सवाल दर सवाल

बावरिया ने ‘राहुल गांधी’ को दांव पर लगाया..{ राजेश अग्निहोत्री :सवाल दर सवाल: नया इंडिया}

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सवाल दर सवाल, राकेश अग्निहोत्री, नया इंडिया
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बावरिया ने  ‘राहुल गांधी’ को दांव पर लगाया!

कांग्रेस कंफ्यूज या प्रदेश प्रभारी
कांग्रेस है कि मानती नहीं..नाबाबरिया गलती से सीख लेने को तैयार वो..न ही फैसले लेने से पहले वो सोचने-समझने को तैयार.. ना शिवराज की काट ना  और ना ही  चुनाव जीतने के लिए कोई रोड मैप और ब्लू प्रिंट के साथ  कोई बड़ा आंदोलन  खड़ा कर सरकार की नींद उड़ा देने में समर्थ और सक्षम..इससे उलट अपने लिए गए फैसलों को पलटना उसके प्रभारी के लिए अब कोई नई बात नहीं रह गई..कम से कम बात जब परसेप्शन और टाइमिंग की होगी तो मध्यप्रदेश में कांग्रेस के अंदर बने इन हालातों से कोई इनकार नहीं कर सकता..जिस कांग्रेस में क्षत्रप बड़ी ताकत बनकर उसे सत्ता तक पहुंचाते रहे..आज वो ही क्षत्रप कमजोर कड़ी के तौर पर सामने हैं..दिलचस्प बात ये है कि कांग्रेस के कायाकल्प के लिए गुजरात से भोपाल पहुंचे प्रदेश प्रभारी की भूमिका में दीपक बाबरिया का हर दांव उल्टा पड़ता हुआ नजर आ रहा है, चाहे फिर वो कांग्रेस के कायाकल्प हेतु लिए गए फैसलों की हवा निकल जाना हो या फिर चुनाव में जाने से पहले बहुप्रतीक्षित स्िक्रप्ट का इंतजार..अचानक जब 48 घण्टे के अल्टीमेटम पर दीपक बाबरिया के हवाले से राहुल गांधी के मध्यप्रदेश दौरे को हरी झंडी दी गई..जिसे कुछ घंटे के अंदर प्रदेश कांग्रेस के नेताओं ने खारिज कर दिया..ऐसे में सवाल राष्ट्रीय अध्यक्ष की गरिमा के साथ प्रदेश कांग्रेस कार्यालय को भरोसे में नहीं लिए जाने को लेकर खड़े हो गए..तो सवाल खड़ा होना लाजमी है कि आखिर कांग्रेस कंफ्यूज है या फिर प्रदेश प्रभारी दीपक बाबरिया? मध्यप्रदेश के दिग्गजों के रहते  क्या बाबरिया उनसे अनुभव और दूसरे मोर्चे पर भी बड़े हो गए, जो फैसले थोपने ही नहीं, बल्कि पलट देने के लिए अब जाने जाते हैं..

 
मध्यप्रदेश के साथ जब देश में मोदी और उनकी सरकार के उपवास की चर्चा सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बनी तो गुरुवार को अचानक राहुल गांधी के मध्यप्रदेश दौरे की खबर ने न सिर्फ बीजेपी बल्कि कांग्रेस के नेताओं की भी नींद उड़ा दी..प्रदेश कांग्रेस संगठन, उसके पदाधिकारी और जिम्मेदार नेताओं को ये जानकारी नहीं थी कि राहुल गांधी 14 अप्रैल को संविधान बचाओ मिशन के साथ मध्यप्रदेश आ रहे हैं..प्रदेश प्रभारी दीपक बाबरिया के हवाले से प्रकाशित खबर की सत्यता पर मध्यप्रदेश के नेता बगले झांकते हुए नजर आए, जिसकी अपनी वजह थी..संगठन स्तर पर इस दौरे की कोई सूचना नहीं थी..अधिकांश नेताओं को भरोसे में बिना लिए दीपक बाबरिया ने राहुल गांधी को मध्यप्रदेश दौरे से जोड़ते हुए दांव पर लगा दिया..वो भी तब जब राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद अंबेडकर जयंती के मौके पर उनकी जन्मस्थली महू पहुंच रहे हैं..ऐसे में राहुल गांधी के दौरे, मकसद, स्थान और कार्यक्रम के स्वरूप को लेकर एक साथ कई सवाल खड़े हो गए..बावरिया के बयान के बाद कांग्रेस में यदि सन्नाटा पसरा था तो कोई अधिकृत तौर पर ये बताने को तैयार नहीं था कि 14 अप्रैल को आखिर राहुल गांधी महू पहुंचकर डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के सिद्धांत और उनकी गाइडलाइन को आत्मसात कर क्या पूरे देश को ये बताएंगे कि संविधान संकट में आ चुका है और इस संकट से कांग्रेस देश को कैसे बाहर निकाल सकती है..