सवाल दर सवाल

{भाजपा के लिए6 माह ..6 बड़ी चुनौती} राकेश अग्निहोत्री ‘सवाल दर सवाल’ नया इंडिया

cm shivraj
…..:मिशन 2018:…
{भाजपा के लिए6 माह ..6 बड़ी चुनौती}
मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव 2018 फिलहाल बहुत दूर हूं लेकिन कड़वा सच यह है कि भाजपा के लिए अगले 6 माह बहुत मायने रखते हैं… जिसके बाद चुनावी आचार संहिता संविधानिक तौर पर कभी भी लगाई जा सकती है ।मतलब साफ  मार्च खत्म हो रहा  और अप्रैल यानी भाजपा के स्थापना दिवस से सितंबर 2018 सरकार में रहते टीम शिवराज के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण साबित होने वाले हैं… तो मोदी और शाह के लिए भी यह मौका होगा कि वो मिशन 2019 लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए उससे पहले सेमीफाइनल माने जाने वाले विधानसभा चुनाव के लिए एक ऐसा माहौल बनाएं… जिसमें जीत सुनिश्चित होने के लिए विरोधियों को कमजोर अलग-थलग, नेतृत्वविहीन साबित कर शिवराज की लोकप्रियता और स्वीकार्यता में निखार लाया जा सके और राज्य सरकार के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी समस्या में इजाफा न कर सके । भाजपा अच्छी तरह जानती  कि यदि सरकार में रहने का उसे फायदा चुनाव में मिलता रहा और मिलेगा तो इसके साथ ही कुछ समस्याओं में भी बढ़ोतरी होना लाजमी है। अब जबकि राज्य से लेकर केंद्र में भाजपा की सरकार और सबसे लोकप्रिय नेताओं की टीम उसके पास मौजूद … तब फौरी तौर पर जो समस्याएं इन मोर्चों पर नजर आ रही  उन्हें नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता है। यदि पहली बड़ी तात्कालिक चुनौती प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान के उत्तराधिकारी को लेकर बरकरार सस्पेंस को खत्म कर कार्यकर्ताओं को हर हाल में समय रहते संदेश देना है जिनके नेतृत्व में चुनाव लड़ा जाएगा या फिर वह जाएंगे।  भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व खासतौर से राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को किसी न किसी फोरम पर जल्द  इस मुद्दे की गंभीरता को लेकर अपने पत्ते खोलना ही होंगे ।दूसरी बड़ी चुनौती प्रदेश प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे की मध्य प्रदेश से बढ़ती दूरी और निष्क्रियता के बीच प्रभारी की सक्रियता और उनके विकल्प को लेकर भी सस्पेंस खत्म करना होगी ।तीसरी बड़ी चुनौती पिछले चुनाव के अनुभव को ध्यान में रखते हुए अब जब केंद्र में मोदी और शाह का सशक्त नेतृत्व मौजूद है अभी तक हुए दूसरे राज्यों के चुनाव को ध्यान में रखते हुए चुनाव को लेकर कोआर्डिनेशन कमेटी का गठन जिसमें हर बड़े नेता को काम और  एक नए रोड मैप के साथ नजर आने वाली भाजपा की दरकार रहेगी। चौथी बड़ी चुनौती विधानसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू होने के साथ प्रदेश के मतदाताओं का समर्थन और वोट हासिल करने से पहले और उसके लिए कुछ ज्यादा ही जरूरी भाजपा के निष्ठावान देव दुर्लभ कार्यकर्ताओं को काम और उन्हें भरोसे में लेकर उन्हें निराशा के वातावरण से निकालकर बाहर लाना होगी ।