आगे बढ़ाया?
इंट्रो
भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और सांसद विनय सहस्रबुद्धे ने कहा कि कमलनाथ पुरानी सदी के चांदी के सिक्के हैं..जो अब बाजार में नहीं चलेंगे.. उन्होंने कहा, किसी के घर में धन का अभाव होता है तो वो पुराना जमा धन निकालते हैं.. जिसमें चांदी के सिक्के भी होते हैं, जो साफ करके चमकाने के बावजूद बाजार में नहीं चलते हैं.. कांग्रेस में पलटवार कर कहा है कि
शिवराज तो खोटे सिक्के, जिसका कोई मोल नहीं..
हमारे लिए पुरानी शताब्दी के सिक्के आज भी पूजनीय, दुर्लभ व अनमोल है।
नेतागणों ने कहा कि सहस्त्रबुद्धे ने भाजपा के लोगों को ही इशारों में कमलनाथ जी की ताकत व विश्वसनीयता बता दी है। भले सहस्त्रबुद्धे लंबे समय बाद प्रवास पर प्रदेश आये है, लेकिन उन्होंने सच को स्वीकारा है। वो यह भी जानते है कि शिवराज जी अब खोटे सिक्के हैं..
करोड़ों खर्च कर प्रचार व ब्रांडिंग के द्वारा ये सदैव खोटे सिक्के को चमकाते रहते आये है.. लेकिन प्रदेश की जनता अब इन खोटे सिक्कों को पहचान चुकी है और इनका मोल जान चुकी है। वह अब उन्ही सिक्कों को आज़मायेगी, जिनका मोल हो, जिनकी विश्वयनियता हो, जिनके वादों में दम हो, जो प्रदेश की तस्वीर बदलना चाहते है, जो जनता के सच्चे हितैषी हो।अमित शाह की थिंक टैंक के अहम सदस्य बताने वाले संघ की पृष्ठभूमि के सहस्रबुद्धे ने निशाने पर कांग्रेस के अंदर जान फूंकने वाले कमलनाथ को चांदी का सिक्का बताकर लिया, लेकिन कुछ ऐसे सवाल खड़े हो गए, जिसने भाजपा के अंदर भी एक नई बहस छेड़ दी है.. सवाल भाजपा के अंदर ऐसे कितने चांदी के सिक्के हैं, जो अभी तक धड़ल्ले से चल रहे हैं और अब आगे नहीं चलेंगे.. क्योंकि सियासत के मैदान में तो खोटे सिक्के से लेकर चमड़े के सिक्के भी चलते रहे.. सिद्धांत, विचारधारा, प्रबंधन के गुर नई पीढ़ी को प्रबोधिनी संस्थान से जुड़कर सिखाते रहे सहस्रबुद्धे की इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, उसे गंभीरता से लिया जाए.. तो बड़ा सवाल यहीं पर खड़ा होता है कि प्रदेश प्रभारी क्या मोदी और शाह की उस लाइन को मध्यप्रदेश में आगे बढ़ाने जा रहे हैं, जिसने राष्ट्रीय स्तर पर मार्गदर्शक मंडल और राज्यों की राजनीति में मुख्यमंत्री बनाकर पिछले 4 साल में भाजपा में ना सिर्फ पीढ़ी बदल दी.. बल्कि बैक डोर एंट्री करने वाले ज्यादा प्रभावशाली और दूसरों पर भारी साबित होते हुए नजर आ रहे.. तो क्या मध्यप्रदेश में राकेश सिंह ने प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभालते ही चांदी के सिक्के माने जाने वाले नेताओं की सूची तैयार कर हाईकमान को भेज दी है कि इन्हें विधानसभा ही नहीं लोकसभा चुनाव से भी दूर रखा जाए..लेकिन सवाल यहीं पर खड़ा होता है कि विनय सहस्रबुद्धे की नजर में इसका क्राइटेरिया क्या है.. धन पशु या पूंजीपति, प्रबंधन के महारथी , लगातार लोकसभा चुनाव जीतना या फिर उम्रदराज और अनुभवी होना.. इस कारण क्या कमलनाथ भाजपा को खटकने लगे ..दिल्ली से लेकर मध्य प्रदेश में सत्ता में रहते भाजपा में भी नेता घोषित अघोषित तौर पर कारोबारी बन चुके .. जो कमलनाथ की तरह प्रबंधन क्षमता की दम पर चुनाव भी जीते रहे हैं.. जिन्होंने लोकसभा के 9 चुनाव जीते..भाजपा के अंदर भी ऐसे नेताओं की कमी नहीं है..तो सवाल क्या प्रदेश प्रभारी की हैसियत से सहस्रबुद्धे ने नींव के पत्थर माने जाने वाले भाजपा के देवदुर्लभ नेता और कार्यकर्ताओं पर भी यह चोट की है..जो कमलनाथ की तरह ही भाजपा के अंदर रहकर मिशन 2018 विधानसभा चुनाव जीतने में अलग-अलग बड़ी भूमिका निभाने जा रहा है..इस सूची में कैलाश जोशी, बाबूलाल गौर, सरताज सिंह से आगे क्या चुनाव घोषणा पत्र तैयार करने वाले विक्रम वर्मा ही नहीं, थावरचंद गहलोत, सत्यनारायण जटिया, रघुनंदन शर्मा के साथ अब प्रभात झा, प्रह्लाद पटेल को भी शामिल कर लिया जाएगा.. दूसरी ओर भाजपा में प्रबंधन के महारथी और पूंजीपति नेताओं की भी कमी नहीं है..
