सवाल दर सवाल

संघ के सामने ‘बड़ा सवाल’ समन्वय क्यों नहीं.( राकेश अग्निहोत्री “सवाल दर सवाल” नया इंडिया

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संघ के सामने ‘बड़ा सवाल’ समन्वय क्यों नहीं

{मध्यप्रदेश में बिगड़ते हालात के लिए जिम्मेदार कौन}

संघ की विदिशा में 11 से 13 जनवरी की प्रस्तावित मध्य प्रदेश की समन्वय बैठक के साथ ही कुछ नए सवाल खड़े होने लगे हैं..क्या मिशन 2018 को ध्यान में रखते हुए संघ अपने फीडबैक की पुष्टि वैचारिक संगठनों से करना चाहता है.. जो यह मानकर चल रहा है कि अगला विधानसभा चुनाव  भाजपा के लिए आसान नही कुछ ज्यादा ही चुनौती भरा होगा.. या फिर बड़े बदलाव की अटकलों के बीच  किसी  और एजेंडे को लेकर वह विदिशा से भजपा की दिशा दुरुस्त करने का संदेश देकर आगे बढ़ता हुआ नजर आएगा…  सवाल संघ के पास अभी तक जो फीडबैक पहुंचा  क्या मध्यप्रदेश में बन रहे हालात को लेकर वह चिंता से परे सब कुछ ठीक-ठाक मान रहा.. या फिर किसी सर्वे रिपोर्ट ने उसके कान खड़े कर दिए हैं.. चुनावी साल में संघ की  इस समन्वय बैठक का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि सरसंघचालक मोहन भागवत इस महत्वपूर्ण बैठक का हिस्सा बनने जा रहे हैं..ऐसे में सवाल खड़ा होना लाजमी है कि आखिर वह कमजोर कड़ी कौन है.. जिसने संघ की पेशानी पर बल ला दिए हैं.. वह भी तब जब दिल्ली से लेकर प्रदेश में और राज्य की राजधानी से लेकर नगर निगम, नगर पालिका में भाजपा का वर्चस्व कांग्रेस को अभी तक सत्ता से दूर रखे हुए.. सवाल समन्वय को लेकर यदि खड़ा हुआ है तो आखिर इसकी वजह क्या है? क्या सत्ता और संगठन में समन्वय कमजोर हुआ या फिर केंद्र से लेकर राज्य सरकार के बीच में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है या फिर संघ की नजर में समिधा के अनुरूप हालात 2003, 2008 और 2013 जैसे नहीं रह गए हैं। फिर बड़ा सवाल मध्यप्रदेश में हालात क्या भाजपा के हाथ से निकलते जा रहे हैं,तो आखिर क्यों वह भी तब जब अभी तक कांग्रेस मुकाबले में बहुत पीछे खड़ी नजर आती है.

 

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संघ के शीर्ष पदाधिकारी उज्जैन की महत्वपूर्ण और मैराथन बैठक में देश के साथ भाजपा की अंदरूनी राजनीति को लेकर गहन चिंतन-मंथन का दौर पूरा कर चुके हैं..इस बैठक में गुजरात चुनाव को ध्यान में रखते हुए दूसरे राज्यों के साथ मध्यप्रदेश को लेकर भी चर्चा पहले दौर की हो चुकी है यानी सरसंघचालक मध्यप्रदेश में बन रहे हालात से लेकर अच्छी तरह वाकिफ हैं। जो अगले दौर में मध्यप्रदेश की समन्वय बैठक में मालवा, मध्य भारत और महाकौशल प्रांत में काम कर रहे सभी समवैचारिक संगठनों के नुमाइंदों से रूबरू होंगे.. उज्जैन बैठक से पहले अलग-अलग प्रांत की बैठक से भी संघ मिशन 2018 को ध्यान में रखते हुए फीडबैक हासिल कर चुका है..