सवाल दर सवाल

डोंट अंडर एस्टीमेट द पॉवर ऑफ ‘नरेंद्र सिंह’ राकेश अग्निहोत्री’ सवाल दर सवाल ‘नया इंडिया

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सवाल दर सवाल
Narendra Singh Tomar
मैन हैड
डोंट अंडर एस्टीमेट द पॉवर ऑफ ‘नरेंद्र सिंह’

12 जून 2018 जन्मदिन विशेष

नरेंद्र सिंह तोमर एक ऐसी शख्सियत जो नेता बड़ा लेकिन खुद को  कार्यकर्ता  मानता .. संगठन हो या सत्ता जिसके लिए  पार्टी के हित सर्वोपरि .. जिसके खाते में छोटे से सियासी सफर में उपलब्धियों की भरमार.. जिसकी भूमिकाएं बदलती रही लेकिन उसने सही मायने में भाजपा के अंदर नेता हो या कार्यकर्ता सबका साथ सबका विकास के मूल मंत्र को आगे बढ़ाया…  जो अपने से वरिष्ठ ,अनुभवी का मार्गदर्शन और भरोसा जीतकर सफलता की पायदान चढ़ता चला गया ..आज जिसे पार्टी और उसके नेता नजरअंदाज नहीं कर सकते.. जिसके समर्थकों की मध्य प्रदेश  के हर जिले में भरमार.. तो विरोधी भी उसे हल्के में नहीं ले सकते.. तोमर सही मायने में बीजेपी कार्यकर्ताओं के बीच नई पीढ़ी के संगठन शिल्पी स्व. कुशाभाऊ ठाकरे के तौर पर लोकप्रिय हैं.. जिन्होंने  प्रदेश से लेकर केंद्र में मंत्री बनने के बावजूद खुद को हमेशा कार्यकर्ताओं के बीच में ही खड़ा पाया.. जो पिछले करीब डेढ़ दशक से मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के लिए मजबूरी कम जरूरी बनकर  उनके साथ लगभग उसी भूमिका में कदमताल कर रहे हैं, जैसे गुजरात से निकलकर केंद्र में नरेंद्र मोदी के साथ अमित शाह.. यानि पद और बदलती जिम्मेदारी से अलग भूमिका में भरोसे की कसौटी पर पार्टी ही नहीं, व्यक्तिगत पहली जरूरत.. जिनकी मजबूत केमिस्ट्री के चलते सरकार में रहते भाजपा ने लगातार एक नहीं दो बार सरकार बनाई.. एक बार फिर इस जोड़ी की समन्वयवादी रणनीति और राजनीति के साथ विश्वसनीयता भाजपा के अंदर और बाहर कसौटी पर लग चुकी है.. नरेंद्र सिंह जितने करीबी शिवराज के उतने ही भरोसेमंद नरेंद्र मोदी के, जो उनकी कैबिनेट के महत्वपूर्ण सहयोगी बने हुए हैं.. तोमर मिशन 2018 और 19 चुनाव में बड़ी भूमिका निभाने को तैयार हैं.. बीजेपी में नेतृत्व परिवर्तन के बावजूद नरेंद्र सिंह उर्फ मुन्ना भैया ने राज्य से लेकर केंद्र की राजनीति में संगठन ही नहीं, सरकार के अंदर अपनी जिस काबिलियत का लोहा मनवाया … नरेंद्र सिंह  उन गिने-चुने नेताओं में होंगे  जो राज्य के नगर निगम से लेकर विधानसभा तो राष्ट्रीय स्तर पर राज्यसभा से लोकसभा  सभी चार महत्वपूर्ण सदन के  सदस्य बने .. नरेंद्र की पहचान  काम छोटा हो या बड़ा  पूरी शिद्दत के साथ किया ..जिनके लिए परिवार नहीं पार्टी सबसे ऊपर..  तवज्जो विचारधारा और कार्यकर्ता को हमेशा दी.. उनकी पूंजी उनका धैर्य, संयम, सरल सहज व्यवहार .. आचरण , कर्म ,सूझबूझ ,सक्रियता  और चरित्र की दम पर  दूरदृष्टि और  सबको साथ लेकर चलते हुए  सुधीर गंभीर व्यक्तित्व के धनी  ने  एक क्षत्रिय होने के नाते हमेशा अनुशासन जुबान के पक्के नेता के तौर पर भाजपा में खुद को स्थापित किया .. सियासत  में उनके विरोधी उनकी चुप्पी और मौन पर सवाल खड़े कर सकते ..लेकिन अहंकार से दूर वादाखिलाफी तो कतई नहीं.. जो वक्त के मिजाज को समय रहते समझकर खुद को उसके अनुरूप ढाल लेना अच्छी तरह जानते हैं.. व्यक्ति विशेष से ज्यादा उन्होंने पार्टी लाइन को हमेशा सर्वोपरि मानकर समय-समय पर बखूबी अपनी अहमियत का एहसास भी कराया.. इसे संयोग ही कहा जाएगा कि नरेंद्र सिंह तोमर अपना जन्मदिन पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की मौजूदगी में उस दिन मनाएंगे.. जब उनके नेतृत्व में गठित प्रदेश चुनाव प्रचार प्रबंध समिति की बैठक में चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए चुनावी रणनीति को अंजाम तक पहुंचाने के लिए एक्शन प्लान तैयार किया जाएगा.. कह सकते हैं कि सियासत के इस मंजे हुए खिलाड़ियों के खिलाड़ी जो राष्ट्रीय और प्रदेश नेतृत्व के बीच संपर्क-समन्वय के साथ सेतु की भूमिका में हंै.. की चुनावी साल में दूरदर्शिता और उनकी ताकत को पार्टी के अंदर कोई चाहकर भी नजरअंदाज नहीं कर सकता, तो विरोधियों के लिए भी संदेश साफ है ‘डोंट अंडर एस्टीमेट द पॉवर ऑफ नरेंद्र सिंह तोमर..’