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विनय सहस्रबुद्धे लंबे समय से मध्यप्रदेश से दूरी बनाकर चल रहे थे.. जिस राज्य के वो भाजपा के प्रभारी हैं, जहां विधानसभा चुनाव की तैयारियां पहले ही शुरू हो चुकी थीं.. पिछले दिनों अमित शाह के हस्तक्षेप के बाद जबलपुर की इस महत्वपूर्ण बैठक में सहस्रबुद्धे शामिल हुए थे, जिसमें सोशल मीडिया से लेकर प्रबंधन के मोर्चे पर रणनीति बनाई गई थी.. तब ये संदेश गया था कि यदि चुनाव तक कोई बड़ा उलटफेर नहीं हुआ तो सहस्रबुद्धे मध्यप्रदेश में अपनी सक्रियता बढ़ाएंगे और अब अमित शाह के संभागीय दौरों से पहले उसकी सफलता सुनिश्चित करने की रणनीति वो बनाने में जुट गए..मध्यप्रदेश के प्रभारी रहते राष्ट्रीय उपाध्यक्ष से राज्यसभा सांसद तो और दूसरे महत्वपूर्ण दायित्व उन्हें सौंपा गया..केंद्रीय मंत्रिमंडल में उन्हें शामिल किए जाने की अटकलें दो बार खारिज हो चुकी हैं..चर्चा ये भी रही कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान, ही नहीं अरविंद मेनन से अनबन के कारण विनय सहस्रबुद्धे ने मध्यप्रदेश से दूरी बना ली थी..अब जब नंदू भैया की जगह राकेश सिंह प्रदेश अध्यक्ष की कमान संभाल चुके हैं तब कहीं जाकर विनय का घोषित गुस्सा शांत हुआ..स्वभाव से विनम्र, सरल-सहज और विवादों से खुद दूरी बनाने वाले सहस्रबुद्धे का ताजा बयान गौर करने लायक है..निशाना भले ही उन्होंने कमलनाथ पर साधा हो, लेकिन इसमें संदेश पॉलिटिक्स में मैनेजमेंट का हस्तक्षेप और पीढ़ी परिवर्तन के दौर में प्रदेश भाजपा की सत्ता और संगठन से जुड़े नेताओं के लिए भी छुपा हुआ है, जिसकी शुरुआत राकेश सिंह की एंट्री के साथ हो चुकी है, तो क्या फार्मूला विधानसभा से लेकर लोकसभा चुनाव में टिकट वितरण के दौरान नजर आ सकता है, जो पहले राज्यसभा चुनाव में भी देखा जा सकता है..भाजपा में शिवराज और अमित शाह के दो महत्वपूर्ण सर्वे चर्चा में हैं, जिसके आधार पर 70 से ज्यादा वर्तमान विधायकों के टिकट काटे जाने से इनकार नहीं किया जा सकता है, तो सवाल यहीं पर खड़ा होता है कि भाजपा में चांदी के सिक्के यानी कितने कमलनाथ पर शीर्ष नेतृत्व की नजर है, जिनके बारे में भाजपा की स्पष्ट सोच है कि वो बाजार में नहीं चलेंगे यानि अब वो चुनाव जीतने और जिताने की स्थिति में नहीं हैं.. यदि सहस्त्रबुद्धे ने पूंजीपति और कारोबारी के तौर पर कमलनाथ को नेता से ज्यादा व्यापारी साबित किया है तो मध्यप्रदेश में भी मंत्री सांसद विधायकों की संख्या कम नहीं है.. कांग्रेस खासतौर से राहुल गांधी तो मोदी सरकार पर सूट बूट की सरकार का आरोप लगाते रहे.. शिवराज सिंह चौहान ने राष्ट्रीय स्तर पर अमित शाह द्वारा बनाए गए मार्गदर्शक मंडल के बावजूद मध्यप्रदेश में अपने से ज्यादा अनुभवी और उम्रदराज नेताओं को सत्ता और संगठन से अभी भी जोड़े रखा है..