यही नही भाजपा के सामने बड़ी चुनौती केंद्र और राज्य के बीच और बेहतर समन्वय सामने लाने और उन कयासों पर पूर्ण विराम लगाना होगा जो उपचुनाव या दूसरे मौकों पर संदेश की स्पष्टता , भरोसे के संकट से जुड़े हैं। छठी सबसे बड़ी चुनौती जिस शिवराज के चेहरे को आगे रखकर भाजपा लगातार चौथी बार सरकार बनाने का संकल्प दोहराती रही है उनकी सरकार में विवादित मंत्रियों की छुट्टी के साथ नए ऊर्जावान और जोशीले चेहरों को शामिल कर विधायक के दावेदार यानी नई पीढ़ी के नेता और कार्यकर्ताओं को भरोसे में लेना  ही होगा। जिससे यह संदेश जाए कि विवादित, भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे मंत्री हो या पदाधिकारी और निष्क्रिय पुरानी पीढ़ी के भाजपा नेता  मिशन 2018 में कोई ज्यादा उम्मीद ना पालें…यूँ तो समय के साथ हर चुनाव में चुनौतियां बदलती रही… लेकिन यह भी सच है कि भाजपा गलतियों से सीख लेकर अपनी  मजबूती साबित कर सरकार में लौटने की चुनौती पर खरा उतर कर दिखाती  रही। बावजूद इसके कभी कांग्रेस को कमजोर मानने वाली भाजपा के लिए यह चुनाव यदि शिवराज के साथ नरेंद्र मोदी और अमित शाह की साख से जुड़ चुका है तो उसकी वजह है केंद्र में एक मजबूत सरकार और भाजपा का सबसे बड़ा संगठन होना है । जिसकी गीत के घोड़े ने ज्यादातर राज्यों में कमल खिला दिया है तो जहां मोदी और शाह के दिल्ली संभालने से पहले भाजपा की सरकार है वहां सरकार बनाकर दिखाना बड़ी चुनौती है । मध्य प्रदेश में भाजपा के लिए उपचुनाव के ट्रैक रिकॉर्ड में अच्छा संकेत नहीं छुपा रहा तो देखना दिलचस्प होगा की आचार संहिता लगने से पहले के छह माह में भाजपा कब कैसे समन्वय  बनाकर मैदान में विपक्षी दल के मुकाबले खुद को सामने खड़ा दिखाती है।
{पहली चुनौती: प्रदेश अध्यक्ष पर सस्पेंस खत्म करना}
नंदकुमार सिंह चौहान भाजपा के निर्वाचित अध्यक्ष जिनकी  दूसरी पारी जारी.. अमित शाह जिन्हें 2018 तक हरी झंडी दे चुके.. बावजूद  लगातार उपचुनाव में भाजपा की हार जिसने संगठन को कमजोर साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यदि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को उपचुनाव की हार के बाद यदि भाजपा कार्यालय बैठकर सारे सूत्र अपने हाथ में लेना पड़े और पदाधिकारियों के साथ मंथन को विवश हुए …तो फिर प्रदेश भाजपा के मुखिया की आगामी चुनाव में भूमिका को लेकर अटकलों का दौर थमना जरूरी हो जाता है। शिवराज सिंह चौहान सिर्फ पदाधिकारियों से ही नहीं बल्कि मोर्चों के प्रमुख से रूबरू हो चुके हैं।  इस वन तू वन मुलाकात की बात  से संकेत यही गया कि सारे सूत्र यदि शिवराज को अपने हाथ में लेना पड़े तो उसकी वजह है संगठन का लगातार कमजोर साबित होना ।क्योंकि अमित शाह के चर्चित 3 दिन के चिंतन मंथन के बाद उनके द्वारा निर्धारित एजेंडे को भाजपा संगठन  न तो आगे बढ़ा पाया न ही मूर्त रूप दे पाया। उल्टा पंडित दीनदयाल विस्तारक योजना के फर्जीवाड़ा सामने आने के बाद दूसरे कार्यकर्ताओं को एक से 2 विधानसभा क्षेत्र में मंडल स्तर का फीडबैक लेने के लिए भेजना पड़ा.. तो सरकार में रहते हुए ऐसे ही संगठन के नतमस्तक हो जाने की खबरों के बीच यह जरूरी हो गया है कि नंदकुमार सिंह चौहान के नेतृत्व में चुनाव लड़ने और नहीं लड़ने को लेकर पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व किसी न किसी फोरम पर इन अटकलों पर जल्द से जल्द विराम लगाए। नंदू भैया को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का सबसे भरोसेमंद और एक ऐसा नेता माना जाता है जिसका अपना कोई एजेंडा नहीं बावजूद इसके उनकी पकड़ संगठन में ढीली होती जा रही है चाहे फिर वह संगठन महामंत्री सुहास भगत से बेहतर समन्वय नहीं बन पा रहा हो या फिर संघ की अपेक्षाओं को लेकर लगातार सवाल खड़े होना। जिस तरह विधायकों के टिकट काटकर शिवराज एंटी इनकंबेंसी से बाहर निकलना चाहते हैं उसी तरह नंदकुमार सिंह चौहान के लिए भी जरूरी हो गया है कि वह पदाधिकारियों सहयोगी संगठनों के परफॉर्मेंस को आधार बनाकर या तो नई टीम का गठन करें ..