सवाल दर सवाल

कर्नाटक का मध्यप्रदेश के लिए संदेश और मायने.. राकेश अग्निहोत्री ‘सवाल दर सवाल’ नया इंडिया

Modi-AmitShah

सवाल दर सवाल, राकेश अग्निहोत्री नया इंडिया
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कर्नाटक का मध्यप्रदेश के लिए संदेश और मायने
सब हैड
एक तस्वीर जिससे लगा मोदी-शाह की भाजपा बदल रही
इंट्रो
कर्नाटक चुनाव के उलझे और त्रिशंकु परिणाम का संदेश मोदी, शाह और भाजपा ने अपनी तरफ से जरूर दिया, लेकिन मध्यप्रदेश के लिए भी इसमें क्या कोई संकेत  छुपा था तो इसके मायने निकाले जाना भी लाजमी है..सबसे बड़े दल के तौर पर कर्नाटक में उभरकर सामने आई भाजपा का जश्न मतगणना शुरू होने के करीब 12 घंटे बाद जब दिल्ली बीजेपी कार्यालय में मनाया जा रहा था.. तब सामने आई एक तस्वीर ने मैं सिर्फ चौंका दिया  बल्कि इन परिणामों का महत्व  बढ़ा दिया …तो सोचने को मजबूर हुए  क्या आने वाले समय में भाजपा की बदलती रणनीति की भी झलक देखने को मिली..जिस मंच पर मोदी और शाह ज्यादातर मीडिया के सामने ऐसे विजय श्री के मौके पर कदमताल करते हुए नजर आते थे.. कर्नाटक परिणाम के बाद इन दोनों शीर्ष नेताओं के अगल-बगल पूरा पार्लियामेंट्री बोर्ड सार्वजनिक तौर पर नजर आया..जब प्रधानमंत्री और उससे पहले भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष कार्यकर्ताओं से मुखातिब हुए जिन्होंने जीत को परिभाषित किया और  उसकी बधाई दी..ऐसे में सवाल खड़ा होना लाजमी है कि क्या मोदी और शाह की भाजपा बदल रही है…? भविष्य में अब दूसरे नेताओं को भी महत्व  मिलेगा ..तो सवाल क्या मिशन 2019 लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए भाजपा की ये सोच उनके फैसलों में गठबंधन की राजनीति में भी नजर आएगी…, जो कहने को एनडीए का हिस्सा बने और अब उनकी नाराजगी चर्चा का विषय बनती रहती है… जहां तक बात मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव की  जहां राजस्थान और छत्तीसगढ़ के साथ प्रस्तावित हैं, तो कर्नाटक के बाद आखिर यहां अपनी सरकार बचाने के लिए मोदी और शाह की रणनीति क्या होगी..जब उसके लिए सबसे बड़ी समस्या सरकार के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी सामने है..सवाल कर्नाटक की जीत के बाद जब भाजपा सरकार बनाने को लेकर कॉन्फिडेंट है तब येदुरप्पा की तरह मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज और उनकी सरकार को ताकत देने के लिए मोदी और शाह की जोड़ी अपने कार्यकर्ताओं और प्रदेश के मतदाताओं का भरोसा जीतने के लिए किस हद तक हस्तक्षेप करेगी.. पिछले दिनों अमित शाह ने  शिवराज की तारीफ तो की लेकिन चुनाव संगठन लड़ेगा  की बात कहकर चुनाव में चेहरा को लेकर जो भ्रम पैदा किया क्या  जब उसे शीर्ष नेतृत्व दूर करेगा या फिर पिछले दो चुनाव की तरह शिवराज को फ्री हैंड मिलना बेमानी है… क्या प्रदेश के मिजाज को समझते हुए ये संदेश नहीं जाने देंगे कि संगठन चुनाव लड़ेगा तो चेहरा शिवराज का पीछे छोड़ दिया जाएगा..क्योंकि कांग्रेस इसे मुद्दा बनाने में जुट गई है … सवाल क्या सबसे बड़े दल के तौर पर कर्नाटक में उभरने के साथ बीजेपी ने मोदी विरोधियों को एकजुट होने का मौका कर्नाटक से दे दिया है..इसके तार आने वाले समय में मध्यप्रदेश में भी जुड़ते हुए दिखाई दे सकते हैं, जब कांग्रेस गैर बीजेपी दलों से गठबंधन कर चुनाव में जाए..