इन्हें मुख्यधारा से हटाने की शुरुआत बाबूलाल गौर और सरताज सिंह से हुई, लेकिन इस विवाद के चलते अमित शाह ने भी पल्ला झाड़ लिया था, लेकिन विनय सहस्रबुद्धे की इशारों-इशारों में की गई टिप्पणी एक नई दिशा दी गई है..पीढ़ी परिवर्तन के इस दौर में चुनाव प्रबंध समिति से लेकर कोर कमेटी में अभी भी ऐसे नेताओं का बोलबाला है, जो साठ साल से ज्यादा के हैं, तो अगला चुनाव जीतकर उनकी उम्र 70 पार कर चुकी होगी..मध्यप्रदेश में भाजपा की चौथी बार सरकार बनाने के लिए संभाग और जिला स्तर पर भी पुरानी पीढ़ी के नेताओं को नए सिरे से सक्रिय किया गया है..जिस तरह सहस्रबुद्धे ने भाजपा की नींव के पत्थरों पर चोट की है, वह उन्हें अपमानित महसूस करने से कम नहीं है ..उससे संदेश ये भी जा रहा है कि अटल-आडवाणी ही नहीं, बल्कि मोदी और शाह की पीढ़ी के बाद के थर्ड लाइन नेताओं की लॉटरी खुलने वाली है और सेकंड लाइन को भी पार्टी के अंदर प्रतिस्पर्धा के चलते अपने अस्तित्व के संकट से गुजरना पड़ सकता है..जहां तक बात चांदी के सिक्के की है, तो दीपावली में आज भी इनका पूजन लक्ष्मी-गणेश के साथ होता है.. संकट में परिवार के लिए लाभकारी सिद्ध होते हैं.. वो बात और है कि नोटबंदी के दौर में जमापूंजी के तौर पर घर-परिवार की बड़ी ताकत बने रहे..भाजपा के अंदर नोटबंदी के पहले ही मार्गदर्शक मंडल बना दिया गया था, तो राज्यों में विस्तार के साथ सरकार में नए चेहरे देखने को मिल चुके हैं..जहां तक बात मध्यप्रदेश की सियासत की है तो जिस कमलनाथ पर सहस्रबुद्धे ने निशाना लगाया है उस कांग्रेस में नया विवाद प्रदेश प्रभारी दीपक बावरिया अपने बयानों से खड़ा करते रहे हैं, तो भाजपा में भी प्रदेश प्रभारी विनय सहस्रबुद्धे का ये बयान विवादों को एक नई दिशा दे चुका है..विनय भाजपा के बावरिया कहे जाने लगे हैं.. जिन्होंने या तो पूंजीपति नेताओं या फिर भाजपा की नींव पर चोट उस वक्त की है, जब चौथी बार मध्यप्रदेश में सरकार बनाने को लेकर भाजपा पुरानी और नई पीढ़ी के बीच कोई टकराव नहीं चाहती.. ऐसे में विनय सहस्त्रबुद्धे का यह विवादित बयान भाजपा के पूंजीपति नेता हो या फिर अनुभवी पुरानी पीढ़ी के नींव के पत्थर माने जाने वालों को कितना रास आएगा समझा जा सकता है.. क्योंकि कांग्रेस ने चांदी के सिक्के का जवाब खोटे सिक्के से दिया और निशाने पर सीधे शिवराज को लिया है.. कांग्रेस में कमलनाथ और ज्योतिरादित्य पुरानी और नई पीढ़ी के बीच समन्वय बनाकर इस चुनाव में आगे बढ़ने का स्पष्ट संकेत दे चुके हैं.. जबकि भाजपा में पीढ़ी परिवर्तन के दौर में थर्ड लाइन आगे आने के संकेत मिलने लगे हैं..