भाजपा में चाहे अटल-आडवाणी का युग हो या फिर मोदी और शाह की बीजेपी, कम समय में छोटे कद के बड़े नेता बन कर उभरे नरेंद्र सिंह तोमर के सियासी सफर पर गौर किया तो सफलता उनके कदम चूमने को मजबूर हुई.. इसे बदलते राजनीतिक परिदृश्य में तोमर को किस्मत का धनी कहा जाए या फिर पुण्यायी जो उन्होंने पार्षद से लेकर केंद्रीय मंत्री रहते कार्यकर्ताओं का दिल जीत कर कमाई.. पार्टी ने उनकी अहमियत को समझा तो नेताओं की वो जरूरत बन बैठे.. 1980 में  एसएलपी कॉलेज ग्वालियर के अध्यक्ष और युवा मोर्चा के जिलाध्यक्ष बनने से पहले 1977 में नरेंद्र सिंह तोमर मंडल अध्यक्ष बन चुके थे.. 1983 में पार्षद और 1993 का विधानसभा चुनाव हारने के बाद 1998 और 2003 के बाद कभी मुड़ कर नहीं देखा .. उमा भारती बाबूलाल गौर शिवराज सिंह चौहान के साथ एक ही विभाग के मंत्री रहते हुए सीधे राज्यसभा में पहुंचे और फिर  मुरैना  ग्वालियर से लोकसभा चुनाव भी जीते .. सरल ,सौम्य,  मृदुभाषी तोमर कई अहम पदों पर रहते हुए भी  खुद को एक कार्यकर्ता ही मानते हैं.. जिन्होंने कभी महत्वाकांक्षाओं को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया.. हमेशा नई चुनौती को स्वीकार किया और नई राह पकड़ कर आगे बढ़ते चले गए.. सिंधिया घराने के दबदबे वाले ग्वालियर जहां से निकलकर अटल बिहारी बाजपेई ने जनसंघ से लेकर भाजपा को एक नई ऊंचाई प्रदान की .. इस शहर की राजनीति में कई दिग्गजों  के बीच एक छोटे परिवार से निकलकर नरेंद्र सिंह ने पद-प्रतिष्ठा से बेफिक्र खुद को  स्थापित किया …इस जोखिम के चलते उन्हें पिछले डेढ़ दशक के अंदर कई महत्वपूर्ण किरदार निभाने का मौका मिला, चाहे फिर वो मध्यप्रदेश के अंदर सत्ता और संगठन की राजनीति हो या फिर केंद्र की सियासत, सफलता की पायदान वो चढ़ते गए.. जब केंद्र में मनमोहन सरकार थी तब भाजपा की राजनीति में राजनाथ सिंह से लेकर नितिन गडकरी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, राष्ट्रीय महामंत्री रहते उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में संगठन में कसावट लाने की बड़ी जिम्मेदारी वो बतौर प्रभारी निभाते रहे, तो नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उत्तर प्रदेश से लेकर गुजरात चुनाव में केंद्रीय मंत्री रहते चुनाव में उनकी सक्रियता किसी से छुपी नहीं.. मध्यप्रदेश में तो लगातार भाजपा को सरकार में वापस लाने के समय चेहरा भले ही शिवराज का सामने रखा गया, लेकिन प्रदेश अध्यक्ष की भूमिका नरेंद्र सिंह तोमर नहीं निभाई, जो एक बार फिर पदोन्नति के साथ चुनाव प्रबंधन की जिम्मेदारी मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में निभाने जा रहे हैं.. शायद यही वजह है कि जब नरेंद्र मोदी से लेकर शिवराज सिंह चौहान की साख दांव पर लग चुकी है तब नरेंद्र सिंह तोमर दोनों की पसंद और भरोसेमंद बनकर एक ऐसी भूमिका निभा रहे हैं, जिससे कहने वाले दो नाव की सवारी कर सकते हैं.. एक ओर नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में केंद्रीय मंत्री तो दूसरी ओर शिवराज सिंह चौहान को एक बार फिर मुख्यमंत्री बनाने के लिए चुनाव प्रबंधन समिति की कमान मध्यप्रदेश में वो संभाल चुके हैं.. बदलती बीजेपी में यदि कुछ नहीं बदला तो वो है केंद्र में नरेंद्र मोदी का चेहरा.. मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान का चेहरा.. मध्यप्रदेश से लेकर केंद्रीय राजनीति में पार्टी के अंदर दूसरे दिग्गज नेताओं के लिए भले ही नरेंद्र तोमर आंख की किरकिरी बन चुके हों, लेकिन उनके निशाने पर केंद्र में राहुल गांधी तो मध्यप्रदेश में कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया.. ग्वालियर-चंबल की राजनीति से निकले नरेंद्र सिंह का दिल्ली में भले ही दखल बढ़ता गया, लेकिन मध्यप्रदेश के कार्यकर्ताओं से उन्होंने कभी दूरी नहीं बनाई.. मध्यप्रदेश में सत्ता में रहते अध्यक्ष बदले गए और प्रभात झा से लेकर नंदकुमार सिंह चौहान ही नहीं, राकेश सिंह के मुकाबले नरेंद्र सिंह सबसे ज्यादा लोकप्रिय अध्यक्ष के तौर पर सामने हैं.. नरेंद्र सिंह की शिवराज सिंह चौहान के साथ चुनाव में जोड़ी कुछ इस तरह की है जैसे कांग्रेस में कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया की, जो सीएम इन वेटिंग की दौड़ में शामिल हैं तो शिवराज के बाद यानि जब भी उनकी भूमिका बदलेगी तो नरेंद्र तोमर उनके उत्तराधिकारियों में सबसे बड़े दावेदार के तौर पर सामने होंगे.. जिन्होंने चुनाव में प्रबंधन के बढ़ते हस्तक्षेप के बावजूद बूथ मैनेजमेंट की ताकत को कभी कम नहीं होने दिया.. शिवराज सरकार में मंत्रिमंडल का विस्तार हो या फिर संगठन का पुनर्गठन, तोमर को भरोसे में लेकर ही भाजपा मध्यप्रदेश में आगे बढ़ती रही.. पीढ़ी परिवर्तन के दौर में संघ के नुमाइंदों के तौर पर संगठन महामंत्री की भूमिका में कप्तान सिंह से लेकर माखन सिंह या फिर अरविंद मेनन से लेकर सुहास भगत, नरेंद्र सिंह का महत्व सभी ने समझा.. राज्यसभा चुनाव से लेकर विधानसभा और लोकसभा चुनाव में टिकट चयन में शिवराज और नरेंद्र की जोड़ी ने अभी तक जो चाहा वो किया, अब जब मोदी और शाह के हस्तक्षेप की मध्यप्रदेश में चर्चा जोर पकड़ रही और भाजपा को एंटी इनकंबेंसी के समाधान की बड़ी चुनौती चिंता के तौर पर सामने है तब तमाम सर्वे और सर्वेक्षण के बावजूद नरेंद्र सिंह की भूमिका को राष्ट्रीय नेतृत्व शायद नजरअंदाज ना कर सके.. नरेंद्र सिंह ने मध्यप्रदेश में भाजपा के लिए सिर्फ चुनाव जीतने वाले उम्मीदवार ही नहीं  तराशे और तलाशे बल्कि कांग्रेस को हराने के लिए चुनावी गणित को जिस तरह से बदला उसे उनके प्रतिस्पर्धी और विरोधी बहुत देर में समझ पाए.. कह सकते हैं कि डमी उम्मीदवारों की मौजूदगी चुनाव में कांग्रेस के गणित को गड़बड़ाती रही है.. इसके पीछे भी दिमाग नरेंद्र सिंह तोमर का ही चलता रहा.. 2018 विधानसभा चुनाव के लिए मोदी और शाह जैसा तिलिस्मी नेतृत्व भले ही भाजपा के पास हो, लेकिन जब उसे स्व. अनिल दवे की प्रबंधन क्षमता की कमी खल रही तब नरेंद्र सिंह ने घोषित तौर पर इस जिम्मेदारी को नई चुनौती के तौर पर संभाला है.. जिन्होंने विधानसभा के साथ अब लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए समिति का गठन कर एक दर्जन उप समितियों में कुछ अपवाद छोड़ दें तो लगभग सभी अनुभवी नेताओं को एडजस्ट कर समन्वय की राजनीति को आगे बढ़ाया है.. नरेंद्र सिंह अपने इस जन्मदिन पर अमित शाह की मौजूदगी में विधानसभा चुनाव के एक्शन प्लान को अंतिम रूप देंगे ..तो नरेंद्र सिंह जिन्होंने  समन्वय ,सहयोग और सामंजस्य की सियासत में  बीच का रास्ता निकाल कर भाजपा को सफलता दिलाई उनकी दूरदर्शिता और लंबा सियासी अनुभव एक बार फिर कसौटी पर होगा..