सवाल दर सवाल

शिवराज के टाइम बाउंड ‘एक्शन प्लान’ पर शाह ने लगाई मुहर) राकेश अग्निहोत्री ‘सवाल दर सवाल’ नया इंडिया

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सवाल दर सवाल, राकेश अग्निहोत्री, नया इंडिया
(शिवराज के टाइम बाउंड ‘एक्शन प्लान’ पर शाह ने लगाई मुहर)

मिशन इलेक्शन 2018 के लिए प्रदेश भाजपा द्वारा बनाए गए उस एक्शन प्लान पर राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह अपनी मुहर लगा दी, जिसका एक छोर यदि बूथ मैनेजमेंट तो दूसरा शिवराज के नेतृत्व में जनआशीर्वाद होगा.. जिसका समापन चुनावी शंखनाद के साथ पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जन्मदिन 25 सितंबर को होगा.. तो इससे पहले पूरे प्रदेश में माहौल बनाने के लिए विधानसभा सम्मेलन और संभागीय बैठकों में भाजपा अपना फोकस बनाने जा रही है.. एक ओर पार्टी और निजी स्तर पर सर्वे, सर्वेक्षण के जरिए अलग-अलग स्तर पर जीतने वाले उम्मीदवार के चयन और वर्तमान स्थानीय नेतृत्व के खिलाफ जनता के बीच गुस्सा और प्रतिनिधि की खराब होती छवि की हकीकत जानेगी..तो जरूरी तहकीकात के लिए पार्टी निष्पक्ष तौर पर अपने प्रयास जारी रखेगी ..तो दूसरी ओर प्रबंधन और सोशल मीडिया पर फोकस कर प्रदेश में एक ऐसा सकारात्मक माहौल बनाएगी, जिससे कांग्रेस के मुकाबले बीजेपी को मतदाता अपनी पसंद मानने को मजबूर हों.. इसके लिए शिवराज सिंह की जनआशीर्वाद यात्रा अलग-अलग चरणों में क्रमशः मालवा-निमाड़, महाकौशल, विंध्य, बुंदेलखंड, मध्य भारत से निकलेगी.. जो मानसून की दस्तक देने से पहले अलग-अलग कार्यक्रमों के जरिए पहले दौर में पूरे प्रदेश के लगभग हर जिले का दौरा कर चुके है.. जबलपुर में हुई चुनाव प्रबंध समिति की बैठक में प्रदेश नेतृत्व ने मिशन इलेक्शन के इस रोडमैप को सामने रखा, जिस पर समिति के कुछ सदस्यों के सुझाव को स्वीकार करते हुए बिना समय गंवाए अब चुनावी मोड में जाने का फैसला लिया गया.. खास बात यह के प्रदेश प्रभारी रहते विनय सहस्त्रबुद्धे जो राकेश सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के समय भी मध्य प्रदेश नहीं आए थे वह इस बैठक का हिस्सा बने.. दो राष्ट्रीय संगठन महामंत्री रामलाल के साथ राष्ट्रीय महामंत्री अनिल जैन जो फिलहाल छत्तीसगढ़ के प्रभारी भी मौजूद रहे .. सोशल मीडिया की बैठक भी अलग से संपन्न हुई ..लेकिन ऐसे में सवाल खड़ा होना लाजमी है कि जब जनआशीर्वाद यात्रा के जरिए पूरा फोकस शिवराज सिंह चौहान पर बनना तय है तब क्या पार्टी में उनके प्रतिद्वंद्वी, प्रतिस्पर्धी और मतभेद-मनभेद रखने वाले नेताओं के लिए अब भी कोई गुंजाइश बचती है… या फिर तमाम अटकलों पर विराम लगेगा और शिवराज का घोषित नेतृत्व सभी को मंजूर है, और सवाल खड़ा किया जाना बेमानी होगा..

राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के पिछले दो महत्वपूर्ण मध्यप्रदेश दौरे के दौरान दिए गए संदेश और संकेत से नेतृत्व को लेकर जो धारणा बनी थी अब उससे पार्टी बाहर निकल चुकी है.. दरअसल बात पुरानी हो चुकी है, लेकिन पहली बार ये स्थिति तब बनी जब 3 दिन के चिंतन-मंथन के बाद भाजपा के अंदर से ये बात सामने लाई गई थी कि 31 जनवरी को बाइक रैली के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह मध्यप्रदेश में चुनाव का शंखनाद कर देंगे.. उसके बाद पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व त्रिपुरा और दूसरे राज्यों जिसमें कर्नाटक विधानसभा चुनाव शामिल था, उलझ कर रह गया और बाइक रैली पीछे छूट गई.. कर्नाटक चुनाव की व्यस्तता से समय निकालकर एक बार फिर जब अमित शाह भोपाल आए तो उनकी कही गई उस बात का भी जो अर्थ निकाला गया उससे भी ऐसा संकेत गया कि चुनाव संगठन लड़ेगा तो क्या शिवराज सिंह चौहान को रणनीति के तहत पीछे किया गया.. इस बीच केंद्रीय मंत्री रहते नरेंद्र सिंह तोमर ने चुनाव प्रबंध समिति अभियान की कमान संभाली और एक दर्जन उप समितियों का गठन कर दिया .. इन समितियों के जरिए अपवादस्वरूप कुछ अनुभवी और गंभीर नेताओं को छोड़ दिया जाए तो लगभग सभी उन नेताओं को सम्मान के साथ काम पर लगा दिया गया, जिन्होंने पिछले तीन विधानसभा चुनाव में छोटी-बड़ी भूमिका निभाई थी.. इन समितियों से एक संदेश ये भी गया कि चुनाव में सक्रियता और योगदान के लिए जिन गिने-चुने चेहरों को नरेंद्र सिंह ने एक माला में पिरोया क्या उससे प्रदेश में वह नंबर दो हो गए हैं और मुख्यमंत्री शिवराज के पीछे खड़े नजर आने लगे हैं .. शिवराज और नरेंद्र की मजबूत केमिस्ट्री के बावजूद प्रदेश में एक धड़ा ऐसा है, जो इनके हुनर को स्वीकार तो करता है, लेकिन ये वो नेता हैं जो खुद अलग-अलग धड़े में बंटे हुए हैं, यानी चाहकर भी इस जोड़ी पर असंतुष्ट होकर दबाव बनाने में सफल नहीं हो पाए.. इन समितियों का नेतृत्व और जिम्मेदारी ने इस बात का स्पष्ट संकेत दे दिया कि भाजपा का इलेक्शन रोडमैप तैयार है… भेड़ाघाट जबलपुर बैठक के बाद उप समितियों की बैठक का सिलसिला भोपाल में शुरू होगा तो मैदानी क्षेत्र में नेताओं के प्रवास बढ़ने वाले हैं.. जिसके तहत एक ओर शिवराज अपनी सरकार की सौगात जनता तक देने का सिलसिला सरकारी कार्यक्रमों में जारी रखेंगे तो दूसरी ओर संगठन विधानसभा सम्मेलन और संभागीय सम्मेलनों में शिवराज की जनदर्शन यात्रा की सफलता सुनिश्चित करने के लिए जिला स्तर पर कार्यकर्ताओं को एकजुट करेगा .. यानी संगठन के सामने चुनौती अपने नाराज, उपेक्षित, हताश कार्यकर्ताओं में जोश भरने की होगी तो सरकार के सामने बड़ा लक्ष्य अपनी उपलब्धियों का प्रचार-प्रसार कर मतदाताओं की नाराजगी दूर करना होगा.. भाजपा के राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी और बनते-बिगड़ते समीकरणों के बीच शायद राष्ट्रीय नेतृत्व चाहकर भी अब कोई बड़ा हस्तक्षेप करने की स्थिति में नजर आए .. यानी महत्वाकांक्षी और शिवराज से मतभेद रखने वाले नेताओं के लिए अब ज्यादा अवसर नहीं हैं.. अलबत्ता टिकट चयन के दौर में इन नेताओं की एक और कोशिश अपने समर्थकों को टिकट दिलाने की जरूर होगी, जो दबाव प्रदेश नेतृत्व के साथ राष्ट्रीय नेतृत्व के हस्तक्षेप से पूरा कर सकेंगे.. लेकिन तब तक लोकसभा चुनाव 2019 की आहट भी सामने होगी तो कांग्रेस भी मैदानी लड़ाई में भाजपा के सामने चुनौती देने की स्थिति में होगी, लेकिन तब तक शिवराज के चेहरे को सामने रखकर मध्यप्रदेश में भाजपा आर-पार की लड़ाई को लेकर अपनी जमीनी तैयारियों को अंतिम रूप दे चुकी होगी.. तब संभव है कि 25 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की सभाएं भी मध्यप्रदेश में शुरू हो जाएं.. पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व अच्छी तरह जानता है कि मिशन मोदी 2019 लोकसभा चुनाव से पहले मध्यप्रदेश का विधानसभा चुनाव ज्यादा मायने रखता है, जहां इस बार कांग्रेस से सीधी चुनौती मिलने से इनकार नहीं किया जा सकता, तो पार्टी एंटी इनकंबेंसी ध्यान में रखते हुए समस्या का स्थायी समाधान के लिए सारे विकल्प खोल चुकी है.. उसे अच्छी तरह मालूम है कि नगर पालिका, नगर निगम, पंचायत से लेकर विधानसभा और लोकसभा में ज्यादातर उम्मीदवार उसकी अपनी पार्टी भाजपा के हैं, जिनके खिलाफ नाराजगी सिर्फ मतदाता नहीं, बल्कि पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच में एक बड़ी मुसीबत के तौर पर सामने है..