सवाल दर सवाल

खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे… राकेश अग्निहोत्री ‘सवाल दर सवाल नया’ इंडिया

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सवाल दर सवाल, राकेश अग्निहोत्री ,नया इंडिया

  1. खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे…
    कांग्रेस आखिर ट्रैक से क्यों उतर जाती है…
    मीडिया के महत्व को राजनीतिक दल खासतौर से समझते हैं..जो कभी अपनी गलतियों का ठीकरा मीडिया के सिर ये कहकर फोड़ देते हैं कि उनके बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया तो नेता चाहे फिर वो सरकार से जुड़े हों या फिर विपक्ष से.. उनकी अपेक्षाएं मीडिया से बढ़ जाती हैं..जिन्हें अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं होती है.. मीडिया की साख ,विश्वसनीयता हमेशा कसौटी पर रहती है एक बार फिर विधानसभा के अंदर प्रश्नकाल के दौरान  मीडिया केंद्र बिंदु बना..इस बार मुद्दा विपक्ष द्वारा प्रचार-प्रसार के मुद्दे पर सरकार की घेराबंदी कर खर्च का ब्यौरा मांगना था, जो उसका हक भी बनता है तो सरकार ने भी संतुष्ट करने की पूरी कोशिश की..आंकड़े भी सामने आए, लेकिन अचानक नोक-झोंक के बीच ‘चोर’ कहे जाने पर आरोप-प्रत्यारोप भी लगे, तो सफाई का दौर भी खूब चला ..जिससे सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच टकराहट की स्थिति निर्मित हुई..अध्यक्ष के हस्तक्षेप के बावजूद मामला गरमा गया..इस बीच सदन स्थगित भी किया गया, लेकिन बात दूर तलक जा पहुंची थी.. कारण परसेप्शन बनना और बनाया जाना था जो शायद मीडिया भी बर्दाश्त नहीं करेगा …दरअसल विपक्ष ने अपने अधिकार का उपयोग कर नर्मदा यात्रा के प्रचार-प्रसार में खर्च का ब्यौरा मांगा और विपक्ष के अशोभनीय-अनापेक्षित शब्दों के प्रयोग से निशाने पर मीडिया आ गया तो संसदीय मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने मीडिया को ‘चोर’ कहे जाने पर गहरी आपत्ति जताई..इस बीच एक विधायक द्वारा कहे गए आपत्तिजनक शब्दों को अध्यक्ष ने हस्तक्षेप कर विलोपित करा दिया..बावजूद इसके कांग्रेस विधायक सफाई देने को मजबूर हुए कि उनकी बात का गलत मतलब निकाला गया..सदन में आरोप, शिकवा, शिकायत, तर्क-कुतर्क के बीच कांग्रेस का इंटेंशन कुछ भी रहा हो, लेकिन सत्ता पक्ष की चतुराई और आक्रामक रवैया के चलते विपक्ष एक बार फिर ट्रैक से उतरता नजर आया.. इसे अति उत्साह कहें या फिर अति आत्मविश्वास और अनुभव की कमी जो युवा विधायकों की बात से धारणा यह बनी और बना दी गई कि मीडिया और भाजपा में सांठगांठ है .. ऐसे में सवाल यहीं पर खड़ा होता है कि क्या कांग्रेस पर ‘खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे’ वाली कहावत चरितार्थ होती नजर आती है .. जो भाजपा उसकी सरकार उसके संगठन से लड़ाई चाहे वह वैचारिक  हो  या फिर व्यक्तिगत खुन्नस नहीं जीत पा रही और गुस्सा मीडिया पर निकाल रही है ।या फिर वजह उपचुनाव में लगातार मिली जीत से बहक जाने के कारण उसने जाने अनजाने में ही सही न चाहते हुए भी सरकार के साथ मीडिया को भी लपेटे में लिए जाने के संकेत स्पष्ट तौर पर दे दिए..

