सवाल दर सवाल

बावरिया के फैसलों पर बवाल से कांग्रेस में बेचैनी} राकेश अग्निहोत्री ‘सवाल दर सवाल’ नया इंडिया

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सवाल दर सवाल “राकेश अग्निहोत्री” नया इंडिया नया

{बावरिया के फैसलों पर बवाल से कांग्रेस में बेचैनी}
( * क्या कांग्रेस मध्यप्रदेश में दो कदम आगे तो चार कदम पीछे कहावत को चरितार्थ कर रही!)
(* क्या दीपक   कांग्रेस को हाइजैक कर फैसले  थोपने लगे,  संकट भरोसे का खड़ा हो गया )
प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी दीपक बावरिया के बोल अब कांग्रेस के क्षत्रपों को रास नहीं आ रहे हैं,  तो पार्टी में उनके फैसलों से नया बवाल मच गया है.
यह स्थिति उस वक्त निर्मित हुई है जब महाधिवेशन में राहुल गांधी पुरानी और नई पीढ़ी के नेताओं के बीच समन्वय बनाकर आगे बढ़ रहे.. मिशन 2018 और उमेश को ध्यान में रखते हुए  जब मध्यप्रदेश में नेताओं और कार्यकर्ताओं को राहुल के नए फार्मूले का इंतजार है  तब  संगठन के लिए जरूरी समन्वय सामंजस्य पर नए सिरे से सवाल खड़े होने लगे हैं  तो उसकी वजह है  दीपक बाबरिया द्वारा लिए गए फैसले ।मध्य प्रदेश के प्रभारी की जिम्मेदारी संभालने के 6 माह के अंदर 6 बड़े फैसलों ने बावरिया को बैक फुट पर लाकर खड़ा कर दिया..
बड़ा फैसला विधानसभा सत्र के दौरान कांग्रेस के विरोध प्रदर्शन की तारीख दो बार बदलने के साथ उसे निरस्त कर कर दिया जाना है. जिस पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव को उनकी दूसरी पारी में साख और नेतृत्व पर  नया सवाल खड़ा कर बड़ा झटका दिया है ..सभी क्षत्रपों की मौजूदगी में पहले 12 फिर 13 मार्च फिर 22 मार्च की तारीख मुकर्रर की गई थी।सवाल क्या सड़क की लड़ाई में  कांग्रेस असहाय साबित हुई।क्यों कि दिल्ली में बुलाई गई बैठक से कमलनाथ और सिंधिया अपनी व्यस्तताएं बता कर उठकर चले गए तो बावरिया की नेतृत्व क्षमता पर सवाल खड़े होने लगे।दूसरा फैसला टिकट के दावेदारों से ₹50000 जमा कराने पर नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह द्वारा खड़े किए गए सवाल से बवाल मचा।
तीसरा फैसला टिकट के उम्मीदवारों की उम्र 60 साल सीमित किए जाने पर तब खड़ा हुआ जब 70 से ज्यादा साल के राजमणि को राज्यसभा में भेजा जाता, प्रदेश के शीर्ष नेताओं को भरोसे में नहीं लिया जाता। वह भी तब जब  करीब 70 पार कर चुके कमलनाथ  लगातार चुनाव जीत रहे हैं और CM इन वेटिंग के तौर पर अपनी दावेदारी को लेकर कुछ ज्यादा ही सजग और सतर्क हैं। चौथा सवाल कांग्रेस में चेहरा प्रोजेक्ट किए जाने से जुड़ा जिस पर दीपक बाबरिया ने उपचुनाव के दौरान सिंधिया को काउंटर कर उनकी नाराजगी बढ़ा देने से  सामने आया। प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में सिंधिया की मौजूदगी में  दीपक बावरिया  इस मुद्दे पर  असरदार तरीके से अपनी बात तक नहीं कर पाए थे, जो लोगों के गले उतरती ।पांचवा  सवाल मीडिया मैनेजमेंट को लेकर युवा टैलेंट के लिए गए इंटरव्यू के बाद अभी कोई स्क्रिप्ट सामने नहीं आने से खड़ा हुआ।