जिस की संभावना दूर-दूर तक नजर नहीं आती… या फिर शिवराज के मिशन 2018 और मोदी के 2019 को ध्यान में रखते हुए प्रदेश अध्यक्ष के चेहरे को बदल कर कार्यकर्ताओं को एक नया संदेश दिया जाए कि उनकी अब सुनी जाएगी। प्रदेश भाजपा को तय करना है कि शिवराज ने मुंगावली कोलारस विधानसभा चुनाव के दौरान जिस सोशल इंजीनियरिंग को प्राथमिकता दी यदि राज्यसभा चुनाव में उसे नजरअंदाज किया गया तो नंदकुमार सिंह चौहान का उत्तराधिकारी किस वर्ग विशेष का होना चाहिए। चर्चा यह जोर पकड़ रही है कि विधानसभा सत्र समाप्त होने के बाद भाजपा के लिए क्या क्षत्रिय नंदू भैया के स्थान पर दलित ,आदिवासी और ब्राह्मण में से  किसी एक नए चेहरे पर सर्वसम्मति बनाना जरूरी हो जाएगा ।
 (दूसरी  चुनौती: भाजपा के प्रदेश प्रभारी पर पत्ते जल्द खोल देना)
भाजपा के लिए दूसरी बड़ी चुनौती प्रदेश प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे की निष्क्रियता और प्रदेश संगठन के कामकाज से लगातार बढ़ती दूरी को खत्म करना है। यदि दो चौहान की जोड़ी के भरोसे ही भाजपा को चुनाव में जाना है तो प्रदेश प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे के विकल्प को जल्द ही सामने लाना होगा जो ज्यादा से ज्यादा समय मध्यप्रदेश में गुजारे और नए प्रदेश चुनाव प्रभारी के साथ आगे बढ़े। सहस्त्रबुद्धे की व्यस्तताएं चाहे वह राज्यसभा सांसद रहते हो या फिर दूसरी जिम्मेदारी.. सच यही है कि प्रदेश के प्रभारी बनने के बाद से ही वह टीम शिवराज के साथ बेहतर समन्वय नहीं बना पाए तो यह भी सच है सरकार तो दूर की बात संगठन में भी सहस्त्रबुद्धे का हस्तक्षेप कभी नजर नहीं आया। चुनाव आचार संहिता लगने से ठीक 6 माह पहले विनय सहस्त्रबुद्धे की नई भूमिका के साथ संविधानिक मापदंड उनके उत्तराधिकारी का चयन ज्यादा जरूरी हो जाता है। क्योंकि उनकी चुनाव में भूमिका की तुलना इससे पहले प्रदेश प्रभारी रहे अनंत कुमार से होने लगी है। यदि 2013, 2008 और 2003 विधानसभा के चुनाव पर नजर डालें तो भाजपा में प्रदेश प्रभारी की भूमिका एवं रही.
{तीसरी  चुनौती: चुनाव के लिए जरूरी कमेटी}
विपक्ष में रहते सरकार में आने और सरकार में रहते फिर सरकार में लौटने में मध्यप्रदेश में चुनाव के लिए गठित समितियां अहम किरदार निभाती रही.. जिसके जरिए भाजपा नेताओं के बीच समन्वय तो केंद्र के साथ तालमेल ही नहीं बल्कि जमीनी हकीकत को ध्यान में रखते हुए चुनौतियों को चिन्हित कर समस्या का समय रहते समाधान निकालना रहा है… समय के साथ समन्वय समिति हो या फिर चुनाव अभियान समिति का मतलब और महत्व बदलता गया ..अब जबकि सारा दारोमदार मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के कंधे पर है तब मोदी सरकार के अस्तित्व में आने के बाद दिल्ली में दखल रखने वाले मध्यप्रदेश के दूसरे नेता चाहे फिर वह अमित शाह की टीम का हिस्सा क्यों न हो चुनाव में उनका योगदान और भरोसा इस बार  बड़ी भूमिका निभा सकता है.. जिससे गुटबाजी की आशंका पर विराम और एकजुटता का संदेश चुनाव में जाना तय। कुल मिलाकर प्रदेश प्रभारी, प्रदेश अध्यक्ष संगठन महामंत्री के  साथ इस तिकड़ी के  साथ शिवराज ही नही नरेंद्र सिंह तोमर ,कैलाश