सवाल दर सवाल

भागवत की सोच… मोदी की बात… राकेश अग्निहोत्री ‘सवाल दर सवाल’ नया इंडिया

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सवाल दर सवाल, राकेश अग्निहोत्री, नया इंडिया
भागवत की सोच… मोदी की बात…
संघ को अनुभव तो भाजपा को युवा पर भरोसा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मैदानी क्षेत्र में नौजवान अफसरों खासतौर से कलेक्टरों की आवश्यकता जताई..मतलब न्यू इंडिया के लिए विकास जरूरी और इस काम को नई पीढ़ी के अधिकारी-जनप्रतिनिधियों के साथ मिलकर विकास को एक नई दिशा दे सकते हैं ..तो दूसरी ओर भाजपा के मार्गदर्शक और प्रेरणास्रोत संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत और उनकी टीम ने एक बार फिर सरकार्यवाह की जिम्मेदारी अगले 3 साल तक निभाने का जिम्मा भैयाजी जोशी को सौंप दिया है, जिनका यह चौथा कार्यकाल होगा..मतलब साफ है देश की सत्ता से जुड़ी बड़ी हस्तियों में प्रधानमंत्री की बात हो या फिर संघ सुप्रीमो की सोच अलग-अलग मंच से ही सही एक ही दिन सामने आई है, जो गौर करने लायक है.. तो सवाल खड़ा होना लाजमी है कि आखिर एक ही वैचारिक धरातल पर खड़े होकर राजनीति और राजनीति से दूरी बनाकर भारत को विश्व गुरु बनाने का संकल्प लेने वाली इन दो सर्वोच्च हस्तियों ने देश और खासतौर से हिंदुत्व और विचारधारा से इत्तेफाक रखने वालों को संकेत क्या दिया..
संघ की पृष्ठभूमि, विचारधारा के अधिष्ठान पर सब कुछ देश के लिए समर्पित करने वाले चाहे वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों या फिर सरसंघचालक मोहन भागवत दोनों की अपनी अपनी टीम और अपनी अहम भूमिका, तोर तरीके अलग-अलग लेकिन लक्ष्य एक ही है..सरसंघचालक रहते मोहन भागवत ने भाजपा को तत्कालीन D4 से बाहर निकालने के लिए एक युवा नरेंद्र मोदी को गुजरात से लाकर दिल्ली स्थापित कराया..मोदी ने अपने दम पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाते हुए भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनाई और देश के प्रधानमंत्री की कमान संभालने के साथ न्यू इंडिया का बड़ा लक्ष्य सामने रखा, जिसे अंजाम तक पहुंचाने के लिए देश के अधिकांश राज्यों में भाजपा की सरकार बनी और कमल खिला ..तो नेतृत्व इन प्रदेशों की युवाओं के हाथ में सौंपी गई..ज्यादातर युवा नेता उनके मंत्रिमंडल का हिस्सा बने..संदेश अटल, आडवाणी और जोशी की पीढ़ी को घर बैठ जाने का इसमें छुपा था..एक बार फिर बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनप्रतिनिधि और अफसर के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता जताते हुए युवा कलेक्टरों को मैदान में बड़ी जिम्मेदारी सौंपी जाने की न सिर्फ पैरवी की, बल्कि इसे विकास से जोड़कर पुरानी पीढ़ी के अफसरों को भी एक बड़ा संदेश दे दिया..इसमें कोई दो राय नहीं कि परिवर्तन के इस दौर में राजनीतिक दल हो या फिर प्रशासन को प्रधानमंत्री ने बड़ा संदेश दे दिया है..मकसद यदि युवाओं के जोश-जुनून का देश के हित में बेहतर उपयोग करना रहा है तो न्यू इंडिया के मिशन को आगे बढ़ाने के लिए शायद प्रधानमंत्री ने अफसरों की टीम को अपने साथ जोड़कर एक लंबी पारी खेलना चाहते हैं..नरेंद्र मोदी ने देश ही नहीं, विदेश में भी कुछ इस तरह का संदेश दिया है..इसे संयोग ही कहा जाएगा कि जिस आरएसएस ने नरेंद्र मोदी के तौर पर अपने एक प्रचारक को प्रधानमंत्री बनाने में बड़ी भूमिका निभाई उस संघ ने तत्कालीन सरसंघचालक सुदर्शन के रहते भाजपा में पीढ़ी परिवर्तन का राग अलापा था, लेकिन ये सब मोहन भागवत के सरसंघचालक रहते हुआ..