सवाल दर सवाल

छोटा बच्चा जान के हमको ना समझाना रे… राकेश अग्निहोत्री” सवाल दर सवाल “नया इंडिया

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सवाल दर सवाल  राकेश अग्निहोत्री

छोटा बच्चा जान के हमको ना समझाना रे… 

छोटा बच्चा जानकर हमको ना समझाना रे.. ये पंक्तियां निश्चित तौर पर एक फिल्मी गीत की   हैं, लेकिन फिलहाल कार्तिकेय सिंह चौहान के ऊपर फिट नजर आती है..जो शायद यह कहना चाहते हैं कि बच्चा जरूर छोटा हूं, लेकिन नौसिखिया नहीं ना ही इतनी उम्र है कि टिकट की चाहत और चुनाव की झंझट उसे अपने मिशन बैरिस्टर से फिलहाल कोई भ्रमित कर पाए, लेकिन सियासत से दूर रहकर भी जरूर इतना तो सीख लिया है, जो अपना और अपने परिवार का अच्छा बुरा अच्छी तरह समझ चुका है..जिसने यदि मुख्यमंत्री के तौर पर पिता को जनता के सुख दुख में उनके बीच खड़ा देखा तो मामा के तौर पर भांजियों के प्रति सद्भाव और चिंता को समझा..यही नहीं अपनों की अपेक्षाएं और उस पर खरा उतरकर दिखाना तो विरोधियों के हमले जिसे विचलित नहीं कर पाए उसको भी देखा और सुना है..वरिष्ठजनों का आशीर्वाद और मार्गदर्शन जिसके लिए जरूरी, लेकिन  युवाओं  को संगठित कर उनमें जोश भरने की क्षमता, क्योंकि मुद्दों पर बात करने के लिए उनके पास तर्क और तथ्य दोनों हैं..तो जनता के बीच जाने में उन्हें कोई हिचक नहीं..कार्तिकेय ने  कोलारस की अल्पकालीन यात्रा के दौरान यह साफ कर दिया कि छोटा जरूर लेकिन घर का बड़ा बेटा हूं.. आज नहीं तो कल अपने पैर पर खड़ा होकर आत्मनिर्भर बनना ही होगा..धंधा पानी से आगे जरूरत पड़ने पर पिता की राजनीतिक विरासत संभालने के लिए भी मानस बनाना ही होगा..यदि वकालत की पढ़ाई पूरा करना पहली प्राथमिकता है तो इसके बाद सारे विकल्प खुल जाते हैं..यह पहला मौका नहीं है जब जनता के बीच में कार्तिकेय ने अपनी मौजूदगी का एहसास कराया..जिस ज्योतिरादित्य सिंधिया के गढ़ को उनके पिता शिवराज समेत पूरी भाजपा पिछले 14 साल में चाहकर भी सेंध नहीं लगा पाई वहां का सियासी मिजाज भांपने के लिए कार्तिकेय ने अपने कदम कोलारस के लिए आखिर बढ़ा ही दिए..मंच चुनावी भले ही नहीं, लेकिन माहौल पूरी तरह से सियासी..चुनाव में भाजपा उम्मीदवार को जिताने का आव्हान भी उन्होंने कर ही दिया..मंच के बैकड्रॉप में कार्तिकेय के अलावा उनके पिता मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का चेहरा आकर्षण का केंद्र बना था..