विजयवर्गी , प्रहलाद पटेल, प्रभात झा, थावरचंद गहलोत जैसे दूसरे नेताओं की की जिम्मेदारी नए सिरे से सुनिश्चित करना होगी। तो भाजपा के लिए जरूरी है कि वह इन समितियों के महत्व और उसकी उपयोगिता का भी ध्यान रखें । पर्दे के पीछे बड़ी भूमिका निभाने वाले संघ के किरदार भी मायने रखते हैं प्रतिनिधि सभा की बैठक के बाद क्षेत्र प्रचारक अरुण जैन की नई भूमिका के बावजूद भोपाल में उनकी बैठकें जारी है जिसमें संदेश यह छुपा है कि चुनाव को ध्यान में रखते हुए नई भूमिका के बावजूद उनका हेड क्वार्टर मध्यप्रदेश में भोपाल या बदल कर इंदौर रखा जा सकता है। संघ की पृष्ठभूमि वाले भाजपा के संगठन महामंत्री से लेकर उनके सहयोगियों के अलावा मालवा मध्य भारत महाकौशल में संघ के पदाधिकारियों को ध्यान में रखते हुए भाजपा  को इन चुनाव समिति को अंतिम रूप देना होगा।
  (चौथी  चुनौती: कार्यकर्ताओं का कायाकल्प)  सरकार से लगातार बढ़ती अपेक्षाएं सिर्फ मतदाताओं की नहीं है बल्कि भाजपा के कार्यकर्ताओं की भी किसी से छुपी नहीं है.. इस चुनाव में तो मध्यप्रदेश में यदि शिवराज से तो दिल्ली में नरेंद्र मोदी से भी कार्यकर्ताओं की अपेक्षाएं बढ़ती जा रही है। मतदान केंद्र और मंडल स्तर पर भाजपा ने इन कार्यकर्ताओं का मन टटोलने और उनकी सत्ता और संगठन से अपेक्षाओं को जानने के लिए जो नया कार्यक्रम हाथ में लिया है… उसके लिए हर जिम्मेदार कार्यकर्ता को 1 से 2 विधानसभा क्षेत्र का जिम्मा सौंपा गया .. जिसका फीडबैक आना अभी बाकी है । तो राष्ट्रीय स्तर पर  बनाई गई योजना के तहत  राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री सौदान सिंह भी  3 दिन के मध्य प्रदेश दौरे के दौरान पहली बार प्रदेश भाजपा के पदाधिकारियों के साथ मंथन कर  जिला और मंडल की बैठक में शामिल होंगे  यानी क्रॉस वेरिफिकेशन  का यह कार्यक्रम कार्यकर्ताओं  की अपेक्षाओं और पार्टी की जमीनी हकीकत को जानने का प्रयास होगा। भाजपा के कार्यकर्ता के बारे में यही कहा जाता  कि वह अन्याय के खिलाफ ना तो नाराजगी का इजहार करता और ना ही बगावत न करता। इसके विपरीत  चुनाव में अपना गुस्सा भुलाकर पार्टी के लिए ही काम करता रहा है। लेकिन उत्तर प्रदेश और बिहार में उपचुनाव में मिली हार के बाद भाजपा की यह सोच बदली है क्योंकि कार्यकर्ता अब घर बैठने लगा है और उसकी रुचि मतदाताओं को मतदान केंद्र तक पहुंचाने में नहीं रही ।मध्यप्रदेश में भी भाजपा के लिए समर्पित कार्यकर्ताओं की शिकायत रही है कि अधिकारियों की अनदेखी के साथ  अब तो संगठन के पदाधिकारी और दूसरे बड़े नेता भी उन्हें तवज्जो नहीं देते। भाजपा के लिए बड़ी चुनौती इन पेज प्रभारियों बूथ मैनेजमेंट, मंडल  व्यवस्था दूसरी जिम्मेदारियों से जुड़े कार्यकर्ताओं में नए सिरे से जोश भर कर उन्हें काम पर लगाना है। व्यवस्था के तहत भाजपा संगठन में यह जिम्मेदारी अब कागजी नजर आने लगी है यही भाजपा की सबसे बड़ी चिंता है। क्योंकि अब सोशल मीडिया और दूसरे फोरम के साथ व्यक्तिगत बातचीत के दौरान सरकार में रहते भाजपा कार्यकर्ता उलाहने सुनाने लगा है ।चाहे फिर वह सरकार के खिलाफ हो या फिर क्षेत्र के विधायक और संगठन से उनकी जुड़ी मांगे ही क्यों ना हो तो भाजपा के सामने बड़ी चुनौती में से एक कार्यकर्ताओं का कायाकल्प कर उन्हें मानसिक तौर पर चुनाव के लिए तैयार कर, कांग्रेस के खिलाफ मैदान में खड़ा दिखाने की है। अन्यथा चुनाव में मतों का गिरता ग्राफ भाजपा के लिए एक नया सिरदर्द साबित हो उसके सभी लकरो विगाड़ सकता है।