दिनभर के हाई वोल्टेज ड्रामे के बाद संदेश बीजेपी कार्यालय पहुंचे मोदी और शाह के साथ नजर आए संसदीय बोर्ड के सदस्यों से भी गया है, जहां स्वयं शिवराज सिंह चौहान भी मौजूद थे..देखना दिलचस्प होगा कि अब जब मोदी को दोबारा देश का प्रधानमंत्री बनाने के पहले बड़ी चुनौती उनकी अपनी मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान की राज्य सरकार है जब इस बड़े लक्ष्य को लेकर मोदी अपने सहयोगी नेताओं और राज्यों के मुख्यमंत्रियों को आने वाले चुनाव में कितना भरोसे में लेकर आगे बढ़ते हैं..ये सच है कि भाजपा के दोनों शीर्ष नेताओं ने मेहनत की पराकाष्ठा से आगे जाकर भाजपा को एक नई ऊंचाई तक पहुंचाया है..लेकिन अब एक बार फिर चुनौती केंद्र में लगातार दूसरी बार सरकार बनाने की है, ऐसे में राज्यों के मुख्यमंत्रियों से लेकर सहयोगी मंत्रियों और पदाधिकारियों का परफॉर्मेंस मायने रखता है..तो कर्नाटक और दिल्ली से भाजपा द्वारा दिया गया संदेश मध्यप्रदेश की सियासत में मायने रखता है.. अगले कुछ दिनों में जब कर्नाटक की सरकार को लेकर तस्वीर साफ होगी तो इन परिणामों और उसके बाद जोड़-तोड़ को लेकर मोदी और शाह की नीति और नीयत को लेकर जो परसेप्शन बनेगा उसको नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, जिसका असर लोकसभा चुनाव और उससे पहले मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ राजस्थान में देखने को मिल सकता है..
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पर्दा उठा लेकिन नाटक में सस्पेंस
देश की नजर जिस कर्नाटक विधानसभा चुनाव के परिणाम पर थी उसकी अंतिम घोषणा होने से पहले कई ट्वीस्ट देखने को मिले, जिसने मणिपुर, गोवा और मेघालय में बहुमत नहीं होने के बावजूद सरकार बना लेने वाली भाजपा की सियासी सोच और रणनीति पर गौर करने को मजबूर किया तो एंटी बीजेपी और एंटी मोदी गठबंधन के कर्नाटक से कुछ नए संकेत भी दिए..गेंद राज्यपाल के पाले में जाने के बाद भाजपा और विरोधी कांग्रेस-जेडीएस के बीच रस्साकशी का खेल किसी रोमांच से कम नहीं था..दिल्ली से लेकर बेंगलुरु तक उठापटक चलती रही तो इस दौरान राजभवन के दरवाजे भी खोल दिए गए, लेकिन किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाए..सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन का हवाला देकर कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने राज्यपाल  को बताया कि गठबंधन के नेता को शपथ दिलाई जाना चाहिए। इसके लिए मणिपुर, गोवा और मेघालय राज्यपाल द्वारा हाल ही में लिए गए फैसलों का भी हवाला दिया गया..कांग्रेस का मानना है कि राज्यपाल सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन को नजरअंदाज नहीं कर सकते और ना ही बहुमत के लिए जरूरी आंकड़े जिस बीजेपी के पास में ही हैं उनके नेता को बुलाया जा सकता है। इससे पहले सबसे बड़े दल के तौर पर बीजेपी नेता येदुरप्पा ने तो उसके बाद सिद्धारमैया और कुमारस्वामी ने अपना दावा राजभवन जाकर पेश किया..224 विधायकों वाली कर्नाटक विधानसभा में 222 सीटों के लिए चुनाव हुए, जिसमें दो बड़े नेता सिद्धारमैया और येदुरप्पा चुनाव जीत गए तो जीडीएस के कुमारस्वामी दोनों सीटों से चुनाव जीत चुके हैं..ऐसे में सरकार बनाने के लिए जरूरी मैजिक फिगर में कुमारस्वामी के दूसरे वोट की भी अहमियत बढ़ गई है..एक ऐसा भी समय आया जब जश्न मनाने में जुट चुकी बीजेपी को बैकफुट पर आना पड़ा..
