सवाल दर सवाल

राजनीति के नायकों के मूर्तिकार ‘अनिल दवे..’) राकेश अग्निहोत्री ‘सवाल दर सवाल’ नया इंडिया

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सवाल दर सवाल, राकेश अग्निहोत्री, नया इंडिया
मेन हेड
(राजनीति के नायकों के मूर्तिकार ‘अनिल दवे..’)
मध्य प्रदेश चुनाव जावली और जनता का राजा”
कांग्रेस सरकार को कोई डेढ़ दशक पहले मध्य प्रदेश उखाड़ फेंकने के संकल्प के साथ जिस जन हितेषी राज्य स्थापित करने की कल्पना को साकार करने कि बीजेपी ने ठानी थी… उसकी शुरूआत जिस ‘जावली’ से हुई उसे भुलाया नहीं जा सकता जिसकी कमान अनिल दवे के हाथों में थी और उन्होंने राजनीति के नायकों के मूर्तिकार की भूमिका बखूबी निभाई भी.. लगातार तीन चुनाव में राज्य से लेकर केंद्र तक चेहरे और भूमिका बदलती गई लेकिन अनिल दवे की भूमिका चुनाव के समय कभी नहीं बदली..छोटी सी जिंदगी में बड़ा जज्बा और जुनून का लोहा मनवाने वाले अनिल दवे को अंतिम समय में अनायास बीमारियों ने घेर लिया था..बावजूद इसके उनके बुलंद इरादे हमेशा चर्चा में रहे..कह सकते हैं कि वो अपनी शर्तों पर ही जिये और हम सबको छोड़कर चले गए..अब जब चुनाव की मध्यप्रदेश में उल्टी गिनती शुरू हो गई है तो पिछले 3 चुनावों की रणनीति के पर्दे के पीछे की इस बड़े खिलाड़ी की कमी सबसे ज्यादा यदि किसी को महसूस हो रही होगी तो वो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनकी भाजपा है..याद तो नरेंद्र मोदी और अमित शाह को भी उनकी आती होगी, लेकिन जितने करीब से उमा भारती से लेकर शिवराज सिंह चौहान, नरेंद्र सिंह तोमर और संघ कार्यालय में बदलती भूमिका में प्रचारकों ने उन्हें देखा, समझा और उनकी सोच समझ का उपयोग किया आज उन्हें उनकी कमी जरूर खल रही होगी..अनिल दवे जिस लक्ष्य को लेकर आगे बढ़ते थे तो फिर पलटकर नहीं देखते चाहे फिर वो प्रबंधन का मोर्चा या फिर मुद्दों को धार देकर विरोधियों पर पलटवार कर भाजपा की कमजोरियों से ध्यान हटाना हो..मिस्टर बंटाधार का वो स्लोगन आज भी दिग्विजय सिंह के पीछे चस्पा है, जिसे चुनावी मैदान में दवे ने ही उछालकर कांग्रेस की कमजोर नस पर हाथ रख दिया और फिर इसे भुनाया था उमा भारती ने.. 2003 और 2008 के बाद 2013 विधानसभा से लेकर ठीक बाद हुए लोकसभा चुनाव के प्रमुख रणनीतिकार अनिल दवे हमेशा कहते थे कि हर चुनाव में चुनौतियां बदल जाती हैं चाहे वो सत्ता प्राप्त करने या फिर सत्ता में रहते वापसी सुनिश्चित करना हो..अब जब बीजेपी ही बदल गई है और कमान मोदी और शाह के हाथ में तो एक बार फिर अनिल दवे और उनकी रणनीति प्रासंगिक हो गई, जो पिछले चुनाव में ही नरेंद्र मोदी के संपर्क में आ चुके थे, जब उन्हें चुनाव अभियान समिति की कमान बाद में पीएम इन वेटिंग घोषित कर दिया गया था, लेकिन राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह और मध्यप्रदेश के प्रभारी अनंत कुमार से उनकी ट्यूनिंग ज्यादा बेहतर साबित हुई थी..कह सकते हैं कि जगजीत का सारा दारोमदार मोदी और शाह के कंधों पर है तब काफी हद तक उनकी भूमिका केंद्रीय मंत्री नरेंद्र तोमर के पास शिफ्ट हो चुकी है, लेकिन अभी वॉर रूम की जमावट हो या फिर दिल्ली से तालमेल के साथ जमीनी बिसात और उपलब्धियों और पलटवार पर केंद्रित विज्ञापन का कैंपेन..आधी-अधूरी तैयारियों के बीच उलझा है.. जिम्मेदारी और जवाबदेही नहीं सौंपी गई दिल्ली और भोपाल के बीच में तैयारी के मोर्चे पर बहुत कुछ अधर में लटका है.. बदलती बीजेपी में गुजरात से लेकर कर्नाटक के चुनाव इस बात का संकेत हैं कि अब दीनदयाल परिसर से बैठकर कुछ ज्यादा करने को बचेगा नहीं..वो बात और है कि अमित शाह भोपाल में डेरा डालकर एक अलग सेटअप तैयार कर मिशन 2019 के पहले ही इस सेमीफाइनल की निर्णायक लड़ाई को लड़ने जा रहे हैं.. यह दौर सोशल मीडिया का फिर भी ऐसे में अनिल दवे की उस टीम की भूमिका और बढ़ जाती है, जिसने उनके साथ कदमताल कर कांग्रेस के जीत के सपने को कभी साकार नहीं होने दिया..ये सच है कि आज अनिल दवे होते तो शायद मोदी और शाह को इस चुनाव में ज्यादा माथापच्ची नहीं करना पड़ती तो शिवराज के लिए भी प्रचार आसान हो जाता..

