सवाल दर सवाल

टीम भागवत के राडार पर मध्यप्रदेश! राकेश अग्निहोत्री ‘सवाल दर सवाल’ नया इंडिया

cm1

सवाल दर सवाल, राकेश अग्निहोत्री नया इंडिया
मैै
टीम भागवत के राडार पर मध्यप्रदेश!
कृष्ण गोपाल से मिलने के बाद नागपुर पहुंचे शिवराज
मध्यप्रदेश में अचानक संघ की बढ़ती सक्रियता ने भाजपा नेता और कार्यकर्ताओं के कान खड़े कर दिए ..वजह साफ है पहले सह सरकार्यवाह कृष्ण गोपाल का भोपाल में समन्वय बैठक बुलाना और ठीक इसके बाद शिवराज सिंह चौहान का नागपुर पहुंचना। संघ के रडार पर मध्य प्रदेश मतलब साफ आने वाले समय में रुके हुए फैसलों की नई स्क्रिप्ट  सामने आने का समय आ गया.. मध्यप्रदेश में कांग्रेस की बढ़ती सक्रियता और क्षत्रपों की एकजुटता  टीम शिवराज और उसके रणनीतिकारों को नए सिरे से चुनावी बिसात बिछाने को लगभग मजबूर कर चुकी है ।नरेंद्र मोदी और अमित शाह को भी मालूम है कि राज्य सरकार की उपलब्धियां और शिवराज की लोकप्रियता चुनाव में भुनाने का समय आ गया है । जरूरत है कार्यकर्ताओं को भरोसे में लेकर  उनमें जोश भरने की .. ऐसे में संघ  की कोशिश यह है कि भाजपा में वह संदेश ना जाए जिसका खामियाजा पिछले डेढ़ दशक से कांग्रेस मध्यप्रदेश में भुगत रही है ।यानी शिवराज को सामने रखकर चुनाव सिर्फ विधान सभा नहीं बल्कि लोकसभा की सीटों को ध्यान में रखते हुए लड़ा जाएगा । इसके लिए किसी ऐसे फार्मूले की दरकार है जिसमें दिल्ली में दखल रखने वाले मध्य प्रदेश के सभी नेता एडजस्ट हो जाए यानी 2003 में दिग्विजय सिंह सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए जिस रणनीति को अंजाम तक पहुंचाया गया था इस बार शिवराज सरकार को पुनः सत्ता में लौट आने के लिए लगभग उसी तर्ज पर बदलते परिवेश में नई चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए भाजपा  को चुनाव में जाना होगा..प्रदेश भाजपा अध्यक्ष को लेकर रुके हुए फैसले के साथ हाईकमान को नए प्रदेश प्रभारी ही नहीं बल्कि चुनाव अभियान समिति से लेकर दूसरे मोर्चे पर भी आगे बढ़ते हुए खुद को दिखाना होगा.. क्योंकि यदि प्रदेश में आनन-फानन में स्थापित किए गए भाजपा वार रूम के ताले अभी नहीं खुले हैं तो मोदी और शाह के नेतृत्व में होने वाली बाइक रेली पहले ही स्थगित की जा चुकी है..
शिवराज सिंह चौहान का नागपुर दौरा सरसंघचालक मोहन भागवत से मुलाकात से जोड़कर देखा जा रहा है, वो भी तब जब संघ के सह सरकार्यवाह कृष्ण गोपाल से एक  दिन पहले शिवराज ने समन्वय बैठक में चर्चा की..इसी दिन केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय और उपाध्यक्ष प्रभात झा के साथ भोपाल पहुंचते हैं..मुख्यमंत्री के कोर कमेटी की बैठक से बाहर निकलने के बावजूद सदस्यों का चिंतन-मंथन इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भाजपा की नजर सिर्फ कांग्रेस पर नहीं बल्कि पार्टी के अंदर भी है, जहां स्थितियों को और बेहतर करने की चुनौती टीम शिवराज और उनके रणनीतिकारों के लिए बढ़ती जा रही है..