सवाल दर सवाल

प्रभात झा ‘20 साल बाद’ फिर उस कुर्सी पर क्यों बैठे… राकेश अग्निहोत्री ‘सवाल दर सवाल’ नया इंडिया

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राकेश अग्निहोत्री :सवाल दर सवाल: नया इंडिया
प्रभात झा ‘20 साल बाद’ फिर उस कुर्सी पर क्यों बैठे…

किसके लिए मुफीद और किसके लिए मुसीबत बनेंगे भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष
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प्रभात झा यानी अमित शाह की टीम में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और राज्यसभा सांसद.. मीडिया का जाना पहचाना चेहरा जिन्होंने जो बड़ा मुकाम हासिल किया उसे उनके लंबे सियासी संघर्ष का अहम पड़ाव माना जा सकता … सियासत में बढ़ते कदम यानी इस सफलता के पीछे पत्रकारिता की पृष्ठभूमि को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता ..राष्ट्रीय स्तर पर कमल संदेश से लेकर स्वदेश अखबार की इस पुरानी लंबी यात्रा के दौरान   प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष की जिम्मेदारी उनके लिए  किसी टर्निंग पॉइंट से कम नहीं था ..एक लाइन में कहें तो सियासी उठापटक  के दौरान सही वक्त पर अपनी अहमियत का एहसास कराने के लिए बिना समय गवाएं पोजीशन लेना हो या फिर जरूरी  दांव पेंच में खुद को वक्त के अनुरूप ढाल पीछे पहुंच जाना  कोई प्रभात झा से सीखे.. मीडिया की त्रिस्तरीय व्यवस्था में मालिक ,प्रबंधन और रिपोर्टर का  कैसे कब उपयोग किस स्तर पर किया जाए शायद मध्यप्रदेश भाजपा में उनसे बेहतर कोई दूसरा जानता .. लेकिन जब  उन्होंने शिवराज की दूरदर्शिता और कार्यशैली का खुद को कायल बताकर पोखरण विस्फोट का हवाला दिया तो सवाल खड़े हुए और किए अभी गए  ..तब से  भाजपा के अंदर यह कहने वाले भी मिल जाते की तमाम काबिलियत के बावजूद संकट भरोसे का उनके अपनी पार्टी  नेताओं के सामने खड़ा  होता रहा है.. लेकिन यह भी कड़वा सच है की पार्टी के नेता उन पर भरोसा करने को मजबूर होते और जब शीर्ष नेताओं को विरोधियों पर हमला करने के लिए  किसी कंधे की जरूरत होती  तो प्रभात झा को ही आगे किया जाता रहा .. जो बड़े बड़े दावे तो करते रहे  लेकिन  पूरे पत्ते कभी नहीं खोले.. कभी संदेश यह गया कि वह पार्टी के लिए संकटमोचक और मुफीद तो कभी लगा कि नई मुसीबत खड़ी कर रहे ..ग्वालियर चंबल की स्थानीय क्षेत्रीय राजनीति में जब दिग्गजों  का बोलबाला और बढ़ता हस्तक्षेप प्रदेश स्तरीय ही नहीं राष्ट्रीय राजनीति में तब भी प्रभात हमेशा सुर्खियों में बने रहते .. राष्ट्रीय स्तर पर  राजनाथ सिंह से लेकर नितिन गडकरी और अमित शाह  के साथ जुड़ना या फिर शिवराज से लेकर नरेंद्र सिंह बड़े उदाहरण के तौर पर सामने हैं जिससे उनके बिगड़ते बनते सियासी रिश्ते की खटास और मिठास समय-समय पर भाजपा की अंदरूनी राजनीति में उबाल लाते रहे ..2003 विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश  मीडिया प्रभारी के तौर पर दीनदयाल परिसर से भाजपा को एक नई दिशा देने वाले प्रभात झा की यूं तो भूमिकाएं बदलती रही.. लेकिन एक बार फिर करीब दो दशक बाद जो अहम जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गई है… उसे मीडिया समन्यवक कहा जा सकता तो सीधे शब्दों में भाजपा के अंदर मीडिया से जुड़ी लंबी फौज का सुप्रीमो भी माना जा सकता है.. जो एक मार्गदर्शक के तौर पर अब मीडिया प्रभारी से लेकर मुख्य प्रवक्ता और उनकी टीम को चुनाव की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए एक नई पहचान देने जा रहे हैं.. इससे पहले उन्हें शिवराज सिंह चौहान की प्रस्तावित जनआशीर्वाद यात्रा का प्रमुख बनाया जा चुका.. अब उन्हें भाजपा का मीडिया कंसल्टेंट.. बताया जा रहा .. जो  रविवार से ही  भाजपा मीडिया से जुड़े  नेताओं  का मार्गदर्शन करेंगे .. ऐसे में मीडिया फ्रेंडली प्रभात झा से सत्ता और संगठन ही नहीं पार्टी के हाईकमान की अपेक्षाएं बढ़ना लाजमी कि चुनाव साल में भाजपा बैकफुट पर ना आए ..कमलनाथ और ज्योतिरादित्य पर राहुल गांधी ने जो दांव लगाया आख़िर उसकी हवा कैसे निकाली जा सकती, यह झा को सोचना होगा.. प्रभात झा के लिए शिवराज की यात्रा की सफलता सुनिश्चित करने के लिए मैदान में कड़ी मेहनत कर उनके लिए यदि माहौल बनाने की है तो मीडिया कंसल्टेंट के तौर पर दिमागी एक्सरसाइज के लिए भी समय निकालना होगा जिससे कांग्रेस पर पलटवार नहीं बल्कि उसे सफाई देने को मजबूर किया जा सके प्रभात झा को इस बार विरासत में मीडिया प्रभारी लोकेंद्र पराशर और उनकी टीम के साथ मुख्य प्रवक्ता दीपक विजयवर्गीय जियो और उनके सहयोगियों का साथ मिला है ऐसे में कांग्रेस से निपटने से पहले उनके लिए सबसे अहम चुनौती मीडिया सेल के बीच संतुलन बनाने की होगी जिनमें से अधिकांश अपना मूल काम छोड़कर बाकी काम कर व्यक्तिगत अपनी राजनीति जमकर चमका रहे शायद यही कारण है कि शिवराज नरेंद्र सिंह राकेश सिंह और सुहास भगत को एक अनुभवी वीडियो और मर्मज्ञ की तलाश थी जय उन्हें प्रभात झा की तरह मिल गया फैसला सम्मानजनक नजर आए तो उसके लिए एक विशेष व्यवस्था बनाई गई जिसमें एडजस्टमेंट कम उपयोगिता का संदेश ज्यादा जाए कुछ इसी तरह केंद्रीय मंत्री रहते जब प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर नरेंद्र तोमर ने वापस मध्यप्रदेश लौटने से इंकार कर दिया तो उनके बच्चे सियासी कद और दीर्घ अनुभव को ध्यान में रखते हुए प्रबंध समिति का गठन कर उन्हें शिवराज के समकक्ष लाकर खड़ा करने की कोशिश की जिसके वह हकदार भी मानी जाती है ठीक इसी तरह दो दशक लंबे अनुभव को आधार बनाकर पूर्व प्रदेश अध्यक्ष राष्ट्रीय उपाध्यक्ष  सांसद प्रभात झा को भी यह कहकर काम पर लगा दिया गया कि आप मीडिया को कोऑर्डिनेटर करेंगे जो मुद्दों की बारीक समझ रखते