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नदी का घर और सही मायने में नर्मदा पुत्र’

ठीक एक साल पहले 18 मई आज के ही दिन पीएमओ से निकली एक खबर ने राजनीतिक गलियारों में यदि सनसनी फैला दी थी .. उस वक्त खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मध्य प्रदेश के दौरे पर आए राष्ट्रीय संगठन महामंत्री रामलाल तो दूसरे केंद्रीय मंत्रियों के संपर्क में आ चुके थे ..तो उसने समूची भाजपा ही नहीं संघ… तो मध्यप्रदेश को खासतौर से झकझोर कर रख दिया था..जिस भाजपा कार्यालय में बैठकर वो चुनावी रणनीति को अंजाम तक पहुंचाते थे और जिस नदी के घर से सामाजिक सरोकार के मोर्चे पर अनिल दवे ताना-बाना बुनते थे वहां ठीक 1 साल पहले सन्नाटा पसर गया था.. एक बार फिर रुला देने वाली यादें ताजा हो गई ..जब  अंतिम दर्शन के लिए पार्थिव देह लाई गई थी.. उस दृश्य को भूल पाना कम से कम भाजपाइयों के लिए आसान नहीं होगा.. सब कुछ अचानक और कुछ घंटों में… जी हां चिंतक, विचारक, पर्यावरणविद् अनिल दवे जिसे लोग अपनी-अपनी पसंद और व्यक्तिगत नजरिए से जिस रूप में देखना चाहें..एक विशेषज्ञ और काबिल इंसान के तौर पर देखने को मजबूर होते थे..बड़ा नाम, बड़ी सोच लेकिन बड़ा दिल, कोई भी कभी भी उनसे मिल सकता था.. विनम्र और सुलझा एक ऐसा अनूठा व्यक्तित्व जिसे न सिर्फ सियासी मुद्दों की समझ, बल्कि समाज में चुनौतियों की परख भी खूब थी, जिसने सियासत में कम समय में यदि बड़ा मुकाम और एक अलग पहचान हासिल की तो एक प्रचारक के नाते सामाजिक सरोकार के मोर्चे पर उनके अभिनव प्रयोग और दूरदर्शी सोच के शुभचिंतक और समर्थकों से आगे विरोधी भी कायल हुए..जी हां अनिल दवे आज ही के दिन हम सब लोगों को छोड़कर बहुत दूर चले गए थे, लेकिन अंतिम समय तक वो अपने काम में जुटे रहे..अस्वस्थता के बावजूद कुछ घंटे पहले तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सीधे संपर्क में उनके साथ मौजूद थे, जिन्होंने उन्हें अपनी श्रद्धांजलि देते हुए अपनी निजी क्षति तो अनिल दवे को जनसेवक और दोस्त . बताया था. तो कई राज उनके जाने के बाद सामने आए.. जिस के सियासी सफर में उपलब्धियों की भरमार उसकी एक विरासत के साथ कई राज उजागर हुए… नर्मदा के उस किनारे पर नदी महोत्सव मनाया जाता था उसी बांद्राभान के तट पर उन्हें अंतिम विदाई दी गई..संघ और भाजपा के शीर्ष नेताओं जिसमें केंद्रीय मंत्री भी शामिल थे, उनकी अंतिम यात्रा में जब शामिल हुए थे तो संघ के भैयाजी जोशी से लेकर सुरेश सोनी तो केंद्रीय मंत्री उमा भारती से लेकर डॉक्टर हर्षवर्धन और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान समेत जानी-मानी हस्तियों ने अपने संस्मरण सामने रखकर श्रद्धांजलि दी थी..जिस शख्स ने अपने नाम पर कोई दिखावा नहीं करने की अपील की थी उन्हें कुछ माह पहले ही उनके जाने के बाद नदी महोत्सव में याद किया गया..जिस नर्मदा के किनारे हरियाली और उसे स्वच्छ और पर्यावरण से मुक्त करने की बात अनिल दवे करते रहे उसके लिए जो कुछ भी किया गया पता नहीं मूल्यांकन की कसौटी पर कितना खरा उतरा, लेकिन संघ के प्रचारक से लेकर केंद्रीय मंत्री के सियासी सफर में कई पड़ाव से आए हैं, जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता..2003 उमा भारती के रणनीतिकारों में शामिल होकर संघ के इस प्रचारक ने मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री की भूमिका में हर मोर्चे पर अलग छाप छोड़ी या यूं कहें कि भीड़ में अलग नजर आए तो उसकी वजह थी उनकी दूरगामी सोच, संयमी और कुछ नया करने की लालसा..सक्रिय राजनीति और सामाजिक सरोकार के फोरम पर कम समय में यदि उनके खाते में उपलब्धियों की भरमार नजर आई तो फैसलों में पारदर्शिता और दूरदर्शिता के साथ समय रहते चुनौतियों को भांप लेने की गजब की क्षमता ही थी..जो या तो खुद को परिस्थितियों में ढाल लेते थे या फिर ऐसी परिस्थितियों का निर्माण करते थे कि सफलता की राह आसान और लक्ष्य के बहुत करीब पहुंच जाते थे..किसी की नजर में वो पर्यावरणविद, राजनीतिक, चिंतक, समाज सेवी तो एक आदर्श राजनेता जिनके आदर्श यदि शिवाजी तो एक प्रचारक के तौर पर सादगी की अनूठी मिसाल ना सिर्फ खान-पान, चाल-चलन, बल्कि रहन-सहन की झलक देखने को मिलती थी..एक ऐसा शख्स जो मां नर्मदा के तट पर उससे संवाद करता और पूरी तरह से डूब जाता उन गहराइयों में जहां से एक नई सोच जीवंत, ज्वलंत समस्या के समाधान का रास्ता सामने आता.. बहुत कुछ लिखा जा सकता है अनिल दवे को सामने रखकर तो बहुत कुछ राजनेता आज उनसे सीख सकते हैं