(पांचवी चुनौती: कांग्रेस की संभावित एकता का तोड़)
लगातार 15 साल से सरकार में रहते भाजपा को विधानसभा से लेकर लोकसभा तो नगरीय निकाय के चुनाव में यदि अपनी ताकत और  मजबूत संगठन का फायदा मिला तो इसमें इजाफा कांग्रेस की कमजोरियों ने भी खूब किया ।कांग्रेस में चुनाव के लिए टिकट को लेकर खटपट हो या फिर दूसरे मुद्दे इसे भाजपा ने बखूबी भुनाया है.. लेकिन अब जब कांग्रेस निर्णायक लड़ाई लड़ने को लेकर सामूहिक नेतृत्व की लाइन पर आगे बढ़कर एकजुटता का दावा कर रही है। तब भाजपा के कान खड़े हो जाना चाहिए कांग्रेस में भले ही फिलहाल सब कुछ ठीक-ठाक नहीं हो लेकिन पिछले चुनाव के मुकाबले इस बार कम से कम उसके वरिष्ठ नेताओं का मकसद एक ही है कि अपनी कमजोरियों का फायदा भाजपा को नहीं उठाने देना है। कांग्रेस के पास अपना सुरक्षित वोट बैंक पहले से है और अब राहुल गांधी की कांग्रेस जिस गठबंधन की राजनीति पर आगे बढ़ रही है उसके बाद समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी जैसे क्षेत्रीय दलों का उसे समर्थन मिलना लगभग तय माना जा रहा है ।तो भाजपा को सरकार के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी से जुड़े वोटरों के लिए एक नई रणनीति बनाना भी चुनौती होगी। मध्यप्रदेश में टीम शिवराज के साथ मोदी और शाह को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि गुजरात जैसे राज्य में यदि कांग्रेस भाजपा की नींद उड़ा सकती है तो राजस्थान और छत्तीसगढ़ के साथ मध्यप्रदेश में भी कांग्रेस को उसे कम नहीं आंकना होगा। क्योंकि कार्यकर्ता की नाराजगी के बीच कर्मचारियों और दूसरे वर्ग की भी अपेक्षाएं सरकार से बढ़ती जा रही है।
 (छठवीं  चुनौती: मंत्रिमंडल में निखार और जोश की भरमार}
चुनाव में एक बार फिर मजबूत संगठन उसकी प्रभावी रणनीति की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता है।  सरकार और उसके मुखिया शिवराज की नेतृत्व क्षमता ही नहीं बल्कि उनकी लोकप्रियता के साथ बन रही धारणा और खास तौर से छवि कुछ ज्यादा ही मायने रखने वाली है। शिवराज ने भले ही अपनी कमजोरियों को ताकत साबित कर लोगों की सोच को भी बदला है लेकिन सरकार में शामिल मंत्रियों के खिलाफ बढ़ती नाराजगी चाहे वह उनके अपने विधानसभा क्षेत्र में हो या फिर विभाग से जुड़ी पूरे प्रदेश में उम्मीदों पर नए सवाल खड़े हो रहे हैं।ये सवाल मुख्यमंत्री के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है… मुंगावली कोलारस उपचुनाव में प्रबंधन के मोर्चे पर अपनी प्रभावी मौजूदगी के बावजूद अधिकांश मंत्री न तो सोशल इंजीनियरिंग को मजबूत कर पाए और ना ही सरकार के भरोसे को मतदाताओं के गले उतार पाए यानी विकास के मुद्दे पर चुनाव हो या फिर जातीय समीकरणों को दुरुस्त करना मंत्री अपने इस पर्फॉर्मेंस में भी सफल नहीं हो सके ।तो सवाल यहीं पर खड़ा होता है कि उपचुनाव के दौरान तीन मंत्रियों की मंत्रिमंडल में नए सिरे से एंट्री के वक्त एक और विस्तार का इशारा करने वाले शिवराज क्या चुनाव से पहले मंत्रिमंडल का विस्तार कर कोई ऐसा संदेश देने में दिलचस्पी लेंगे जिससे टिकट के दावेदारों को भी किसी क्राइटेरिया का आभास हो जाए ।जिससे सरकार की छवि में चार चांद लग सके क्योंकि इस चुनाव में सिर्फ शिवराज सरकार की उपलब्धियां और उनका विकास का एजेंडा ही नहीं बल्कि मोदी सरकार की उपलब्धियों भी दांव पर होंगी..