सवाल दर सवाल

(कांग्रेस में ‘अंधविश्वास’ तो ‘अतिआत्मविश्वास’में भाजपा) राकेश अग्निहोत्री ‘सवाल दर सवाल’ नया इंडिया

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सवाल दर सवाल, राकेश अग्निहोत्री ,नया इंडिया नया
(कांग्रेस में ‘अंधविश्वास’ तो ‘अतिआत्मविश्वास’में भाजपा)
राहुल गांधी के मंदसौर दौरे के बाद कांग्रेस तो अमित शाह के जबलपुर आने के साथ भाजपा में भी चिंतन-मंथन बैठक फिर शुरू होने जा रही है.. शायद दोनों दल वक्त के साथ बदलती चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए अपने फैसलों की समीक्षा को मजबूर हुए.. कांग्रेस में यदि कमलनाथ अपने नेताओं पर भरोसा से भी आगे अंधविश्वास को मजबूर हंै.. तो इससे उलट भाजपा में सीधे अमित शाह खुद पुनर्निरीक्षण की व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी के तौर पर जुड़े हो लेकिन प्रदेश नेतृत्व अति आत्मविश्वास में नजर आ रहा है.. मध्यप्रदेश में चुनावी साल में मानसून की दस्तक से पहले ही मुख्यमंत्री शिवराज लगभग सभी जिला मुख्यालयों का दौरा कर कार्यकर्ताओं से लेकर जनता की नब्ज टटोल चुके हैं .. तो दूसरी ओर कांग्रेस अभी तक कुनबे की राजनीति से बाहर नहीं निकल पाई .. अलग-अलग क्षेत्रों में क्षत्रपों की सक्रियता को कमलनाथ अपनी कामयाबी का जरिया समझ बैठे …जो कार्यकाल का एक माह गुजर जाने के बावजूद नई भूमिका में ये संदेश नही दे पाए कि शिवराज की काट और बेहतर विकल्प उनके पास है.. बात सिर्फ सीएम इन वेटिंग की नहीं, बल्कि मतदाताओं और कार्यकर्ताओं के बीच स्वीकार्यता और कनेक्टिविटी की भी है.. जो मध्य प्रदेश के अगले 25 साल के विज़न को लेकर मध्य प्रदेश की जनता को यह सोचने को मजबूर करे कि बदलाव जरूरी है.. ऐसे में सवाल खड़ा होना लाजमी है कि राहुल गांधी युवाओं और किसानों पर फोकस कर शिवराज सरकार के खिलाफ जो एजेंडा सेट कर गए थे तो वजह क्या है जो लगभग एक हफ्ते पूरा होने को हैं फिर भी कांग्रेस की दिशा को लेकर उसके नेता और कार्यकर्ता अाखिर भ्रमित क्यों नजर आ रहे हैं.. दूसरी ओर शिवराज ने तमाम आशंकाओं को निराधार साबित कर प्रस्तावित किसान आंदोलन के 10 दिन के अंदर भाजपा और अपनी सरकार को अपने दम पर भले ही संकट से बाहर निकाल लिया हो.. लेकिन जमीनी हकीकत खासतौर से कार्यकर्ताओं की नाराजगी और गुस्सा को लेकर या तो वह अंजान बने हुए हैं या अभी भी उनके पास सही फीडबैक नहीं पहुंच रहा.. ऐसे में त्रिस्तरीय मिली-जुली एंटी इनकंबेंसी का स्थायी समाधान निकालना शीर्ष नेतृत्व के लिए अभी भी किसी चुनौती से कम नहीं बना है तो आखिर क्यों..? ऐसे में फिर अमित शाह का हस्तक्षेप और क्रॉस चेक व्यवस्था क्या भाजपा को मध्यप्रदेश में पटरी पर ला पाएगी तो वो फार्मूला क्या होगा..? क्योंकि अब तो मध्यप्रदेश में मोदी सरकार के साइड इफेक्ट भी उसके कार्यकर्ताओं की दुविधा बढ़ा रहे हैं..

