सवाल दर सवाल

बुंदेलखंड : ‘साध्वी’ दूर, सक्रिय हुए ‘सत्यव्रत का शंखनाद’) राकेश अग्निहोत्री ‘सवाल दर सवाल’ नया इंडिया

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(बुंदेलखंड : ‘साध्वी’ दूर, सक्रिय हुए ‘सत्यव्रत का शंखनाद’)

कर्नाटक चुनाव परिणाम सामने आने के साथ ही जिस मध्यप्रदेश में भाजपा और कांग्रेस के दिग्गज नेताओं के साथ समाजवादी पार्टी, बहुजन समाजवादी पार्टी जैसे क्षेत्रीय दल सक्रिय होने वाले हैं… और जहां मायावती अखिलेश यादव के साथ हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर जैसे युवा चेहरे चुनाव का गणित बिगाड़ने और बनाने के लिए मैदान में कूदने वाले हैं ..उस मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड की सियासत में भी हलचल तेज होने वाली है..उत्तरप्रदेश की सीमा से लगे इस क्षेत्र में तीसरी शक्ति के साथ कांग्रेस के समझौते की संभावनाओं के बीच भाजपा की सबसे बड़ी नेता उमा भारती के दूर होने के बाद बुंदेलखंड आज भी शिवराज के भरोसे है… तो राज्यसभा के लगातार दो कार्यकाल पूरा करने के बाद कभी खजुराहो से लोकसभा चुनाव जीत चुके सत्यव्रत चतुर्वेदी भी चुनावी संन्यास का ऐलान करने के बाद क्षेत्र में नौजवानों की आवाज बुलंद करने के लिए फिर सक्रिय होने वाले हैं..इस क्षेत्र की सोशल इंजीनियरिंग में पिछड़े वर्ग की साध्वी उमा भारती तो ब्राह्मण नेता के तौर पर सत्यव्रत चतुर्वेदी की अनदेखी इस बार दोनों दलों को महंगी पड़ सकती है.. क्योंकि कांग्रेस इस बार विंध्य, मालवा, महाकौशल, ग्वालियर-चंबल और मध्य क्षेत्र की ताकत के दम पर चुनाव लड़ने का संकेत दे चुकी है …तो भाजपा में कहने को सत्ता में रहते कई छत्रप बनकर उभरे, लेकिन इनमें से ज्यादातर अपने विधानसभा और लोकसभा तक ही सीमित होकर रह जाते हैं. तो बुंदेलखंड के छतरपुर से सत्यव्रत चतुर्वेदी ने कहीं ना कहीं अपनी पार्टी कांग्रेस को बड़ी राहत देने के साथ भाजपा को भी संदेश दे दिया है, जो इससे पहले कार्यकाल खत्म होने के साथ राज्यसभा के अपने अंतिम उद्बोधन और उससे पहले प्रदेश की राजनीति में मध्यप्रदेश की विधानसभा में सदन के अंदर इस्तीफा देकर अपनी आक्रामक राजनीति का परिचय दे चुके हैं..सवाल खड़ा होना लाजमी है कि बुंदेलखंड की राजनीति में क्षेत्रीय दलों की मौजूदगी में लड़े जाने वाले इस चुनाव में क्या कांग्रेस के लिए सत्यव्रत चतुर्वेदी की कोई उपयोगिता रह जाती है, जिन्होंने खुद चुनाव न लड़ने और ना ही कोई पद लेने की बात कहकर नौजवानों को आगे लाने की पैरवी कर युवा पीढ़ी की नब्ज पर हाथ रखा है..