अधिकांश बैठकों में सरकार्यवाह भैयाजी जोशी खुद मौजूद रहे.. उज्जैन में चिंतन-मंथन गुजरात विधानसभा चुनाव के परिणाम सामने आने के बाद हुआ और इस बैठक में राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से लेकर राष्ट्रीय संगठन महामंत्री रामलाल की मौजूदगी से स्पष्ट संकेत जा चुका है कि भाजपा के सामने अंदरूनी और बाहरी चुनौती को लेकर संघ पहले ही सतर्क हो चुका है.. देश में गुजरात के बाद मध्यप्रदेश दूसरा राज्य होगा जिसे वह अपनी प्रयोगशाला मानता रहा है जहां संघ का अपना नेटवर्क मजबूत तो उसकी गतिविधियां भी बढ़ी है.. बावजूद इसके मध्यप्रदेश में समन्वय का आंकलन और उसकी तुलना 2003 विधानसभा चुनाव से लेकर 2008 और 2013 के विधानसभा चुनाव के दौरान बने माहौल से किया जाएगा तो शायद इस बार चुनौतियां ज्यादा हैं.. विपक्ष की भूमिका निभा रही कांग्रेस के बनते-बिगड़ते हालात एक महत्वपूर्ण फैक्टर हो सकता है, लेकिन संघ की पहली चिंता एंटी इनकंबेंसी से जूझ रही भाजपा के अंदर समन्वय को लेकर बढ़ती नजर आती है.. पन्ने पलटे जाएं तो 2003 में संघ कार्यालय समिधा में मौजूद क्षेत्र प्रचारक नरमोहन जी  से लेकर दिग्विजय सिंह सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने के लिए उस वक्त प्रदेश के चुनाव प्रभारी अरुण जेटली, प्रदेश अध्यक्ष कैलाश जोशी, संगठन महामंत्री के तौर पर तेज तर्रार कप्तान सिंह तो स्टार प्रचारक फायर ब्रांड उमा भारती के साथ पर्दे के पीछे के रणनीतिकार जो जावली में बैठे थे उस वक्त अनिल दवे की अगुवाई में बड़ी भूमिका निभा रहे थे.. बेहतर समन्वय और आक्रामक प्रचार का नतीजा जो भाजपा का सियासी वनवास खत्म हुआ। उस वक्त केंद्र में अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा की सरकार थी.. वह बात अलग है कि 2008 विधानसभा चुनाव आने तक भाजपा की अंदरूनी सियासत बदली उमा भारती, बाबूलाल गौर के क्रमशः इस्तीफे के बाद शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री बने। उस वक्त अस्थिरता के दौर से गुजर रही भाजपा और खासतौर से सरकार को बाहर निकालकर भाजपा की सत्ता में वापसी का श्रेय शिवराज को जाता है। जिन्हें प्रदेश में नरेंद्र तोमर जैसा प्रदेश अध्यक्ष मिला, जिन्होंने पुरानी और नई पीढ़ी के बीच बेहतर तालमेल और समन्वय बनाया.. उस वक्त लालकृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज, अनंत कुमार जैसे नेताओं ने दिल्ली में बैठकर ताकत तो संघ ने भी समिधा से शिवराज की स्वीकार्यता पर अपनी मुहर लगाई। यह वह चुनाव था जब उमा भारती भाजपा से बाहर थीं और भारतीय जनशक्ति के बैनर तले उन्होंने अपने उम्मीदवार भी खड़े किए थे.. 2008 के चुनाव में प्रदेश प्रभारी रहते अनंत कुमार तो समिधा से पर्दे के पीछे सुरेश सोनी संघ के क्षेत्र प्रचारक विनोद कुमार तो संगठन महामंत्री के तौर पर माखन सिंह, सह संगठन महामंत्री की भूमिका में अरविंद मेनन, भगवतशरण माथुर की तिकड़ी एक जुटता से शिवराज के पीछे खड़ी नजर आई.. वह बात और है कि बाद में भगवत शरण  और माखन सिंह दोनों को जाना पड़ा और अरविंद मेनन शिवराज की बड़ी पसंद बनकर सामने आए.. 2013 का चुनाव आते-आते संविधान में मौजूद एक बार फिर विनोद कुमार के साथ अरविंद मेनन उस वक्त शिवराज के सबसे भरोसेमंद संगठन महामंत्री के तौर पर एक बड़ी ताकत बन कर सामने आ चुके थे..