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सेंटर हेड
(एंटी इनकंबेंसी भुनाने का माद्दा कांग्रेस और उसके नेताओं में कैसे कब नजर आएगा)
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कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह दोनों के रडार पर मध्यप्रदेश आ चुका है, जो मिशन 2019 लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए विधानसभा चुनाव 2018 हर हाल में जीतना चाहते हैं.. राहुल गांधी ने जोड़ी बना कर पुरानी और नई पीढ़ी दोनों का भरोसा और समर्थन जीतने के लिए अनुभवी कमलनाथ तो युवा सिंधिया को पार्टी के दूसरे नेताओं के मुकाबले बहुत आगे ला खड़ा कर दिया, जिसके साथ ही संदेश ये जा चुका है कि चुनाव में मुख्य भूमिका किसकी होगी, लेकिन अभी तक ना तो कमलनाथ और ना ही ज्योतिरादित्य कुछ विशेष मोके छोड़ दिए जाए तो सीधे पब्लिक के बीच में अपनी छाप नहीं छोड़ पाए.. कमलनाथ बिना पदाधिकारियों की कांग्रेस के अध्यक्ष बनकर समितियों पर भरोसा करने को कुछ ज्यादा ही मजबूर नजर आते हैं.. प्रदेश प्रभारी दीपक बावरिया की कोशिश दिल्ली से तालमेल तो प्रदेश संगठन को नीचे स्तर तक मजबूत बनाने की है, लेकिन प्रदेश कांग्रेस कार्यालय से दूर चाहे वो दिग्विजय सिंह की समन्वय समिति का बुंदेलखंड से लेकर होशंगाबाद तक पहुंचा दौरा हो या अजय सिंह से ज्यादा चर्चा नेता प्रतिपक्ष की न्याय यात्रा की हो, कमलनाथ को इसकी गहराई तक जाना होगा कि कांग्रेस के पक्ष में क्या और कैसा माहौल बन रहा है समन्वय बनाया और बिगड़ा .. गुटबाजी से अभी भी पार्टी बाहर नहीं निकल पाई है, क्योंकि समन्वय समिति के दौरे के बाद जो खबरें आ रही हैं उसका टिकट कनेक्शन कार्यकर्ताओं में चर्चा का विषय बन चुका है.. इन जिम्मेदार नेताओं ने भले ही शिवराज और भाजपा को निशाने पर लेकर अपनी सक्रियता और जवाबदेही का एहसास कराया हो, लेकिन इन नेताओं की पुरानी अंतरंगता, व्यक्तिगत रिश्ते कहीं ना कहीं उन कार्यकर्ताओं और नेताओं की उम्मीदों पर पानी फेरते नजर आ रही, समिति के सदस्य मैं अपने विरोधियों या समर्थकों आखिर किस को दौरे के दौरान ज्यादा तवज्जो दी.. किनके घर खाना खाकर और चाय पीकर कितने रूठे नेताओं को मनाया या फिर कितनों को नाराज कर गए.. जो समिति के दौरे के बाद ये मान बैठे थे कि बड़े नेता समन्वय नहीं बिगड़ने देंगे.. या फिर इसके पीछे एजेंडा कुछ और है.. शायद कार्यकर्ता चाहता कि कमलनाथ समीक्षा के नाम पर पुनर्निरीक्षण की व्यवस्था पर भी गौर करें.. कुल मिलाकर कमलनाथ के लिए एकजुटता का संदेश देना अभी भी बड़ी चुनौती है, क्योंकि कांग्रेस पुराने ढर्रे से बाहर नहीं निकल पाई है.. जिन नेताओं की स्वीकार्यता पर पार्टी के अंदर सवाल उठते