हैं तो उसे कैसे भुनाया जाए उसका महारथी माना जाता है.. पार्टी का एक धड़ा का मानना है कि चुनाव में प्रभात झा का इससे बेहतर इस्तेमाल दूसरा कोई हो नहीं सकता तो ऐसे लोग भी मिल जाएंगे जिनका कहना है कि की जवाबदेही बढ़ने के साथ झा अंडर कंट्रोल   रहेंगे और जाने अनजाने ही सही गाहे-बगाहे अब वह पोखरण जैसा ना तो विस्फोट कर पाएंगे और ना ही कभी पार्टी के लिए वह सिरदर्द बनेगे.. मध्य प्रदेश के बड़े मीडिया हाउस से उनका संपर्क पुराना है तो मैदानी रिपोर्टरों की अहमियत को भी वह अच्छी तरह समझते हैं यही नहीं अगले कुछ माह के दौरान जब नरेंद्र मोदी अमित शाह से लेकर राहुल गांधी मध्यप्रदेश में आमने सामने खड़े नजर आएंगे तो दिल्ली से मध्यप्रदेश में दखल रखने वाले मीडिया का भी प्रभात भाजपा के पक्ष में बेहतर इस्तेमाल कर सकते हैं तमाम काबिलियत और लंबे अनुभव के बाद भाजपा मीडिया सेल से जुड़े सभी दूसरे सहयोगियों का बिना राग द्वेष के बेहतर इस्तेमाल करना और उनके बीच में समन्वय बनाए रखना नई चुनौती होगी.. आने वाले समय में भाजपा का पूरा फोकस जिस जनआशीर्वाद यात्रा पर होगा उसका नेतृत्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ही करेंगे या नहीं शिवराज की ब्रांडिंग के लिए सिर्फ भोपाल नहीं बल्कि पूरे प्रदेश में मीडिया कवरेज और वह मतदाताओं के गले उतरे इसे सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी दूसरे नेताओं से ज्यादा प्रभात झा की होगी क्योंकि वह जन आशीर्वाद यात्रा कार्यक्रम के भी प्रमुख तो मीडिया जैसी अहम कड़ी थी वह बनने वाले हैं ऐसे में भोपाल से लेकर जिला स्तर पर मीडिया प्रभारी और प्रवक्ताओं की लंबी फौज जिनकी संख्या करीब सवा सौ से ज्यादा है इस बड़े नेटवर्क के जरिए प्रभात भाजपा और शिवराज के साथ अपनी अहमियत का भी एहसास कराने की क्षमता रखते इसके साथ ही सरकारी स्तर पर मीडिया की दिशा और संगठन की दशा दोनों के बीच भी समन्वय की कमी कहीं भाजपा की कमजोर कड़ियों के उजागर होने का कारण न बन जाए इसका ध्यान भी अभी से रणनीति कारों को रखना होगा नरेंद्र तोमर के नेतृत्व में गठित चुनाव प्रबंधन प्रचार समिति के अधीन अस्तित्व में आई 12 उप समितियों का अपना महत्व लेकिन बिना मीडिया से तालमेल बनाए अपनी उपयोगिता साबित करना आसान नहीं होगा तो कुल मिलाकर सांसद और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रभात झा के सही मायने में अच्छे दिन आ गए जिन्हें मुंगावली कोलारस उपचुनाव की गलतियों से सीख लेकर भाजपा को मीडिया के मोर्चे पर स्थापित कर खासतौर से कांग्रेस को बड़ी चुनौती देना होगी शायद वह दिन दूर नहीं प्रदेश भाजपा पदाधिकारियों समेत जिन दूसरी समितियों में अभी तक प्रभात झा या फिर वर्तमान मीडिया प्रभारी आमंत्रित नहीं होते थे अब प्रभात झा को बुलाना इन समितियों में पार्टी की बड़ी मजबूरी नहीं बल्कि जरूरी बन जाएगा..