इस बीच भले ही प्रदेश भाजपा अध्यक्ष की कुर्सी प्रभात झा के पास पहुंची, लेकिन चुनाव नजदीक आते-आते एक बार फिर शिवराज की पसंद बनकर नरेंद्र तोमर सामने आए.. कुल मिलाकर शिवराज, नरेंद्र और अरविंद मेनन की तिकड़ी ने 2008 की तरह आनंद कुमार के प्रदेश प्रभारी रहते  एक बार फिर सरकार में रहते भाजपा की सत्ता में वापसी सुनिश्चित कराई.. उस वक्त दिल्ली में यूपीए सरकार थी और शिवराज का निर्विवाद और लोकप्रिय चेहरा भाजपा की ताकत बना, लेकिन यह भी सच है कि चुनाव से ठीक पहले गुजरात के मुख्यमंत्री रहते नरेंद्र मोदी को 2014 लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए चुनाव अभियान समिति की कमान सौंप दी गई थी। तो नमो-शिवाय के बीच उस वक्त इतनी मजबूत केमिस्ट्री नजर नहीं आई, लेकिन मोदी की एंट्री का फायदा मध्यप्रदेश में भी भाजपा को खूब मिला.. 2008 से लेकर 2013 तक विधानसभा चुनाव के टिकट चयन में शिवराज सिंह चौहान की एकतरफा चली और दूसरा कोई गुट दूर-दूर तक नजर नहीं आया..उमा भारती की भाजपा में वापसी के बावजूद वह उत्तर प्रदेश की राजनीति से दिल्ली में अपना दखल बढ़ाती चली गई, मध्यप्रदेश चुनावी सभाओं के बावजूद प्रदेश की राजनीति से साध्वी की दूरी बनी रही.. इस बीच 2004, 2009 और 2014 लोकसभा चुनाव में भी भाजपा का प्रदर्शन प्रदेश की सत्ता में रहते बेहतर रहा और केंद्र की सत्ता में वापसी के साथ नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने में मध्यप्रदेश में अहम किरदार निभाया.. 2003 से आगे यदि 2008 और 2013 विधानसभा चुनाव की बात की जाए तो शिवराज के साथ नरेंद्र तोमर, अनंत कुमार, स्व. अनिल दवे जैसे नेता ही लगातार उनके साथ ताकत बनकर खड़े रहे अरविंद मेनन बदलती भूमिका के साथ चुनाव का हिस्सा बने.. अब मध्यप्रदेश में शिवराज पार्टी का चेहरा बनकर यदि सामने है जो संगठन में प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान उनकी पसंद के तौर पर जरुर बने हुए हैं, लेकिन उनके इस्तीफे की खबरें थमने का नाम नहीं ले रही। प्रदेश प्रभारी की भूमिका में विनय सहस्रबुद्धे से भी टीम शिवराज के समन्वय पर सवाल लंबे समय से खड़े हो रहे हैं..यही नहीं प्रदेश अध्यक्ष नंद कुमार सिंह चौहान और संगठन महामंत्री सुहास भगत के बीच भी खटपट को लेकर दोनों को सफाई देने को मजबूर होना पड़ा है..दिल्ली में मोदी सरकार बनने के बाद मध्यप्रदेश में राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का सीधा हस्तक्षेप नजर आने लगा है.. जो राजनाथ सिंह से लेकर नितिन गडकरी और वेंकैया नायडू के समय भी इतना नहीं देखा गया।
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सत्ता में लौटना तो गुजरात से सीख ले मध्यप्रदेश...