रहे और जो जनता से संवाद करके भी भाजपा को एक्सपोज़ नहीं कर पाए.. पार्टी के नेता अभी यह कहते मिल जाएंगे कि अगर इसी ठर्रे पर कांग्रेस आगे बढ़ती गई तो फिर उसका भगवान ही मालिक है.. किसानों को कर्ज माफी का भरोसा दिलाकर राहुल गांधी जो माहौल कांग्रेस के पक्ष में बनता हुआ देखना चाहते थे, शिवराज ने उसकी हवा निकालने में कोई कसर नहीं छोड़ी.. भावांतर की विफलता से ज्यादा चर्चा कृषक समृद्धि योजना की शुरू हो चुकी है, जिसके जरिए प्रदेश के किसानों के खाते में करोड़ों रुपए भेज दिए गए.. वो भी तब जब किसान संगठन भारत बंद का दावा कर मध्यप्रदेश के हालातों पर सवाल खड़ा कर रहे थे.. कांग्रेस ने जिस जोर शोर के साथ चुनाव आयोग में दस्तक देकर साठ लाख फर्जी मतदाताओं को लेकर मध्य प्रदेश में चुनाव से पहले सनसनी फैला दी थी आख़िर उसकी हवा क्यों निकलती नजर आ रही ..सवाल यहीं पर खड़ा होता है कि कांग्रेस, उसके दिग्गज नेता क्या कर रहे थे, आखिर वह अपनी बात जनता तक असरदार तरीके से क्यों नहीं पहुंचा पा रहे बिना तैयारी के वह मीडिया से क्या अपेक्षा रखते हैं ..सिर्फ विज्ञप्ति, बयान और सोशल मीडिया पर सवाल खड़ा करने से मैदानी लड़ाई में कांग्रेस मजबूत हो सकेगी? ये सच है कि पिछले चुनाव के मुकाबले कांग्रेस की एकजुटता को लेकर उसके नेता गंभीर हैं, लेकिन अभी तक जनता के बीच जाकर विरोधी भाजपा और उसकी सरकार के खिलाफ आक्रोश पैदा कर जो माहौल उसे बना देना चाहिए था वो चाहकर भी नहीं बना पाई.. सोमवार को एक बार फिर कमलनाथ की मौजूदगी में चुनाव प्रचार अभियान, घोषणा पत्र समिति, समन्वय समिति, अनुशासन समिति के साथ चार कार्यकारी अध्यक्षों के साथ बैठकों का दौर शुरू होने वाला है, जिसके बाद एक्शन प्लान सामने आ सकता है.. भाजपा के मुकाबले कांग्रेस में बड़ा फर्क ये है कि अमित शाह जहां जिम्मेदार और जवाबदेह नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ बैठक कर चुनावी रणनीति को क्रमशः आगे बढ़ा रहे हैं तो कांग्रेस में ये काम खुद प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ के कंधे पर है, जिन्होंने प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में अपनी धमक का एहसास भी कराया है, लेकिन विधानसभा और बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं के बीच कोई ऐसा संदेश नहीं जा पाया, जिससे लगे कि कांग्रेस इस निर्णायक लड़ाई को लेकर कमर कस चुकी है.. वजह साफ है कि कुनबे से जुड़े नेता नई और पुरानी भूमिका में अपनी ढपली अपना राग की कहावत चरितार्थ करते हुए नजर आ रहे हैं.. आखिर इनका मूल्यांकन, अवलोकन और समीक्षा कौन करेगा..? बड़ा सवाल कमलनाथ का सहयोगी नेताओं पर अंधविश्वास क्या कांग्रेस पर भारी पड़ेगा..