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भाजपा दो कदम आगे तो चार कदम पीछे
कर्नाटक में त्रिशंकु विधानसभा की जो अंतिम स्थिति बनी उसमें एक समय ऐसा भी आया जब भाजपा सरकार बनती देख जश्न मनाने में जुट गई थी लेकिन मैजिक फिगर से दूर होने के कारण वह दो कदम आगे तो चार कदम पीछे वाली कहावत चरितार्थ करती हुई नजर आई..कर्नाटक को कांग्रेसमुक्त करने के बीजेपी के दावे को उस वक्त बड़ा झटका लगा जब वो शुरूआती रुझान में बहुमत हासिल करती नजर आने के बावजूद बहुमत से पीछे जाकर रुक गई और कांग्रेस ने जीडीएस को समर्थन देने के साथ दो अतिरिक्त निर्दलीय विधायकों को भी अपने साथ जोड़ लिया..ऐसे में कागज के ऊपर तकनीकी तौर पर आंकड़े जब भाजपा के खिलाफ जाने लगे तो नए सिरे से जोड़-तोड़ की राजनीति के सारे विकल्प भी खुल गए.. इसमें कांग्रेस खेमे से लिंगायत समुदाय के विधायकों की बगावत और जेडीएस में तोड़फोड़ के बिना सरकार बनाने के लिए बीजेपी का रास्ता साफ होता नजर नहीं आया..ऐसे में राजभवन की भूमिका अचानक कुछ ज्यादा ही बढ़ गई तो सबकी नजर राज्यपाल के फैसले पर जाकर टिक गई है कि वो सबसे बड़े दल या गठबंधन के दावे को नए सिरे से सरकार गठन के लिए पहला आमंत्रण देंगे तो आखिर कब..चुनाव परिणाम की अधिकृत घोषणा का इंतजार तो लाजमी था, लेकिन विशेषज्ञों की सलाह-मशविरा का भी दौर शुरू होने से इनकार नहीं किया जा सकता..सुबह से बने चुनावी रुझान में पहले कांग्रेस को बढ़त बाद में भाजपा का आगे निकल जाना और फिर गिनती के अंतिम दौर में बहुमत के आंकड़े के पहले आकर भाजपा का रुक जाना, दिनभर चर्चा का विषय बना रहा..भोपाल में तो प्रदेश भाजपा कार्यालय में जश्न भी जीत का मना लिया गया और प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह के साथ पूर्व प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान ने भी अच्छा खासा भाषण पेल मारा..ढोल-ढमाकों, आतिशबाजी की गूंज दिल्ली तक सुनाई दी, वो तो भला हो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का जो अंतिम समय में कार्यालय नहीं पहुंचे..तो भाजपा शासित दूसरे राज्यों में भी कुछ यही नजारा देखने को मिला..
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राज्यपाल के सामने विकल्प
गुजरात की सरकार में रहते सत्ता में लौटने की संघर्षपूर्ण जीत के बाद कांग्रेस के कब्जे वाली कर्नाटक सरकार को अपदस्थ कर बीजेपी ने एक बड़ी लड़ाई जीत ली है..वो बात और है कि कांग्रेस ने खुद को दूसरे बड़े दल के तौर पर उभरने के बावजूद गठबंधन की राजनीति में पीछे धकेलकर एंटी बीजेपी सरकार बनाने के लिए जेडीएस को समर्थन देकर मामले को उलझाने की कोशिश की..ऐसे में सरकार बनाने को लेकर जब राज्यपाल को कर्नाटक की राजनीति में नजीर बन चुकी बोम्मई गाइड लाइन जिसके तहत बहुमत का अंतिम फैसला सदन के फ्लोर पर होने का रास्ता खुला है.. इसका फायदा सबसे बड़े दल के तौर पर बीजेपी को मिल सकता है ..तो मोदी सरकार के रहते मणिपुर, गोवा, मेघालय में गठबंधन को राज्यपाल द्वारा दी गई प्राथमिकता का भी दूसरा विकल्प मौजूद है..इसके साथ ही विधायकों की तोड़फोड़ और दूसरे रास्ते जब खुले हुए हैं तब इस परिणाम ने ये तो साफ कर दिया कि भाजपा का बड़ा मकसद राज्यों से कांग्रेस का सफाया करना है, जिसमें वो काफी हद तक सफल होती नजर आ रही है..ऐसे में अब अगला पड़ाव मध्यप्रदेश के साथ छत्तीसगढ़ और राजस्थान होगा, जहां खुद भाजपा की सरकार है तो अलग-अलग राज्यों के लिए अलग-अलग रणनीति के तहत आगे बढ़ते हुए मोदी और शाह की टीम ने जो सफलता हासिल की है उसने कहीं ना कहीं इन तीन राज्यों में सरकार में वापसी की बाट जोह रही कांग्रेस को सोचने पर मजबूर जरूर किया होगा..मध्यप्रदेश में भी भाजपा ने राज्यों को भले ही काम पर लगा दिया हो, लेकिन कर्नाटक के परिणाम के बाद शीर्ष नेतृत्व नए सिरे से मिशन 2019 के पहले होने वाले इन चुनावों में अपनी जीत सुनिश्चित करने को लेकर अपनी रणनीति में बदलाव लाने को मजबूर हो सकता है…