संघ और भाजपा के बीच राष्ट्रीय स्तर पर बेहतर समन्वय का नतीजा  समने जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के नेतृत्व को लेकर कोई सवाल खड़ा नहीं होता, इस जोड़ी ने केंद्र की सरकार में रहते भाजपा संगठन की भी  दिशा बदल दी है । मध्य प्रदेश में जहां मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सरकार है और बेहतर समन्वय की आवश्यकता महसूस की जा रही है.. शिवराज की लोकप्रियता और निर्विवाद नेतृत्व के बावजूद यदि समन्वय की कमी महसूस की जा रही तो वह भाजपा संगठन के अंदर से… संघ के क्षेत्र प्रचारक से लेकर भाजपा संगठन महामंत्री बंद कमरे की बैठकों में समन्वय की आवश्यकता जताते रहे… तो सवाल यहीं पर खड़ा होता है कि क्या विधानसभा चुनाव 2018 को ध्यान में रखते हुए मध्यप्रदेश में समन्वय और सामंजस्य को लेकर हालात कैसे हैं? नरेंद्र मोदी और अमित शाह को भरोसे में लेकर शिवराज अपनी सरकार को आगे लगातार बढ़ा रहे हैं.. लेकिन हालात 2008 और 2014 की तरह बेहतर हो …ऐसा स्पष्ट संकेत का अभाव है… चाहे यह स्थिति प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान के कथित इस्तीफे और उनके उत्तराधिकारी की तलाश को लेकर बना हो या फिर इससे पहले सिंहस्थ के प्रथम शाही स्नान से ठीक 1 दिन पहले संगठन महामंत्री अरविंद मेनन की भूमिका बदल कर सुहास भगत की इंट्री से जुड़ा हो.. उस वक्त अरविंद मेनन और प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान के बीच दूरियां बढ़ने के संकेत भाजपा नेताओं ही नहीं, कार्यकर्ताओं तक जा चुके थे तो सुहास भगत के आने के बाद भी नंदकुमार सिंह चौहान को लेकर बनते-बिगड़ते रिश्तो के बीच भाजपा को सफाई देने को मजबूर होना पड़ा है..वह बात और है कि  राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह नंदकुमार सिंह चौहान के नेतृत्व को 2019 तक की समय सीमा निर्धारित कर गए.. बावजूद इसके कभी कैलाश विजयवर्गीय तो कभी नरोत्तम मिश्रा और लाल सिंह आर्य से लेकर राजेंद्र शुक्ल के नाम नए प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर सामने आते रहे..हालात ऐसे कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भी सफाई देना पड़ी.. वह भी तब जब संघ की महत्वपूर्ण बैठक उज्जैन में चल रही है और प्रधानमंत्री मध्यप्रदेश के दौरे पर थे..नंदू भैया के इस्तीफे की खबरें भाजपा के अंदर से ही प्रायोजित तौर पर उड़ाई गई थीं जो कहीं ना कहीं राष्ट्रीय स्तर पर खबर भी बनी.. समन्वय पर सवाल सिर्फ सत्ता और संगठन के इर्द-गिर्द ही खड़े नहीं होते, बल्कि समिधा से नजर रखने वाले संघ के नुमाइंदों की विशेष फोरम पर दी गई हिदायतों और मशविरा से जोड़कर देखा जाए… तो प्रदेश में संघ से लेकर भाजपा और भाजपा के अंदर सरकार तक सब कुछ ठीक-ठाक नजर नहीं आता है..