 

(भाजपा के लिए बड़ी चुनौती डबल एंटी इनकंबेंसी)
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अिमत शाह करीब 5 हफ्ते बाद एक बार फिर मध्यप्रदेश के दौरे पर जबलपुर पहुंचेंगे, जहां प्रदेश भाजपा के चुनिंदा नेताओं के साथ जिसमें चुनाव प्रबंध समिति और कोर कमेटी के सदस्य खासतौर से शामिल होने वाले हैं.. नए प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह और नई भूमिका में नरेंद्र सिंह की जोड़ी के बीच मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ अमित शाह का चिंतन-मंथन मायने रखता है, क्योंकि प्रदेश प्रभारी और चुनाव प्रभारी जो राष्ट्रीय नेतृत्व के प्रतिनिधि के तौर पर पिछले चुनाव में बड़ी भूमिका निभाते रहे हैं, उनका अभी तक कोई अता-पता नहीं है.. राष्ट्रीय संगठन महामंत्री रामलाल ही चुनावी एजेंडे को आगे बढ़ाने को मजबूर हैं.. 4 मई को अमित शाह ने भोपाल में जब कहा था कि इस बार विधानसभा का चुनाव संगठन लड़ेगा तो उसके बाद ये संदेश चला गया था कि क्या शिवराज को पीछे किया जा रहा है, लेकिन कर्नाटक, उत्तर प्रदेश समेत देश में हुए लोकसभा और विधानसभा के उपचुनाव में भाजपा के बैकफुट पर आने के बाद भाजपा को जब एनडीए के घटकों को मनाने के लिए मशक्कत करना पड़ रही है, तब समझा जा सकता है कि मुख्यमंत्री शिवराज को नजरअंदाज करना राष्ट्रीय नेतृत्व के लिए कितना महंगा पड़ सकता है, जो सरकारी स्तर पर ही सही पूरे मध्य प्रदेश का दौरा कर चुके हैं जो मुख्यमंत्री के तौर पर अपने स्तर पर जिस में हितग्राही शामिल जिनके लिए सरकार ने व्यक्तिगत स्तर पर आर्थिक मदद की योजनाएं चलाई उस पर शिवराज अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखना चाहते हैं। खासतौर से लोकसभा चुनाव 2019 यानी मिशन मोदी से पहले.. क्या विधानसभा चुनाव 2018 में.. अब समय आ गया है जब अमित शाह स्पष्ट तौर पर ये संदेश दें कि शिवराज के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ा जाएगा.. मध्यप्रदेश में शिवराज की नरेंद्र तोमर की नई भूमिका के साथ मजबूत जोड़ी एक बार फिर चर्चा में है.. इन दोनों नेताओं की अंडरस्टेंडिंग कहें या फिर समय के साथ विरोधियों से ज्यादा पार्टी के अंदर मिलने वाली चुनौतियों से निपटने की रणनीति, दूसरे नेताओं की भूमिका अभी तक सिर्फ एडजस्टमेंट तक सीमित होती नजर आ रही है.. कांग्रेस के मुकाबले भाजपा खासतौर से शिवराज सक्रिय और संजीदा लेकिन समन्वय के मोर्चे पर संगठन स्तर पर तैयारियां आधी-अधूरी नजर आ रही हैं चाहे फिर वो एकरूपता का अभाव कहें या फिर निर्णय लेने में देरी.. हालांकि इस धारणा को तोड़ने के लिए चुनाव प्रबंध समिति के अधीन 12 उप समितियों का गठन कर दिया गया है, लेकिन मैदानी लड़ाई के मोर्चे पर कई जिलों में वहां के जिलाध्यक्ष की निष्िक्रयता और उनके चुनाव लड़ने की महत्वाकांक्षा संगठन को कमजोर कर रही है तो कई पदाधिकारियों के विधानसभा चुनाव लड़ने की जोड़-तोड़ ही भाजपा पर सवाल खड़ा कर रही है.. संभागीय बैठकों की तैयारी आधी