संघ ने हमेशा जिस सामाजिक समरसता के एजेंडे को आगे बढ़ाकर दलित और आदिवासी वर्ग को साधने के लिए एक साथ कई मोर्चे पर काम किया वो मध्यप्रदेश में पिछले दिनों भड़की हिंसा के बाद भाजपा से छिटक न जाए, इस बात की चिंता अब संघ को भी सताने लगी है तो मंदसौर गोलीकांड के बाद किसान को भरोसे में लेने के लिए शिवराज कड़ी मशक्कत कर रहे हैं..भाजपा को चुनाव जिताने में बड़ी भूमिका निभाता रहा किसान वोट बैंक हो या फिर दलित-आदिवासी का समर्थन और वोट पर जब से कांग्रेस की पहली नजर लगी है तब से भाजपा नए सिरे से रणनीति बनाने को मजबूर हुई है..बसपा सुप्रीमो मायावती कांग्रेस के साथ बढ़ती निकटता के संकेत दे चुकी हैं, अखिलेश यादव की राहुल गांधी से मित्रता मध्यप्रदेश में भाजपा विरोधियों को एकजुट कर सकती है..ऐसे में जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कर्मचारियों से लेकर किसानों को भरोसे में लेने के लिए नई नीति के तहत उनके लिए सरकार का खजाना खोल दिया है तब भी जो माहौल भाजपा के पक्ष में बन जाना चाहिए था वो अभी तक बनता हुआ नजर नहीं आ रहा है..मथुरा से मुरैना पहुंची किसान सम्मान यात्रा का जितना जोर-शोर के साथ प्रचार-प्रसार किया गया था वो ग्वालियर-चंबल में भड़की हिंसा के बाद पीछे छूटता हुआ नजर आ रहा है तो भाजपा ने अटेर-चित्रकूट के बाद मुंगावली-कोलारस विधानसभा उपचुनाव में मिली हार को भी गंभीरता से लेना शुरू कर दिया है..भले ही वो इन चार चुनावों में कांग्रेस के कब्जे का हवाला देकर अपने मतों का ग्राफ बढ़ने का दावा कर अपनी लाइन बड़ी करती रही है..कुल मिलाकर मध्यप्रदेश में प्रदेश भाजपा अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान की विदाई के स्पष्ट संकेत मिलने के बावजूद किसी एक चेहरे पर सर्वसम्मति ना बनने की स्थिति में भाजपा में एक अजीबोगरीब माहौल बन चुका है..ऐसे में समन्वय बैठक के साथ कोर कमेटी का चिंतन-मंथन मायने रखता है.. एक ओर शिवराज की सरकार इस चुनावी साल में लोक लोक  लुभावन घोषणाएं और सौगातों की झड़ी लगाकर जनता और हर वर्ग समुदाय की अपेक्षाओं को पूरा करने में जुटी है तो दूसरी ओर भाजपा संगठन में जो जोश और कार्यकर्ताओं में जुनून नजर आना चाहिए वो नदारद है..शिवराज ने कर्मचारियों, किसानों से लेकर कर्मचारी तो संत-महात्माओं से लेकर मीडिया को भी भरोसे में लेने की कोशिश की है..शिवराज ने पिछले 13 साल में मध्यप्रदेश की राजनीति को सामाजिक सरोकारों से जोड़कर ऐसा ताना-बाना बनाया है, जिसमें उसे कानूनी मान्यता देकर अहसास नहीं बल्कि उसे उसका हक दिलाने की सोच को कारगर सिद्ध किया, बावजूद इसके विधायकों के खिलाफ क्षेत्र में बढ़ती नाराजगी और मंत्रियों से कार्यकर्ताओं की बढ़ती दूरी भाजपा के लिए सिरदर्द बन गई है… भाजपा की चिंता 2003 में सरकार बनाने के साथ उस वोट बैंक को नहीं बिखरने देने की है जिसके दम पर उसने मध्य प्रदेश में जीत की हैट्रिक बनाई लेकिन देश में बने ताजा माहौल मध्य प्रदेश के रणनीतिकारों को भी चौकन्ना कर दिया है…