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👇 प्रभात झा यानी अमित शाह की टीम में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष   और राज्यसभा सांसद का जो मुकाम हासिल किया उसे उनके लंबे सियासी संघर्ष का अहम पड़ाव माना जा सकता … सियासत की इस सफलता के पीछे पत्रकारिता की पृष्ठभूमि को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता ..राष्ट्रीय स्तर पर कमल संदेश से लेकर स्वदेश अखबार की इस पुरानी लंबी यात्रा के दौरान   प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष की जिम्मेदारी उनके लिए  किसी टर्निंग पॉइंट से कम नहीं था ..एक लाइन में कहें तो सियासी उठापटक  के दौरान अंकुर वक्त पर अपनी अहमियत का एहसास कराने के लिए बिना समय गवाएं पोजीशन लेना हो या फिर जरूरी  दांव पेंच में खुद को वक्त के अनुरूप ढाल लेना कोई प्रभात झा से सीखे.. मीडिया की त्रिस्तरीय व्यवस्था में मालिक ,प्रबंधन और रिपोर्टर का  कैसे कब उपयोग किस स्तर पर किया जाए शायद मध्यप्रदेश भाजपा में उनसे बेहतर कोई दूसरा जानता .. लेकिन जब  उन्होंने शिवराज की दूरदर्शिता और कार्यशैली से जोड़ पोखरण विस्फोट का हवाला देकर खुद अपनी  समझ के साथ सियासी आकलन  पर सवाल खड़ा किया  ..तब से  यह कहने वाले भी मिल जाते की तमाम काबिलियत के बावजूद संकट भरोसे का उनके अपनी पार्टी  नेताओं के सामने खड़ा  होता रहा है.. लेकिन यह भी कड़वा सच है की पार्टी के नेता उन पर भरोसा करने को मजबूर होते और जब शीर्ष नेताओं को विरोधियों पर हमला करने के लिए  किसी कंधे की जरूरत होती  तो प्रभात झा को ही आगे किया जाता रहा .. जो बड़े बड़े दावे तो करते रहे  लेकिन  पूरे पत्ते कभी नहीं खोले.. ग्वालियर चंबल की स्थानीय क्षेत्रीय राजनीति से आगे प्रदेश स्तरीय ही नहीं राष्ट्रीय राजनीति में प्रभात हमेशा सुर्खियों में बने रहे .. राष्ट्रीय स्तर पर  राजनाथ सिंह से लेकर नितिन गडकरी और अमित शाह  के साथ जुड़ना या फिर शिवराज से लेकर नरेंद्र सिंह बड़े उदाहरण के तौर पर सामने हैं जिससे उनके बिगड़ते बनते सियासी रिश्ते की खटास और मिठास समय-समय पर भाजपा की अंदरूनी राजनीति में उबाल लाते रहे ..2003 विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश  मीडिया प्रभारी के तौर पर दीनदयाल परिसर से भाजपा को एक नई दिशा देने वाले प्रभात झा की यूं तो भूमिकाएं बदलती रही.. लेकिन एक बार फिर करीब दो दशक बाद जो अहम जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गई है।.. उसे मीडिया समन्यवक कहा जा सकता तो सीधे शब्दों में भाजपा के अंदर मीडिया से जुड़ी लंबी फौज का सुप्रीमो भी माना जा सकता है.. जो एक मार्गदर्शक के तौर पर अब मीडिया प्रभारी से लेकर मुख्य प्रवक्ता और उनकी टीम को चुनाव की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए एक नई पहचान देने जा रहे हैं.. इससे पहले उन्हें शिवराज सिंह चौहान की प्रस्तावित जनआशीर्वाद यात्रा का प्रमुख बनाया जा चुका.. अब उन्हें भाजपा का मीडिया कंसल्टेंट.. बताया जा रहा .. जो  रविवार से ही  भाजपा मीडिया से जुड़े  नेताओं  का मार्गदर्शन करेंगे .. ऐसे में मीडिया फ्रेंडली प्रभात झा से सत्ता और संगठन ही नहीं पार्टी के हाईकमान की अपेक्षाएं बढ़ना लाजमी कि चुनाव साल में भाजपा बैकफुट पर ना आए ..