अधूरी पिछले दो विधानसभा चुनाव में जिस वॉर रूम ने चुनावी जमावट के साथ काम करना बहुत पहले शुरू कर दिया था उसका धनी-धोरी अभी तक कोई तय नहीं हुआ है.. महत्वपूर्ण फैसले में अनिर्णय की स्थिति और संगठन में शिथिलता और कसावट की कमी उसकी तैयारियों को कागजी साबित कर रही है.. अमित शाह ने भले ही ये कहा था कि चुनाव इस बार संगठन लड़ेगा, लेकिन मध्यप्रदेश में संगठन स्तर पर जो सक्रियता नजर आना चाहिए थी वो नहीं दिख रही है.. मतदाताओं के बीच में शिवराज को लेकर इतनी नाराजगी नहीं है, जितनी भाजपा संगठन से जुड़े कार्यकर्ताओं के अंदर व्यवस्था को लेकर है.. इसे सत्ता में रहते कार्यकर्ताओं की उपेक्षा का नतीजा कहा जाए या फिर शीर्ष नेतृत्व का अतिआत्मविश्वास जो स्पष्ट संदेश अभी तक बूथ स्तर तक चला जाना चाहिए था उसे देने में प्रदेश नेतृत्व सफल नहीं माना जा सकता.. जिस तरह कांग्रेस में कमलनाथ और ज्योतिरादित्य के इर्द-गिर्द राहुल गांधी ने फोकस बनाया है कुछ यही हालात मध्यप्रदेश में उसके शीर्ष नेतृत्व की नजर में शिवराज और नरेंद्र के इर्द-गिर्द सिमटकर रह गया है.. राष्ट्रीय पदाधिकारियों समेत दूसरे दिग्गज नेताओं को सम्मान के साथ चुनाव प्रबंध की उप समितियों में भले ही एडजस्ट कर कर दिया गया हो, लेकिन उन्हें भी काम की तलाश है.. अमित शाह के दौरे से पहले इन समितियों की अनौपचारिक बैठक भी नहीं हो पाई है ..तो जबलपुर दौरे के दौरान इनकी मुलाकात राष्ट्रीय अध्यक्ष से दूर की कौड़ी नजर आ रही है.. भाजपा ने किसानों का भरोसा, समर्थन और उनका वोट हासिल करने के लिए भले ही उनके खाते में बड़ी रकम पहुंचा दी हो, लेकिन राहुल गांधी के कर्ज माफी की काट और उसका तोड़ निकालना अभी भी बड़ी चुनौती बना हुआ है.. मुख्यमंत्री शिवराज के लाख कहने के बावजूद मंत्री-विधायक से लेकर संगठन के नेता, कार्यकर्ता जनता के बीच जाकर ये समझाने में सफल नहीं हो पा रहे है कि किसानों के लिए कर्ज माफ अब जरूरी नहीं रह गई.. भाजपा मीडिया के कायाकल्प की कोशिश है प्रभात झा को आगे रखकर भले ही की गई लेकिन सोशल मीडिया से लेकर न्यूज़ चैनलों की डिबेट हो या फिर अखबारों का कवरेज जो आक्रमकता तर्क और तथ्यों के साथ नजर आना चाहिए उसकी कमी शीर्ष नेतृत्व महसूस कर रहा है ..कांग्रेस देर-सवेर जब भी जनता के बीच पहुंचेगी तो वो कर्जमाफी के साथ बेरोजगारी को बड़ा मुद्दा बनाने वाली है… शिवराज और नरेंद्र सिंह तोमर यदि यह सोचते हैं कि सिर्फ उपलब्धियों के आधार पर वो चुनाव जीत जाएंगे या फिर दिग्विजय सिंह के 10 साल की तुलना में शिवराज के 13 साल को अपनी बड़ी कामयाबी बताएंगे तो शायद इस बार राह आसान हो जाएगी, ये कहना शायद जल्दबाजी होगी.. क्योंकि इस बार कमजोर कड़ी पार्टी कब वह कार्य करता है जो अभी तक जनता और सरकार के बीच में बड़ी भूमिका निभाता रहा ..इस बार वह भले ही गुस्से का इजहार न करें लेकिन संतुष्ट और खुश भी नहीं है वह यदि मौन और शांत होकर अपने घर बैठ गया तो भाजपा नेतृत्व का अति आत्मविश्वास धरा का धरा रह जाएगा..