छठवां बड़ा  सवाल कांग्रेस के क्षत्रपों के बीच समन्वय बनने की बजाए बिगड़ने से निर्मित हुआ जिससे बावरिया असहाय साबित हो रहे। वह भी तब जब  नर्मदा परिक्रमा पर निकले दिग्विजय सिंह की  कांग्रेस की सियासत में री इंट्री  होना बाकी है। कुल मिलाकर कांग्रेस के लिए आचार संहिता लगने से पहले के छह माह बहुत मायने रखते  ऐसे में सवाल खड़ा होना लाजमी है क्या 6 मई के अपने सीमित कार्यकाल में बतौर प्रदेश प्रभारी दीपक बावरिया के बोल से ज्यादा उनके फैसले कार्यकर्ताओं की बेचैनी बढ़ा रहे तो चौथी बार अपने सियासी बनवास की बाट जोह रही कांग्रेस का मध्य प्रदेश में भविष्य क्या होगा।
मध्य प्रदेश में कांग्रेस  दो कदम आगे तो चार कदम पीछे  आने की कहावत को चरितार्थ करती हुई नजर आ रही है।  मोहन प्रकाश के जाने के साथ दीपक बावरिया ने बतौर प्रदेश प्रभारी जो उम्मीदें जगाई थी अब उस पर पानी फिरता नजर आ रहा। कुछ अटपटे और बदलते फैसलों के कारण  एक साथ कई सवाल यदि खड़े हुए हैं  तो उसकी वजह है  दीपक बाबरिया। क्या बाबरिया के बोल नेताओं को रास नहीं आ रहे और उसने कार्यकर्ताओं की बेचैनी बढ़ा दी..क्या दीपक बावरिया वीटो पावर के साथ फैसले प्रदेश कांग्रेस पर थोपने लगे हैं जो बदलने को मजबूर हुए…
आखिर क्या वजह है मंडलम फॉर्मूला  आधा-अधूरा तो मीडिया मैनेजमेंट पर प्रश्न चिन्ह के साथ एआईसीसी डेलीगेट्स की सूची पर सवाल खड़े हुए…
राज्यसभा के लिए राजमणि पटेल की उम्मीदवारी के पीछे कांग्रेस में सहमति से ज्यादा सवाल हार्दिक पटेल के इंटरेस्ट से क्यों जुड़ा..पिछले 6 माह में दीपक बावरिया की वर्किंग पर सवाल खड़े किए जाना कितने जायज जब सड़क की लड़ाई को लेकर आंदोलन स्थगित कर दिया गया..नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह की बेबाकी हो या फिर कमलनाथ सिंधिया का बैठक से उठकर चले जाने की खबरें क्या बावरिया की नेतृत्व क्षमता पर सवाल खड़ा करने के लिए काफी है…
आखिर क्या वजह है कि दीपक बावरिया को सभी क्षत्रपों को एक साथ भोपाल में बैठाकर जो संदेश देना था वह दिल्ली में भी नहीं दे पाए…क्या दीपक बावरिया क्षत्रपों की नाराजगी बढ़ाकर ऐसे में राहुल गांधी की अपेक्षाओं पर खरा उतर कर दिखा पाएंगे..
सवाल दिग्विजय सिंह की भूमिका को लेकर भी खड़े होना लाजिमी है जो फिलहाल नर्मदा यात्रा पर है…तो बड़ा सवाल बाबरिया के बोल और उनके फैसले क्या अब नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ कांग्रेस की बेचैनी   में इजाफा कर रहे हैं जन समस्याओं से कांग्रेस समय रहते समाधान का रास्ता निकाल कर कैसे बाहर निकलेगी.. काफी हद तक यह सच है कि विधानसभा उपचुनाव में मिली जीत ने यदि उनके नेताओं को जगा दिया तो कार्यकर्ताओं में भी उम्मीद की किरण जागी है.. यह भी सच है कि संगठन स्तर पर दीपक बाबरिया ने निचले स्तर से फीडबैक लेने के बाद लंबी एक्सरसाइज कर एक नई जमावट के सकारात्मक संदेश दिए हैं। बावजूद इसके सही समय पर सही फैसला नहीं लेने के कारण कांग्रेस दो कदम आगे तो चार कदम पीछे खड़ी नजर आ रही है। इस चुनावी साल में यदि बार-बार कांग्रेस को एक बार फिर शीर्ष नेताओं के बीच एकजुटता का दावा करना पड़ रहा है और उसकी कथनी और करनी कुछ और ही कहानी बयां कर रहे तो समझा जा सकता है कि इसमें कितनी सच्चाई है। यदि दीपक बावरिया मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल और प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में सभी क्षत्रपों को एक साथ एक कमरे में बैठा कर यदि चिंतन-मंथन नहीं कर पाए हैं तो क्या यह मान लिया जाए कि उनके नेताओं