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सक्रियता,  समझ, समन्वय और समझदारी…
कार्तिकेय सिंह चौहान ने अपनी एक पहचान बनाने की कोशिश शायद बिना समय गवांए अब शुरू कर दी है..सक्रियता लेकिन समझदारी और समन्वय के साथ..शायद कार्तिकेय को अच्छी तरह पता है कि उनके पिता शिवराज सिंह चौहान के समर्थकों की यदि मध्यप्रदेश में भरमार तो महत्वाकांक्षी और प्रतिस्पर्धी नेताओं की भी कमी नहीं है..क्योंकि वो प्रदेश के मुख्यमंत्री भी हैं..ऐसे लोग भाजपा में ही नहीं विरोधी दलों से भी ताल्लुक रखते हैं..ऐसे में यदि यह सच है कि पिता के नाते शिवराज का संरक्षण अपने पुत्र कार्तिकेय को  मिलेगा..तो निश्चित तौर पर उनकी अपनी अपेक्षाएं भी खसतौर से बड़े बेटे के कार्तिकेय से कुछ ज्यादा होंगी..बेटे की कोई भी चूक न सिर्फ  उसके अपने भविष्य को गफलत में डाल सकती है तो पिता को भी परेशानी में डाल सकती है… सियासत में विरोधियों की नजर भी इस चौहान परिवार पर टिके रहना लाजमी है.. कार्तिकेय ने आरोप प्रत्यारोप से आगे विवादों को अदालत की चौखट तक पहुंचते भी देखा है…कोलारस  की सभा में  शिवराज पुत्र कार्तिकेय का दर्द भी झलक आया जिन्होंने  विकास के मुद्दे पर  यदि बिना नाम लिए ज्योतिरादित्य  पर हमला बोला  तो  माता पिता  पर  लगाए जाने वाले  आरोपों का हवाला देकर वो व्यथित भी नजर आए…यह साल चुनावी साल तो विरोधी कार्तिकेय के हर फैसले और बढ़ते कदम पर यदि नुक्ताचीनी निकालकर राजनीति करें तो कोई बड़ी बात नहीं… बावजूद कार्तिकेय ने यदि उस कोलारस का रुख किया है जहां जीत हार को लेकर घमासान मचा है तो जाने से पहले 100 बार जरूर सोचा होगा..कोलारस के मंच से उन्होंने इस सस्पेंस को भी खत्म कर दिया कि वह समाज विशेष के आग्रह पर यहां तक पहुंचे लेकिन भोपाल से रवाना होने से पहले पिता शिवराज सिंह चौहान से फोन पर उन्होंने जरूर बात की..कार्तिकेय ने इस बात का भी खुलासा किया कि उन्होंने पिता से यह जानना चाहा कि आखिर वहां जाकर वह क्या बोले तो लगे हाथ शिवराज ने क्या सलाह दी उसका भी यह कहकर खुलासा कर दिया कि बेटा जो भी बोलो सच बोलना…तो निश्चित तौर पर समर्थकों का आग्रह अपनी जगह  लेकिन उसने सोच समझकर ही कदम आगे बढ़ाएं होंगे … निश्चित तौर पर माता पिता को भरोसे में लेकर और उनका आशीर्वाद साथ रखते हुए ही उस मैदान में जाकर कार्तिकेय ने हुंकार भरी … शुरुआत में ही क्षेत्र के सांसद को निशाने पर लिया तो अखबारों में छपी खबरों का हवाला देकर  विकास के उस एजेंडे को आगे बढ़ाया  जिसे उनके पिता मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कीर्तिमानों से जोड़ा … कल 20 मिनट के अपने उद्बोधन में कार्तिक का आत्मविश्वास देखने लायक था संवाद ऐसा की मंच के सामने मौजूद भीड़ उन्हें अपना समझे..कोलारस जहां तारीख का ऐलान नहीं फिर भी उपचुनाव को लेकर सरगर्मियां लगातार बढ़ती जा रही है..प्रदेश के सिंहासन का फाइनल माने जाने वाले विधानसभा चुनाव 2018 से पहले सेमीफाइनल में तब्दील हो चुके कोलारस और मुंगावली उपचुनाव में पहले ही शिवराज और ज्योतिरादित्य आमने सामने आ चुके..इस माहौल में कार्तिकेय ने धाकड़ ,किरार समाज के सम्मेलन को उस वक्त संबोधित किया जब करीब 1 घंटे पहले कार्यक्रम स्थल से थोड़ी दूर पर ही ज्योतिरादित्य इसी समाज से जुड़े अपने समर्थकों और मतदाताओं से रूबरू होकर जा चुके थे..भीड़ के मापदंड पर कहे या फिर उत्साह से जोड़कर आकलन करें तो कार्तिकेय का जमावड़ा भारी नजर आया.. बिना तैयारी और भाजपा द्वारा ताकत झोंक देने के बिना यह संभव नहीं रहा होगा लेकिन यहां कार्तिकेय ने जो समां बांधा वह गौर करने लायक था..क्योंकि न तो उसके साथ वहां पर मुख्यमंत्री मौजूद थे और ना ही उनकी माता साधना सिंह जिनके मार्गदर्शन और संरक्षण में कार्तिकेय एक साथ कई मोर्चों पर अपनी सक्रियता बढ़ा चुके हैं..