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(अनिल दवे ने क्यों कहा था मृत्यु अटल है?)
ये किसी किताब में लिखी हुई बात नहीं, बल्कि पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वर्गीय अनिल दवे ने बहुत पहले ही कह दिया था कि ‘मृत्यु तो अटल है जब आना है तो आकर रहेगी, घड़ी निश्चित है.. समय निश्चित है, तिथि निश्चित है, आने का तरीका निश्चित है और दुनिया का कोई पंडित, दुनिया का कोई साधु, दुनिया का कोई डॉक्टर कभी भी नहीं बदल सकता, कभी भी नहीं बदल सकते..’ डॉक्टर मांडगे इतने बड़े हॉर्ट स्पेशलिस्ट थे जब मुंबई के अंदर उनको अटैक आया तो पूरे विश्व के डॉक्टर उनके बिस्तर के पास खड़े थेलेकिन आदमी को नहीं रोक पाए..देश के प्रधानमंत्री को रोक दिया क्या भैया श्रीपेल्यल्यबटूर में… इंदिराजी को घर में कौन रोक पाया, दीनदयाल उपाध्याय को रेल के डिब्बे में कौन रोक पाया..कहने का तात्पर्य है जो चीज इतनी सेटल है, इतनी सही और अपनी जगह निश्चित है उसमें व्यक्ति के डरने का कोई कारण नहीं..अनिल दवे ने कहा था, मृत्यु जब आएगी तब उसे कोई नहीं रोक सकता..उनके ये शब्द मृत्यु के बाद सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो के हैं..इस दुनिया से विदा लेने के बाद अनिल दवे का सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ वो वीडियो जिसमें वो अप्रैल 2013 को एक विशेष मौके पर जो कहते और सुने गए..आखिर उसे किस रूप में लिया जाए..उन्होंने खुद इंदिरा गांधी का जिक्र किया, जिन्होंने कभी खून के कतरे की अंतिम बूंद की बात कही थी..अनिल दवे इस वीडियो में मृत्यु की कड़वी सच्चाई को जिस तरह से समझा रहे और इस दौरान उनकी बॉडी लैंग्वेज पर गौर किया जाए तो समझा जा सकता है कि जीवन के सत्य यानि मृत्यु को कितनी गहराई से वो बहुत पहले ही समझ चुके थे..जिस शख्स ने संघ के प्रचारक के तौर पर अपनी जिंदगी समाज, पार्टी और देश के प्रति समर्पित कर दी और दुनिया से विदा लेने से पहले एक ऐसी वसीयत छोड़ गए जो उनके आचरण, व्यवहार, सोच, कार्यशैली इस इंसान के बारे में बहुत कुछ सोचने को मजबूर करती है..जिसमें खासतौर से राजनीति में सक्रिय सिद्धांत और विचारधारा की बात कहने वालों के लिए बहुत कुछ संदेश छिपा था..उस शख्स ने 2013 में ही स्पष्ट कर दिया था कि मौत से क्या डरना, मृत्यु तो अटल है और भी बहुत कुछ उन्होंने जिस बेबाकी से कहा तो समझा जा सकता है कि किस उद्देश्य को लेकर वो जिंदगी जी रहे थे..क्योंकि राष्ट्रप्रेम हो और पर्यावरण के साथ नर्मदा प्रेम के इर्द-गिर्द ही वो बड़े लक्ष्य को लेकर इस छोटी सी जिंदगी में बहुत कुछ समय रहते कर लेना चाहते थे और उन्होंने किया भी..