इन हालातों के लिए आखिर जिम्मेदार कौन है..पिछले दिनों से राहुल गांधी का राजघाट पर उपवास और उनकी पार्टी के नेताओं द्वारा छोले-भटूरे खाए जाने की तस्वीरें वायरल होने के साथ कांग्रेस की रणनीति पर सवाल खड़े किए गए तो यहाँ कुछ घंटे बाद ही दीपक बाबरिया ने राहुल गांधी को मध्यप्रदेश के दौरे से जोड़ते हुए उन्हें दांव में लगाने पर कोई कसर नहीं छोड़ी..राहुल के इस दौरे का मकसद क्या है, इसका जवाब किसी के पास नहीं मिला.. अलबत्ता बहस दूसरी दिशा की ओर तब आगे बढ़ गई, जब आनन-फानन में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और दूसरे नेताओं ने मीडिया के मार्फत दोपहर बाद ये संदेश स्पष्ट तौर पर प्रसारित करवाया कि राहुल गांधी का मध्यप्रदेश दौरा निरस्त कर दिया गया है..ना तो राहुल गांधी के इस दौरे को स्थगित करने की बात सामने आई..यहीं पर कांग्रेस के हालात और उसकी दशा और दिशा को लेकर कुछ नए सवाल खड़े होते हैं, जिसका सीधा कनेक्शन प्रदेश प्रभारी दीपक बाबरिया से है..सवाल राहुल गांधी को दांव पर लगाने तक सीमित नहीं है..सवाल ये खड़ा होता है कि कांग्रेस मध्यप्रदेश में कंफ्यूज है या फिर कांग्रेस के कायाकल्प की जिम्मेदारी जिस दीपक बाबरिया को सौंपी गई है वो मध्यप्रदेश के मिजाज को समझ ही नहीं पाए हैं..कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं में तो अब चर्चा इस बात होने लगी है कि मिशन 2018 विधानसभा चुनाव का ये गुजरात कनेक्शन आखिर क्या गुल खिलाएगा..गुजरात में जिस तरह शंकर सिंह बाघेला ने कांग्रेस में रहकर उसकी परेशानी बढ़ाई और बाद में सही समय पर वो नरेंद्र मोदी के पाले में जाकर खड़े हो गए, तो सवाल दीपक बाबरिया की भूमिका को लेकर भी खड़े होते हैं कि आखिर वो चाहते क्या हैं..क्या उनके लिए गए फैसलों से कांग्रेस मजबूत होने की बजाय और कमजोर और दिशाहीन हो रही है..बाबरिया द्वारा टिकट के आवेदनकर्ताओं और दावेदारों से 50 हजार रुपए जमा कराने का मामला हो या फिर उम्मीदवार के लिए उम्र का क्राइटेरिया सीमित कर देना..यही नहीं, संगठन के अंदर जिलाध्यक्षों को बदले जाने के फैसले को भी उन्होंने रोक दिया है तो तमाम इंटरव्यू के बावजूद प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में प्रवक्ता, वक्ता और मीडिया प्रभारी जैसे दूसरे पदों के लिए नए चेहरों की तलाश अंजाम तक नहीं पहुंच पाई है..बात यहीं खत्म नहीं होती, मोहन प्रकाश के जाने के बाद दीपक बाबरिया के 2 बड़े बयानों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, चाहे फिर वो मुंगावली-कोलारस विधानसभा उपचुनाव के दौरान क्षेत्र के सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया से जुड़े सवाल पर चेहरा प्रोजेक्ट नहीं किए जाने पर स्पष्टीकरण से जुड़ा हो या फिर नर्मदा परिक्रमा के दौरान राजनीतिक बयानों से दूरी बनाने वाले दिग्विजय सिंह के हवाले से कांग्रेस संगठन और चुनाव के लिए जरूरी फंड जुटाने का बाबरिया का बयान हो..उसने बवाल मचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी तो सवाल यहीं पर खड़ा होता है कि क्या प्रदेश कांग्रेस को बिना भरोसे में लिए राहुल गांधी के मध्यप्रदेश दौरे की खबर की पुष्टि की थी तो इसकी वजह क्या थी..यही नहीं, आनन-फानन में राहुल गांधी के मध्यप्रदेश दौरे को निरस्त किए जाने की खबर यदि सामने आई तो क्या ये फैसला भी प्रदेश से लेकर केंद्रीय कार्यालय की जानकारी में लिया गया या फिर वजह कुछ और है..