सत्ता पक्ष से मीडिया के संबंध समझ में आते हैं, चाहे फिर वो फिलहाल भाजपा का राज हो या फिर इससे पहले कांग्रेस की सरकार, दोनों राजनीतिक दल इन संबंधों से अच्छी तरह वाकिफ है । ऐसा नहीं है भाजपा के राज में विपक्ष ने भी मीडिया से सामंजस्य और मधुर संबंध बनाने में दिलचस्पी बढ़-चढ़कर दिखाई है..कांग्रेस के कई जिम्मेदार नेताओं के व्यक्तिगत संबंध मीडिया से हमेशा मधुर रहे और इसका फायदा भी उन्हें खूब मिला.. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया हो या फिर प्रिंट मीडिया अखबार में कांग्रेस के नेताओं के बयान हों या विज्ञप्ति और कार्यक्रम का कवरेज उसकी मौजूदगी का एहसास कराता रहा है.. बावजूद कई मौके ऐसे आए, जब सरकार को घेरने के चक्कर में उसके निशाने पर सीधे तौर पर मीडिया आ गया..मीडिया को लेकर मध्यप्रदेश में कांग्रेस के जिम्मेदार नेता प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में बैठकर अपेक्षाएं पूरी नहीं होने पर असंतुष्ट नजर आ चुके हैं..इससे पहले भी सदन के अंदर सवाल खड़े कर कांग्रेस ने मीडिया की सुध ली तो दोनों के बीच रिश्ते बहस का मुद्दा भी खूब बने..ये पहला मौका नहीं है जब पूरे मीडिया की भूमिका पर विपक्ष द्वारा सवाल खड़े किए गए और वक्त की नजाकत को समझते हुए वो सफाई देने को भी मजबूर हुआ..अब कांग्रेस से खबर ये निकल कर आ रही है कि पार्टी की सदस्यता लेने वाले और टिकट के दावेदारों को कांग्रेस से जुड़े एक विशेष अखबार की प्रति स्थाई तौर पर लेने के लिए आर्थिक सहयोग के लिए तैयार रहना होगा.. वर्तमान प्रसंग में यदि सदन के अंदर अध्यक्ष द्वारा एक विधायक के आरोप को विलोपित किए जाने के बावजूद एक दूसरे विधायक द्वारा ये संदेश स्पष्ट तौर पर दिया गया कि जितनी राशि यात्रा के प्रचार-प्रसार में खर्च कर दी गई इतने में तो अपना एक न्यूज़ चैनल शुरू किया जा सकता था तो इन विधायकों की मंशा भले ही कुछ रही हो, लेकिन सवाल एक साथ जरूर कई खड़े हो जाते हैं..क्या ये मान के चला जाए कि कांग्रेस यदि सत्ता में आई तो वो प्रचार-प्रसार में फिजूलखर्ची करने की बजाय सरकार के न्यूज़ चैनल शुरू करने में ज्यादा दिलचस्पी लेगी..कांग्रेस से जुड़े एक अखबार को लेकर नए सिरे से लॉन्चिंग की योजना जोर पकड़ चुकी है तो दूसरे युवा विधायक की आपत्तिजनक टिप्पणी भी कम गौर करने लायक नहीं है, जिसे भले ही अध्यक्ष ने विलोपित कर दिया, लेकिन मीडिया को ‘चोर’ कहे जाने के आरोप को लेकर संसदीय मंत्री नरोत्तम मिश्रा ज्यादा संजीदा नजर आए..कांग्रेस ने सरकार की फिजूलखर्ची खासतौर से प्रचार-प्रसार की बड़ी राशि को लेकर जिस भाजपा सरकार को घेरने का ताना-बाना बुना था क्या ये दांव उसे उल्टा पड़ा? या फिर कांग्रेस इसी रास्ते पर आगे बढ़ने का मानस बना चुकी है..कांग्रेस के दोनों युवा तेज तर्रार विधायक अभी तक मीडिया फ्रेंडली ही माने जाते रहे..शायद इस बार भी उनकी मंशा मीडिया को विवादों में लाने की नहीं, बल्कि सरकार की फिजूलखर्ची पर घेराबंदी की रही हो, लेकिन संसदीय मंत्री नरोत्तम मिश्रा का जीतू और जयवर्धन पलटवार जरूर भारी पड़ता नजर आया..सवाल इसलिए भी खड़ा होता है क्योंकि विपक्ष की भूमिका में रहते कांग्रेस ने कई चुनाव हारने के बाद अपना परफॉर्मेंस उपचुनाव में सुधार कर भी दिखाया है, जिसके लिए कांग्रेस के नेताओं ने मीडिया को भी धन्यवाद दिया है..बावजूद इसके एक साथ समूचे मीडिया को ‘चोर’ बताना कहां तक उचित है? क्या बीजेपी और उसकी सरकार, मजबूत संगठन कैडर और प्रबंधन से लड़ने में खुद को कमजोर समझ बैठी कांग्रेस.. मीडिया पर अपनी भड़ास निकालकर अपनी कमजोरियां छुपाना चाहती है? या उपचुनाव में मिल रही लगातार जीत से वो बहक गई है, िजसने उसे मीडिया को निशाने पर लेने को मजबूर कर दिया है? या फिर सरकार की घेराबंदी की जल्दबाजी में न चाहते हुए भी कांग्रेस के निशाने पर मीडिया आ ही गया..