के दावे खोखले है। कांग्रेस को अच्छी तरह मालूम है कि बीजेपी को ताकत कांग्रेस नेताओं की कमजोरी ही देती रही है। किसी प्रदेश प्रभारी के लिए करीब 6 माह का समय नेताओं की सोच पर कार्यकर्ताओं की भावनाओं को समझने के लिए काफी माना जाएगा। इन चुनिंदा फैसलों पर यदि गौर किया जाए तो कांग्रेस अभी तक द्वंद की स्थिति से बाहर नहीं निकली है। जो खास तौर से किंतु परंतु और शर्तों के बीच भले ही उम्मीदवार के लिए उम्र के क्राइटेरिया से जुड़े हो या फिर संगठन की बदहाल स्थिति को दुरुस्त करने के लिए आर्थिक सहयोग से या फिर विपक्ष की भूमिका में एक बड़े आंदोलन की जरूरत से और सियासत में मीडिया और प्रबंधन के मोर्चे पर अपनी कमजोरी को दुरुस्त करने से। कांग्रेस के नेता अंदरखाने अब दीपक बाबरिया पर संगठन को हाईजैक कर निर्णय तो पर जाने के आरोप भी लगाने में नहीं चूक रहे हैं। समन्वय और एकजुटता की बात पीछे छूट रही और संदेश दिया जा रहा है कि राहुल गांधी के नाम पर मध्यप्रदेश के क्षत्रपों को भरोसे में बिना लिए फैसले तो पर जाने के कारण फिलहाल कांग्रेस प्रदेश और केंद्र के बीच बढ़ती हुई नजर आ रही है ।जिसमें नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह और प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव की केमिस्ट्री मजबूत मानी जा रही है जो जमीनी लड़ाई मध्यप्रदेश में लड़ते हुए नजर आ रहे हैं ।लेकिन दूसरी ओर राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय कमलनाथ और ज्योतिराज सिंधिया कि जिस जोड़ी ने नए सिरे से समन्वय बनाकर प्रदेश कांग्रेस को ताकत देने की योजना पर कदम आगे बढ़ाएं थे वो भी अब प्रदेश प्रभारी की भूमिका से संतुष्ट नजर नहीं आते। यह धारणा कांग्रेस के लिए कतई अच्छा संकेत नहीं माना जाएगा वह भी तब जब राहुल गांधी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के साथ मिशन 2019 पार्टी के अस्तित्व से जुड़ चुका है। ऐसे में मिशन 2018 विधानसभा चुनाव मध्यप्रदेश कांग्रेस नेताओं से ज्यादा सोनिया और राहुल के लिए व्यक्तिगत तौर पर भी महत्वपूर्ण हो गया है। पिछले 14 साल में विपक्ष में रहते कांग्रेस ने न सिर्फ अपने प्रदेश प्रभारी हूं को बदला है बल्कि प्रदेश अध्यक्ष के तौर भी नए चेहरों का प्रयोग परिणाम मूलक साबित नहीं हुआ। देखना दिलचस्प होगा कांग्रेस महाधिवेशन के बाद राहुल गांधी की अगुवाई में बनने वाली राष्ट्रीय स्तर की टीम के साथ मध्यप्रदेश में कौन सा फार्मूला लेकर दीपक बाबरिया सामने आते हैं सवाल उनके नेताओं को कितना रास आएगा। शिव सत्ता में रहते भाजपा की कमजोरियां और उनके नेताओं और सरकार पर आरोप लगाकर कांग्रेस के लिए चुनाव जीतना आसान नहीं होगा उसे एक नए ब्लूप्रिंट और रोड मैप के साथ सामने आना होगा जिसमें मध्यप्रदेश का एक विजन नजर आए। बेहतर होगा पिछले तीन विधानसभा चुनाव की स्क्रिप्ट और फार्मूले पर दीपक बाबरिया गौर करने के बाद ही आगे बढ़ें… जिन्हें इस बात की तह तक जाना चाहिए कि चुनाव लगातार कांग्रेस क्यों हारी चाहे वह  टिकट वितरण  का मामला हो या फिर  आक्रमक रणनीति से ज्यादा एक दूसरे को निपटाने से ही क्यों न जुड़ता । यदि भाजपा को चुनाव में कड़ी टक्कर देना है तो उसे शिवराज की काट सामने लाना होगी और परंपरा से हटकर समय के साथ कांग्रेस को बदलने के लिए सख्त फैसले भी लेना होंगे।