सवाल ये भी खड़ा होता है कि क्या आधी-अधूरी जानकारी के साथ राहुल गांधी को मध्यप्रदेश में उस वक्त बुलाया जा रहा था जब ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में दलित हिंसा भाजपा सरकार के लिए परेशानी का सबब बनी हुई है तो आखिर राहुल गांधी को सामने रखकर बाबरिया उनसे क्या संदेश दिलाना चाहते थे..ये कांग्रेस का दलित प्रेम आइडियोलॉजी है या फिर इसकी वजह कुछ और थी..अध्यक्ष अरुण यादव को छोड़ दिया जाए तो कांग्रेस के जिम्मेदार नेताओं ने हिंसा प्रभावित और पीड़ित दलित परिवार के साथ जाकर मेल-मुलाकात करना मुनासिब नहीं समझा, जबकि मंदसौर गोलीकांड के बाद कांग्रेस के अंदर कुछ दूसरी तरह की होड़ लगी थी..जहां खुद राहुल गांधी भी पहुंचे थे..क्या ये मान लिया जाए कि कांग्रेस ने समय रहते राहुल गांधी के दौरे को निरस्त कराने में इसलिए रुचि ली कि उसके रणनीतिकार ये नहीं चाहते थे कि बड़े घटनाक्रम के बाद सवर्णों की नाराजगी उसे मोल लेना पड़े या फिर राहुल गांधी के दौरे को निरस्त करने की वजह उनके नेताओं और कांग्रेस कार्यालय में बैठे जिम्मेदार लोगों के हाथ-पांव फूल जाना है..जो अच्छी तरह जानते हैं कि 48 घंटे के अंदर राष्ट्रीय अध्यक्ष की हैसियत से पहली बार मध्यप्रदेश आने वाले राहुल गांधी के दौरे को ऐतिहासिक और यादगार बनाना आसान नहीं होगा..उसी दिन अंबेडकर जयंती पर महू में राष्ट्रपति का आना और राज्य से लेकर केंद्र की सरकार में रहते भाजपा का पहले ही इसे शक्ति परीक्षण में तब्दील करने की रणनीति..वजह जो भी हो, लेकिन यदि दीपक बाबरिया के हवाले से राहुल गांधी के आने की ख़बर सुर्खियां बनती है तो क्या इसे कांग्रेस के अंदर समन्वय-सामंजस्य के अभाव से जोड़कर देखा जा सकता है.. या फिर राहुल गांधी का कोई दौरा ही नहीं बना था और अधिकृत पुष्टि से पहले ही जिम्मेदार प्रदेश प्रभारी दीपक बाबरिया ने इसकी पुष्टि कर दी तो बड़ा सवाल मिशन 2018 और 19 चुनाव को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस की स्कि्रप्ट और फार्मूला सामने आने से पहले राहुल गांधी का दौरा और उसे कुछ घंटों में निरस्त कर दिए जाने से खड़े तो होते हैं, क्या इसका जवाब प्रदेश प्रभारी दीपक बाबरिया को देना होगा..गुजरात के इस खिलाड़ी को मध्यप्रदेश की कांग्रेस यदि नहीं समझ पा रही है तो फिर उसकी वजह क्या बाबरिया के जल्दबाजी में लिए गए फैसले हैं या फिर राहुल गांधी के नाम पर सबको चमकाकर अपनी लाइन बढ़ाना और खुद को स्थापित करना है… करीब 6 माह के  सीमित कार्यकाल में दीपक बावरिया की उपलब्धि का आंकलन अब उनकी पार्टी के नेता और कार्यकर्ता करने लगे हैं..बड़ा सवाल दीपक बाबरिया कांग्रेस के सभी दिग्गजों और क्षत्रपों को एक मंच पर कब लाएंगे? जब मुद्दों की भरमार  है तो  कोई बड़ा आंदोलन उसके कार्यकर्ताओं को कब देखने को मिलेगा..दीपक मध्यप्रदेश में राहुल गांधी को भरोसे में लेकर क्या उनकी लाइन को आगे बढ़ा रहे या फिर वह खुद प्रदेश के क्षत्रपों को अलग-अलग भरोसे में लेकर अपनी लाइन आगे बढ़ाने के लिए खुद एक पार्टी बन गए.. कांग्रेस और राहुल गांधी की नजर में संविधान पर संकट तो फिर संविधान निर्माता डॉ आंबेडकर और उनके अनुयायियों से आखिर मध्यप्रदेश में दूरी अंतिम समय में बनाने का फैसला क्यों लिया गया..क्या कांग्रेस के क्षत्रपों को एकजुट करने की बजाय बाबरिया फार्मूला ने उनमें दूरियां और ज्यादा बढ़ा दी है..