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(सत्यव्रत का स्पष्टीकरण)
नागरिक अभिनंदन समारोह में सत्यव्रत ने सियासत से संन्यास के अपने फैसले पर स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि मैंने बहुत पहले निश्चय कर लिया था और उस पर अडिग हूं..क्योंकि नई पीढ़ी के लिए अब रास्ता सत्यव्रत को छोड़ देना चाहिए..गांव-गांव में सत्यव्रत और उससे क्षमतावान लोग मौजूद हैं, जिनको अवसर मिलना चाहिए..उन्होंने कहा, 1996 में फैसला लिया था कि 65 साल की उम्र में राजनीति से संन्यास ले लूंगा..लेकिन जिम्मेदारी अधूरी नहीं छोड़ सकता था..आज भी अपने संकल्प पर अडिग हूं..अब पार्टी में कोई पद, जिम्मेदारी और चुनाव  लड़ना कोई मायने नहीं रखता..गुजरात चुनाव के समय राहुल गांधी ने मुझे बुलाकर गुजरात के प्रभारी की जिम्मेदारी संभालने को कहा था, लेकिन मैंने व्यक्तिगत अपने संकल्प को सामने रखकर नई जिम्मेदारी से क्षमा मांग ली थी..बाद में अशोक गहलोत को यह जिम्मेदारी सौंपी गई थी..मेरा मानना है कि कोई भी व्यक्ति राजनीति में रहे या ना रहे, उसके चिंतन-व्यवहार में राजनीति का अंश जरूर रहेगा..कहने का आशय ये नहीं कि छतरपुर में यदि आग लगी है तो मैं अपने फार्म हाउस रक्सापुर में पड़ा रहूंगा..कोई ऐसा मुद्दा जो क्षेत्र के जनहित से जुड़ा तो उस पर तटस्थ भी नहीं रह सकता..यहां के विकास में जो कर सकता हूं..चुनावी राजनीति में ना रहकर भी करूंगा..पद, प्रतिष्ठा यानी चुनाव और संगठन की राजनीति से दूर..लेकिन सामाजिक सरोकार की राजनीति से कभी कोई अलग ना हो सका, ना मैं हो सकता हूं..छतरपुर में यदि मेडिकल कॉलेज की बात है तो जनता के हित में आवाज बुलंद करूंगा..विकास के लिए लड़ता रहूंगा..मेरी कोई सुने या ना सुने, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता..कांग्रेस के सामने चुनौती है..प्रदेश की जनता के साथ पिछले 15 वर्षों में जो कुछ हुआ, उसको देखते हुए चुनौती तो फिर तटस्थ नहीं रहूंगा..यदि मुझसे कोई राय मांगी जाएगी तो अपनी राय स्पष्ट तौर पर जरूर दूंगा..मानें या न मानें कोई फर्क नहीं पड़ता है..अगले चुनाव में बीजेपी की इस नाकाम सरकार को बदलने के लिए जो भी होगा वो प्रयास करूंगा..

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( कांग्रेस के लिए चतुर्वेदी का संदेश..)