संघ ने भी वक्त के साथ खुद को बदला..चाहे वो उसकी ड्रेस हो या फिर विचारधारा से कोई समझौता न करते हुए और दूसरे मोर्चों पर जरूरी बदलाव..कम्प्यूटर क्रांति से लेकर सोशल मीडिया के दौर में संघ अपनी सोच को जिस बड़े फोरम से सामने लाता रहा एक बार फिर नागपुर की प्रतिनिधि सभा के मंच से जो ऐलान किया गया वो चौकाने वाला तो नहीं है, लेकिन कुछ सवाल जरूर खड़े करता है..संघ ने अपने संगठन चुनाव की प्रक्रिया पूरी होने के साथ चौथी बार भैयाजी जोशी को सरकार्यवाह की जिम्मेदारी सौंपने का फैसला लिया है, जबकि चर्चा सहसरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले को लेकर भी खूब रही, जिनकी गिनती युवा स्वयंसेवकों और प्रचारक में होती है..निश्चित तौर पर इस चुनावी साल में संघ ने युवा सरकार्यवाह की जगह एक अनुभवी तो भागवत के नजदीकी और भरोसेमंद भैयाजी जोशी को अपनी भूमिका निभाते रहने का फैसला सर्वसम्मति से लिया..संघ में नंबर दो माने जाने वाले भैयाजी जोशी ने भी भाजपा की सरकार बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है..संघ और भाजपा के बीच समन्वय की जिम्मेदारी भले ही कृष्ण गोपाल के जिम्मे थी, लेकिन भागवत और मोदी-शाह के बीच इस अहम कड़ी को संघ और भाजपा दोनों नजरअंदाज नहीं कर सके..निश्चित तौर पर संघ युवाओं को आगे लाने का पक्षधर रहा है और मैदानी क्षेत्र में तैनात प्रचारक और स्वयंसेवक ज्यादातर युवा हैं..बावजूद इसके संघ सुप्रीमो मोहन भागवत के हस्तक्षेप से इनकार नहीं किया जा सकता है, जिनकी पहली पसंद को संभवतः प्रतिनिधि सभा ने स्वीकार किया..केंद्र में भाजपा की सरकार रहते संघ के अपने एजेंडे को लेकर समय-समय पर सवाल खड़े होते रहे हैं..बावजूद इसके मोदी-भैयाजी, मोदी-भागवत तो अमित शाह और भैयाजी जोशी की केमिस्ट्री मजबूत नजर आती रही है..फिर भी संघ की अपनी सोच और उसके फैसले पर गौर किया जाए तो भैयाजी जोशी की एक और पारी को लेकर सवाल खड़ा होना लाजमी है..आखिर वजह क्या है कि दत्तात्रेय होसबोले और दूसरे पदाधिकारी को ये मौका नहीं मिला..लगातार चार पारी मायने रखती है..क्या व्यक्तिगत तौर पर मोहन भागवत को सबसे भरोसेमंद और अनुभवी भैयाजी जोशी की दरकार थी तो फिर उसकी वजह क्या है या फिर संघ के दूसरे पदाधिकारी कसौटी पर खरे नहीं उतरे या फिर इस चुनावी साल में नरेंद्र मोदी को और ताकत देने के लिए टीम भागवत कोई जोखिम लेने को तैयार नहीं है..जो भी हो जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी युवा राजनेताओं के साथ अब युवा अफसरों को वक्त की जरूरत बता रही है आखिर तब संघ की प्रतिनिधि सभा में मोहन भागवत के साथ नंबर दो की कुर्सी पर भैयाजी जोशी को फिर बैठाया गया तो क्या ये वक्त की जरूरत है या फिर अपने उसूलों और सोच से कम्प्रोमाइज की मजबूरी..जो भी हो कुछ सवाल तो खड़े होते हैं.. बड़ा सवाल जिस संघ खासतौर से सरसंघचालक मोहन भागवत और उनकी टीम ने पिछले करीब 5 साल में. भाजपा को बदलकर पीढ़ी परिवर्तन के इस दौर में सभी राजनीतिक दलों को सोचने को मजबूर कर दिया लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जैसे नेताओं को राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पद के काबिल नहीं समझा ..आखिर उस संघ ने सर कार्यवाहक के तौर पर लगातार पहले ही 3 पारी खेल चुके भैया जी जोशी को एक और पारी खेलने के लिए क्यों अपनी मुहर लगाई शायद इसे चुनावी साल में खासतौर से मोदी और शाह को जरूर समझना होगा..