कमलनाथ और ज्योतिरादित्य पर राहुल गांधी ने जो दांव लगाया आख़िर उसकी हवा कैसे निकाली जा सकती, यह झा को सोचना होगा.. प्रभात झा के लिए शिवराज की जन आशीर्वाद यात्रा की सफलता सुनिश्चित करने के लिए मैदान में कड़ी मेहनत कर उनके लिए यदि जरूरी जमावट और माहौल बनाना चुनौती है.. तो नई भूमिका मीडिया कंसल्टेंट के तौर पर दिमागी एक्सरसाइज के लिए भी समय निकालना होगा ..जिससे कांग्रेस पर पलटवार नहीं बल्कि उसे सफाई देने को मजबूर किया जा सके.. प्रभात झा को इस बार विरासत में मीडिया प्रभारी लोकेंद्र पराशर और उनकी टीम के साथ मुख्य प्रवक्ता दीपक विजयवर्गीय  और उनके सहयोगियों का साथ मिला है.. लोकेंद्र ग्वालियर चंबल की राजनीति जिसका प्रत्येक खुद प्रभात झा करते वही के दिग्गज नेता नरेंद्र तोमर से लेकर सरकार के संकटमोचक नरोत्तम मिश्रा के भी करीबी माने जाते हैं ..तो प्रभात झा के उत्तराधिकारी के तौर पर 2003 के लिए दीपक विजयवर्गीय को मीडिया प्रभारी बनाया गया था.. नई भूमिका में पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान एक सवाल के जवाब में प्रभात झा ने लोकेंद्र और दीपक को अपनी दो भुजाएं बताया यानी बाया और दाया हाथ .. फिर भी कांग्रेस से निपटने से पहले उनके लिए सबसे अहम चुनौती मीडिया सेल के बीच संतुलन बनाने की होगी जिनमें कई चेहरे प्रभात झा के अध्यक्ष रहते उनकी अपनी पसंद थे … फिलहाल इस लंबी टीम में अधिकांश अपना मूल काम छोड़कर बाकी काम कर व्यक्तिगत अपनी राजनीति जमकर चमका रहे .. जिस पर विस्तार से फिर कभी.. शायद यही कारण है कि शिवराजसिंह, नरेंद्र सिंह, राकेश सिंह और सुहास भगत को एक अनुभवी वीडियो और मर्मज्ञ की तलाश महसूस हुई जो उन्हें प्रभात झा की तरह मिल गया.. नीति निर्धारकों ने रणनीति के तहत सोचा होगा कि फैसला सम्मानजनक नजर आए.. तो उसके लिए एक विशेष व्यवस्था बनाई गई ..जिसमें एडजस्टमेंट कम उपयोगिता का संदेश ज्यादा जाए.. कुछ इसी तरह केंद्रीय मंत्री रहते जब प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर नरेंद्र तोमर ने वापस मध्यप्रदेश लौटने से इंकार कर दिया तो उनके बढते सियासी कद और दीर्घ अनुभव को ध्यान में रखते हुए प्रबंध समिति का गठन कर उन्हें शिवराज के बाद नंबर दो पर लाकर खड़ा करने की कोशिश की गई.. जिसके वो हकदार भी माने जाते है। ठीक इसी तरह दो दशक लंबे अनुभव को आधार बनाकर पूर्व प्रदेश अध्यक्ष राष्ट्रीय उपाध्यक्ष  सांसद प्रभात झा को भी यह कहकर काम पर लगा दिया गया कि आप मीडिया को कोऑर्डिनेटर करेंगे.. जो मुद्दों की बारीक समझ रखते  तो उसे कैसे भुनाया जाए उसका महारथी माना जाता है.. पार्टी का एक धड़ा का मानना है कि चुनाव में प्रभात झा का इससे बेहतर इस्तेमाल दूसरा कोई हो नहीं सकता तो ..