सक्रिय चुनावी राजनीति से संन्यास लेने वाले सत्यव्रत चतुर्वेदी ने नागरिक अभिनंदन समारोह के दौरान जो कुछ कहा उसमें संदेश कांग्रेस के लिए भी छुपा है..सत्यव्रत ने इस बात का खुलासा किया कि गुजरात चुनाव के समय राहुल गांधी ने उन्हें बुलाकर प्रभारी की जिम्मेदारी संभालने का आग्रह किया था, जिसे उन्होंने विनम्रता के साथ ये कहकर अस्वीकार कर दिया था कि 65 साल के बाद चुनाव नहीं लड़ने और कोई पद नहीं लेने का फैसला मैं बहुत पहले कर चुका हूं, इसलिए बाद में यह जिम्मेदारी अशोक गहलोत को सौंपी गई..छतरपुर में सत्यव्रत ने एक बार फिर कांग्रेस को मजबूत और भाजपा को उखाड़ फेंकने के लिए कोई पद या चुनाव न लड़ने के अपने संकल्प पर अडिग रहते हुए नई पीढ़ी के लिए रास्ता छोड़ देने का आह्वान किया तो सवाल खड़ा होना लाजमी है कि क्या ये बात एक बार फिर बेबाकी से सत्यव्रत चतुर्वेदी पार्टी हाईकमान तक पहुंचाना चाहते हैं, जिसने कुछ दिन पहले ही पुरानी पीढ़ी के कमलनाथ को प्रदेश अध्यक्ष और नई पीढ़ी के ज्योतिरादित्य सिंधिया को चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाकर मध्यप्रदेश भेजा है..सत्यव्रत ने कमलनाथ और सिंधिया किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन यह आह्वान जरूर किया कि नई पीढ़ी के लिए सत्यव्रत जैसे दूसरे लोगों को भी अब चुनावी राजनीति से दूर हो जाना चाहिए..सवाल यहीं पर एक और खड़ा होता है कि क्या जिस कांग्रेस में अभी तक सीएम इन वेटिंग को लेकर कोई चेहरा घोषित नहीं किया गया है उसमें क्या नई भूमिका में सबसे बड़ा एक बार फिर बिना नाम लिए ज्योतिरादित्य को समय आने पर पार्टी का चेहरा घोषित करने की मांग कर रहे हैं..जैसा कि वो इससे पहले भी सार्वजनिक मंच से खुलकर करते रहे हैं..सवाल खड़ा होना लाजमी है कि सत्यव्रत की ये बेबाकी क्या कमलनाथ और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को रास आएगी या फिर वक्त के मिजाज को समझते हुए युवाओं का भरोसा जीतने के लिए सत्यव्रत के मशविरे को कांग्रेस हाईकमान सही समय पर गंभीरता से लेकर कोई बड़ा फैसला ले सकता है.. सवाल छतरपुर टीकमगढ़ और बुंदेलखंड की राजनीति में सक्रिय सत्यव्रत के समकक्ष समकालीन उन नेताओं लेकर भी खड़ा होता है खुद टिकट के दावेदार हैं या फिर कांग्रेस से मोहभंग के साथ दूसरे दलों में शामिल हो गए थे और जिन्हें वापसी का इंतजार है.. क्या नई पीढ़ी और युवाओं की पैरवी ऐसे लोगों और उनके टिकट को संकट में डाल सकती है। कहने वाले कह सकते हैं कि ये सत्यव्रत की छटपटाहट है और अब वो कांग्रेस के लिए प्रासंगिक नहीं रह गए.. फिर भी सवाल क्या सत्यव्रत कांग्रेस के अंदर सिंधिया को दरकिनार करने और कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के बीच पर्दे के पीछे बढ़ती प्रगाढ़ता से खुश नहीं हैं.. या फिर अपनी पूछ-परख कम होने को लेकर वो नौजवानों की नब्ज पर हाथ रखकर कांग्रेस को आईना दिखा रहे हैं कि अभी भी समय है..सुधर जाओ और जनापेक्षाओं को समझो.. फिर भी बड़ा सवाल बुंदेलखंड और छतरपुर से पहले चतुर्वेदी परिवार की कलह क्षेत्र में कांग्रेस के कायाकल्प के इस नए मिशन में कहीं उनके अपने उसूल रोड़ा तो नहीं बनेंगे..
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( साध्वी और सत्यव्रत की भूमिका पर सस्पेंस)