प्रदेश संगठन के जिम्मेदार पदाधिकारी हों या फिर मोर्चा और प्रकोष्ठ से जुड़े प्रतिनिधि और उनके संगठन का नेटवर्क जिला और मंडल स्तर तक सवालों के घेरे में हैं.. जब भी सरकार संकट में आई चाहे वह मंदसौर गोलीकांड के बाद किसान आंदोलन हो या फिर भावांतर योजना के प्रचार प्रसार में संगठन का नेटवर्क कमजोर साबित हुआ। अमित शाह मिशन 2018 विधानसभा चुनाव के लिए जिस बाइक रैली के 31 जनवरी को बुलाए जाने का ऐलान कर गए थे, उसकी तैयारियों को लेकर भी पार्टी के अंदर भ्रम की स्थिति बनी हुई है.. समन्वय संगठन मंत्री जिले के प्रभारी मंत्री,विधायक और जिला अध्यक्ष के बीच भी उतना बेहतर नजर नहीं आता है जितना चुनावी साल में सामने होना चाहिए.. सर्वे रिपोर्ट का हवाला देकर या फिर वन-टू-वन मुलाकात में  विधायकों के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी को लेकर शिवराज चिंता जता चुके है। यह सवाल इसलिए क्योंकि शिवराज सिंह चौहान को संगठन के फोरम पर जाकर कर्तव्यबोध कराना पड़ता है..जिस तरह राष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अमित शाह राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर ताकत दे रहे हैं और पूरे देश का दौरा कर रहे उस तरह शिवराज को ताकत प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान से नहीं मिल रही और ना ही नंदू भैया पूरे प्रदेश में माहौल ही बना पाए हैं.. समन्वय के बिगड़ने का नतीजा ही सामने है कि क्या अटेर लेकर चित्रकूट विधानसभा के उपचुनाव में भाजपा की सारी कोशिशों के बावजूद वह कांग्रेस को पराजित नहीं कर पाई तो मुंगावली और कोलारस विधानसभा उपचुनाव में भी पूरी सरकार मैदान में जिससे  संगठन कमजोर नजर आ रहा है.. प्रदेश से लेकर जिला स्तर तक समन्वय बैठकों का कोई अता-पता नहीं है.. अमित शाह जिस समन्वय बैठक की मौजूदगी 3 दिन के दौरान हर समीक्षा बैठक में सुनिश्चित कर गए थे उसकी हर माह होने वाली बैठक पर कोई पदाधिकारी बोलने को तैयार नहीं है.. प्रदेश पदाधिकारियों के बीच समन्वय हो या फिर मीडिया से जुड़े प्रवक्ता और पैनेलिस्ट से लेकर दूसरे जिम्मेदार पदाधिकारी ही नहीं चुनाव के लिए बनाए गए वार रूम और सोशल मीडिया के मोर्चे पर सक्रिय आईटी सेल ना तो शिवराज सरकार की उपलब्धियों का अपेक्षित प्रचार-प्रसार ही नहीं विपक्ष की भूमिका निभा रही एकजुट हो रही कांग्रेस का माकूल जवाब देने को लेकर संजीदा है..मध्यप्रदेश में आरक्षण खासतौर से सपाक्स की बढ़ती सक्रियता और किसान आंदोलन हो या फिर उपचुनाव में सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर जातीय संतुलन बनाने के लिए समुदाय विशेष के बीच भाजपा संगठन की कमजोरी सामने आने लगी है…संघ के अंदर  समवेचरिक संगठनों के बीच  भले ही बेहतर समन्वय का दावा किया जाए लेकिन इन संगठनों की सरकार से अपनी अपेक्षाओं को लेकर  मतभेद से इनकार नहीं किया जा सकता है।  यह वह संगठन है जो चुनाव में  भाजपा को ताकत देते हैं … इस चुनावी साल में  भाजपा की चिंता संघ का भरोसा  हासिल कर मोदी और शाह की अपेक्षाओं पर  खरा उतर कर दिखाने की  भी होगी। कुल मिलाकर गुजरात चुनाव में कड़े संघर्ष के बाद बनी सरकार के हालात को ध्यान में रखते हुए मध्यप्रदेश में टीम शिवराज को नए सिरे से और बेहतर समन्वय स्थापित करना होगा। मोदी और शाह की कार्यशैली और चुनाव प्रचार की रणनीति को ध्यान में रखते हुए इस बार समन्वय बनाने की बड़ी चुनौती केंद्र और राज्य के बीच में होगी.. जिसके लिए भाजपा को इस चौथे चुनाव में जीत सुनिश्चित करने के लिए कार्यकर्ता और जनता से लेकर कार्यकर्ता और नेता ही नहीं पदाधिकारी और मंत्री के बीच भी बेहतर समन्वय बनाने के साथ संगठन के हर फोरम को जवाबदेय होगा।