ऐसे लोग भी मिल जाएंगे जिनका कहना है कि  जवाबदेही बढ़ने के साथ झा अंडर कंट्रोल   रहेंगे और जाने अनजाने ही सही गाहे-बगाहे अब वो कोई नया पोखरण जैसा ना तो विस्फोट कर पाएंगे और ना ही कभी पार्टी के लिए वह सिरदर्द बनेगे.. मध्य प्रदेश के बड़े मीडिया हाउस से उनका संपर्क पुराना  तो मैदानी रिपोर्टरों की अहमियत को भी वह अच्छी तरह समझते हैं.. यही नहीं अगले कुछ माह के दौरान जब नरेंद्र मोदी अमित शाह से लेकर राहुल गांधी मध्यप्रदेश में आमने सामने खड़े नजर आएंगे तो दिल्ली से मध्यप्रदेश में दखल रखने वाले मीडिया का भी प्रभात भाजपा के पक्ष में बेहतर इस्तेमाल कर सकते हैं.. तमाम काबिलियत और लंबे अनुभव के बाद  भी भाजपा मीडिया सेल से जुड़े सभी दूसरे सहयोगियों का बिना राग द्वेष के बेहतर इस्तेमाल करना और उनके बीच में समन्वय बनाए रखना नई चुनौती होगी.. आने वाले समय में भाजपा का पूरा फोकस जिस जनआशीर्वाद यात्रा पर होगा उसका नेतृत्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ही करेंगे यानि शिवराज की ब्रांडिंग के लिए सिर्फ भोपाल नहीं बल्कि पूरे प्रदेश में मीडिया कवरेज और वह मतदाताओं के गले उतरे इसे सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी दूसरे नेताओं से ज्यादा प्रभात झा की होगी.. क्योंकि वह जन आशीर्वाद यात्रा कार्यक्रम के भी प्रमुख ..तो मीडिया की अहम कड़ी वह बनने वाले हैं ।ऐसे में भोपाल से लेकर जिला स्तर पर मीडिया प्रभारी और प्रवक्ताओं की लंबी फौज जिनकी संख्या करीब सवा सौ से ज्यादा है इस बड़े नेटवर्क के जरिए प्रभात भाजपा और शिवराज के साथ अपनी अहमियत का भी एहसास कराने की क्षमता रखते.. इसके साथ ही सरकारी स्तर पर मीडिया की दिशा और संगठन की दशा दोनों के बीच भी समन्वय की कमी कहीं भाजपा की कमजोर कड़ियों के उजागर होने का कारण न बन जाए.. इसका ध्यान भी अभी से रणनीति कारों को रखना होगा.. नरेंद्र तोमर के नेतृत्व में गठित चुनाव प्रबंधन प्रचार समिति के अधीन अस्तित्व में आई 12 उप समितियों का अपना महत्व.. लेकिन बिना मीडिया सभी से तालमेल बनाए अपनी उपयोगिता साबित करना आसान नहीं होगा ..तो कुल मिलाकर सांसद और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रभात झा के सही मायने में अच्छे दिन आ गए .. जो अब टीवी का बड़ा चेहरा तो अखबार की सुर्खियां भी रोज बनेंगे ..जिन्हें मुंगावली, कोलारस उपचुनाव की गलतियों से सीख लेकर भाजपा को मीडिया के मोर्चे पर स्थापित कर खासतौर से कांग्रेस को बड़ी चुनौती देना होगी ..शायद वह दिन दूर नहीं प्रदेश भाजपा पदाधिकारियों समेत जिन दूसरी समितियों में अभी तक  वर्तमान मीडिया प्रभारी ही आमंत्रित  होते थे अब प्रभात झा को बुलाना इन समितियों में पार्टी की बड़ी मजबूरी नहीं बल्कि जरूरी बन जाएगा.. देखना दिलचस्प होगा जब कांग्रेस विकास की आड़ में भ्रष्टाचार को एक बड़ा मुद्दा बनाने के लिए आरोप पत्रकार करने में जुटी है तब जवाबी पलटवार के लिए टीम प्रभात झा की तैयारियां क्या गुल खिलाती है। क्योंकि संदेश सिर्फ राजधानी भोपाल से नहीं बल्कि जिला स्तर पर भी देना भाजपा के लिए जरूरी हो जाएगा.. जो भी हो नए नवेले प्रदेश भाजपा अध्यक्ष राकेश सिंह ही नहीं नरेंद्र सिंह तोमर और शिवराज सिंह चौहान के लिए भी राहत देने वाला यह फैसला जिन्होंने कांग्रेस पर पलटवार करने और सरकार और संगठन की सफाई देने के लिए राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहते प्रभात झा को आगे कर दिया.. जो आने वाले समय में कमलनाथ ही नहीं ज्योतिरादित्य तो जरूरत पड़ने पर राहुल गांधी का भी जवाब होंगे..