बुंदेलखंड की चुनावी राजनीति से यूं तो कई चेहरे निकलकर भोपाल और दिल्ली पहुंचे जिन्होंने बड़ा मुकाम हासिल किया तो अपनी पहचान बनाई, लेकिन इस क्षेत्र के दो दिग्गज नेता साध्वी उमा भारती और सत्यव्रत चतुर्वेदी एक बार फिर चर्चा में हैं तो उसकी वजह है कुछ माह के अंदर इन दोनों नेताओं का छतरपुर में नागरिक अभिनंदन..जो क्षेत्र की रोजमर्रा की राजनीति से बहुत पहले से ही दूरी बनाए हुए हैं..पिछले दिनों संन्यास के 25 साल पूरे हो जाने के बाद उमा भारती राम मंदिर न्यास के प्रमुख के साथ एक कार्यक्रम में नजर आ चुकी हैं ..तो अब राज्यसभा सांसद के रूप में कार्यकाल पूरा होने के बाद कोई पद नहीं लेने और चुनाव नहीं लड़ने का एलान पहले ही कर चुके सत्यव्रत चतुर्वेदी का नागरिक अभिनंदन किया गया..उमाश्री का कार्यक्षेत्र झांसी-उत्तर प्रदेश है जो केंद्र में मंत्री की जिम्मेदारी निभा रही हैं, लेकिन मध्यप्रदेश की भाजपा की अंदरूनी राजनीति से पूरी तरह दूर… ऐसे में जब कर्नाटक विधानसभा चुनाव के परिणाम का बिना इंतजार किए भाजपा 23 हजार से ज्यादा प्रदेश की हर पंचायत पर अपने शीर्ष नेताओं के साथ जिसमे दूसरे राज्यों के आयातित नेता शामिल.. को लेकर अपनी प्रभावी मौजूदगी दर्ज कराने जा रही हैं..तब उमाश्री के भोपाल में होने के बावजूद ऐसे किसी कार्यक्रम में शामिल होंगी, इसके संकेत नहीं मिले..वो बात और है कि स्वच्छता के कार्यक्रम में शिवराज और उमाश्री एक साथ मंच साझा करने के बाद दूसरे दिन भी नाश्ते पर मिले..जब उमाश्री शिवराज से मिलने मुख्यमंत्री निवास पहुंचीं.. ऐसे में प्रदेश भाजपा को भले ही साध्वी उमा भारती की कोई जरूरत चुनाव को लेकर ना पड़ रही हो, लेकिन सत्यव्रत चतुर्वेदी बुंदेलखंड में अपनी दस्तक दे चुके हैं, जिन्होंने पिछले दिनों कमलनाथ सिंधिया के स्वागत अभिनंदन कार्यक्रम और जमावड़े से पूरी तरह दूरी बनाई थी… उन सत्यव्रत के छतरपुर में आयोजित नागरिक अभिनंदन कार्यक्रम में जिले और संसदीय क्षेत्र के कांग्रेस के पूर्व विधायक और टिकट के दावेदारों ने दूरी बनाई..वो बात और है कि झांसी के पूर्व सांसद और केंद्रीय मंत्री रह चुके प्रदीप जैन के अलावा मध्यप्रदेश के पूर्व मंत्री राजा पटेरिया और जगदंबा निगम जैसे क्षेत्र के पुरानी पीढ़ी के नेता वहां मौजूद थे.. तो कह सकते हैं कि भाजपा के अंदर यदि साध्वी उमाश्री तो कांग्रेस के भीतर सत्यव्रत चतुर्वेदी की चुनाव में भूमिका को लेकर जब सस्पेंस गहराता जा रहा है, तब कम से कम दिल्ली से छतरपुर में डेरा डाल बुंदेलखंड में कांग्रेस को चुनाव जिताने के लिए जा पहुंचे सत्यव्रत ने भाजपा को उखाड़ फेंकने के लिए अपनी सक्रियता के स्पष्ट संकेत दे दिए.. सिद्धांत विचारधारा.. किसी आशिक सामाजिक सरोकार के मोर्चे पर नए सिरे से लड़े जाने का शंखनाद जिन आक्रमक तेवरों के साथ सत्यव्रत ने किया शायद उसका अनुमान उस क्षेत्र के कांग्रेस के नेताओं को नहीं रहा होगा जिन्होंने एक तरह से कार्यक्रम का बायकॉट किया….ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि 2018 से 2019 तक कोई चुनाव न लड़ने का ऐलान कर चुकी उमा भारती क्या अपने बुंदेलखंड में सक्रिय नजर आएंगी या नहीं… जिन्होंने प्रचार से इनकार नहीं किया वह बात और है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान छतरपुर जिले की राजनगर क्षेत्र की पंचायत में पहुंच रहे।