(कांग्रेस के डबल J पर भारी BJP के संकटमोचक NM)
संसदीय मंत्री नरोत्तम मिश्रा एक बार फिर सदन के अंदर शिवराज सरकार के संकटमोचक तो कांग्रेस विधायक खासतौर से डबल J यानी जीतू पटवारी और जयवर्धन सिंह पर NM भारी साबित हुए..कांग्रेस के दूसरे विधायकों की तुलना में युवा तेज तर्रार जीतू पटवारी हमेशा मीडिया की सुर्खियों में बने रहते हैं..भाजपा के राज में भी मीडिया ने जीतू को क्रिएटिविटी और बेहतर परफॉर्मेंस के कारण हमेशा महत्व दिया और वो मीडिया की जरूरत भी बनकर सामने आए तो युवा विधायक जयवर्धन सिंह की गिनती मीडिया फ्रेंडली विधायकों में होती है, जो पूरी तैयारी के साथ सदन में अपनी प्रभावी मौजूदगी दर्ज कराते रहे हैं..इन दोनों विधायकों ने एक बार फिर सदन में नर्मदा यात्रा और प्रचार-प्रसार को लेकर सरकार की घेराबंदी की, जिसका जवाब भी सामने आया और हिसाब-किताब की बात तब विवादों का केंद्र बिंदु बनी, जब मीडिया को लेकर अनर्गल और अशोभनीय टिप्पणी विधायक द्वारा की गई..इस मौके पर संसदीय मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने भी पलटवार कर न सिर्फ अपनी सरकार की साख पर खड़े हो रहे सवालों का जवाब दिया, बल्कि मीडिया को ‘चोर’ कहे जाने पर समूची कांग्रेस की हवा निकालकर रख दी..स्थिति यहां तक निर्मित हुई कि विधायक जीतू पटवारी सफाई देते हुए घूमते रहे, लेकिन जो परसेप्शन बनना था वो बना और उससे संदेश यही गया कि कांग्रेस सरकार को आरोपों के कटघरे में खड़े करने के अपने मकसद में सफल नहीं हो पाई तो उसने समूचे मीडिया को निशाने पर ले लिया..संसदीय मंत्री की हाजिरजवाबी और आक्रामक अंदाज भाजपा खासतौर से शिवराज सिंह चौहान के लिए बड़ी राहत बनकर सामने आया तो मंत्री ने बड़ी चतुराई से इस पूरे मामले को विपक्ष बनाम मीडिया केंद्रित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, जिसमें वो काफी हद तक सफल भी रहे..बाद में मीडिया से मुखातिब हुए डॉ. नरोत्तम मिश्र ने विधानसभा में प्रश्नोत्तर काल के दौरान कांग्रेस विधायक जीतू पटवारी द्वारा सीधे विधानसभा अध्यक्ष से सवाल-जवाब करने और मीडिया पर आक्षेप की निंदा की..विधानसभा परिसर में प्रेस से चर्चा करते हुए डॉ. मिश्र ने कहा कि पटवारी ने मान्य परम्पराओं का उल्लंघन किया है..मंत्री के बजाय आसंदी से प्रश्न किया गया..नियम प्रक्रिया को तोड़ने की कोशिश की..इस बात की उन्हें व्यक्तिगत रूप से पीड़ा है..उन्होंने कहा कि पटवारी ने आसंदी से मुखातिब होने के साथ किए गए प्रश्न को ट्विस्ट करने और तभी मेरी जैकेट या मेरी मूछों की बात करने का औचित्य समझ से परे है.. सदन में हर सवाल का जवाब देने को मंत्री तैयार हैं, लेकिन वो व्यक्तिगत खुन्नस निकालते रहे..उन्होंने विधानसभा के फ्लोर का गलत उपयोग किया..नरोत्तम ने जोर देकर कहा कि पटवारी का ये कहना कि ‘चोरों को विज्ञापन दिए गए’ आपत्तिजनक है..कांग्रेस की मानसिकता आज उजागर हो गई है..किसी के लिए ‘चोरों की मंडली’ जैसे शब्दों का उपयोग करना उचित नहीं है..डॉ. मिश्र ने मीडिया के माध्यम से प्रार्थना की कि ऐसी गलत मानसिकता या गलत परम्परा को सहन न किया जाए..डॉ. मिश्र ने लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के नाते मीडिया से अपेक्षा की कि वोे यदि ये सहन करते हैं तो वो लोग परम्परा डाल लेंगे और मीडिया पर दबाव डालेंगे…मीडिया से जुड़े इस मामले में जब कांग्रेस के दूसरे नेता बगले झांकने को मजबूर है तब भाजपा के प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल ने कहा है कि सरकारें अपनी नीति, योजनाओं और कार्यक्रमों की सार्थकता और सफलता हेतु जनकल्याण के व्यापक उद्देश्य से विज्ञापन देती हैं। शासकीय नीति के तहत मीडिया विज्ञापन लेता है, लूटता नहीं है। मीडिया को अभद्र और अपमानजनक शब्द इस्तेमाल करना कांग्रेस की कुंठा है। राजनीतिक हताशा में लोकतांत्रिक मर्यादा को न भूलें कांग्रेस नेता।