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जूनियर चौहान के सियासत में बढ़ते कदम…
हर माता-पिता की एक ही चाहत होती है कि उसका पुत्र सफलता की ऊंचाइयों हासिल करें और आत्मनिर्भर हो जाए… ऐसे में चौहान परिवार जिसके मुखिया शिवराज सिंह चौहान लगातार सफलता के झंडे फहराते जा रहे हैं ने भी अपने दोनों पुत्र के भविष्य को लेकर जरूर कोई ताना बाना बुना होगा..बड़ा बेटा कार्तिकेय जो कुछ दिन पहले ही 23 साल पूरे कर अपना फोकस पढ़ाई पर बनाए हुए थे अचानक सुर्खियों में तब आए जब वह शिवराज सिंह चौहान की नर्मदा यात्रा के दौरान अपने पैतृक गांव जैत के पास एक कार्यक्रम में नजर आए… मंच सामाजिक सरोकार से जरूर जुड़ा था लेकिन इसे कार्तिकेय की सियासत में लांचिंग से जोड़कर देखा गया.. क्योंकि जिस गांव से संघर्ष कर शिवराज ने मुख्यमंत्री तक का सफर पूरा किया ..उस माटी से इस परिवार ने अपना नाता हमेशा जोड़ कर रखा है तो उस वक्त संदेश यही गया की पिता की राजनीतिक विरासत संभालने के लिए कार्तिकेय मन बना चुके  और उन्हें इंतजार है सही समय का.. कार्तिकेय कानून की पढ़ाई कर बैरिस्टर बनने के बहुत करीब पहुंच चुके हैं.. लेकिन चर्चा में दूसरी बार तब आए जब उन्होंने फूल की खेती को व्यापार से जोड़ा जिसके लिए बाकायदा राजधानी भोपाल में दुकान भी खोल दी गई..लेकिन उससे भी ज्यादा मीडिया की सुर्खियां कार्तिक तब बने जब एक और व्यापार का रास्ता खोल कर दूध का कारोबार शुरू किया..अभी तक संगठन की भी सियासत से दूर… फिर भी कार्तिकेय के बढ़ते कदम आखिर उन्हें उस मैदान में ले ही गए जिसे हमेशा उनके पिता शिवराज रपटीली   राह बता कर सियासत में सक्रियता बरतने वालों को सजग और सतर्क रहकर आगे बढ़ने का मशवरा देते रहे.. कार्तिकेय ने भारतीय जनता पार्टी जिंदाबाद जिंदाबाद के नारों के बीच समाज विशेष की बैठक में जिस तरह शिरकत की उसने उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के साथ भविष्य के संकेत भी आखिर दे ही दिए हैं.. तो यह भी सच है की चुनावी राजनीति में पदार्पण के लायक न तो उनकी उम्र है और ना ही भाजपा संगठन के  किसी ऐसे पद की जिम्मेदारी संभाल रहे  जिससे उनकी महत्वाकांक्षाओं से जोड़ कर देखा जाए .. यदि पिछले 1 साल में एक साथ कई मोर्चों पर उनकी सक्रियता पर गौर किया जाए तो संदेश जरूर यह जा चुका है कि आने वाले समय में फैसलों को लेकर कोई पटकथा यदि लिखी जा रही है तो कार्तिकेय अपनी एक अलग पहचान बनाने को लेकर संजीदा जरूर हो चले..

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दूरियां नजदीकियां बन गई अजब इत्तेफाक है
उम्र इतनी नहीं कि चुनाव लड़ सके लेकिन सियासत और सियासतदानों को उन्होंने बहुत करीब से देखा चाहे फिर वह पिता शिवराज का संघर्ष,  बढ़ता सियासी और चुनावी राजनीति में उनका अभी तक अपराजेय साबित होना.. पहली बार  अपने पिता के विधानसभा क्षेत्र बुधनी  और पूर्व संसदीय क्षेत्र विदिशा से बाहर  एक ऐसा मंच साझा किया  जो कहने को तो धाकड़ किरार समाज का था लेकिन माहौल पूरी तरह से राजनीतिक  तो उद्बोधन भी  कार्तिक का  राजनीति से अछूता नहीं रह पाया..पारिवारिक पृष्ठभूमि  किसान की  राजनीति के लिए जरूरी दांव-पेच से लगभग अनजान लेकिन हौसला इतना ऊंचा कि चुनौतियां कोई मायने नहीं रखती.. एक सीमित दायरे में ही सही नारेबाजी स्वागत अभिनंदन और भाषण के बीच मंच, माला और माइक में पूरी तरह से खुद को फिट साबित कर ही दिया.. चाहे फिर वह सड़क पर स्वागतार्थ समर्थकों और भाजपा कार्यकर्ताओं से मिलना उनका आभार व्यक्त करना और कदम आगे बढ़ाते हुए मंजिल की ओर बढ़ते जाना… सिर पर एक खास पगड़ी तो गले में फूलों के हार उन्हें भीड़ में एक अलग पहचान दिलाने के लिए काफी था.. भोपाल से गुना तक तो कार्तिकेय गिने-चुने लोगों के बीच में ही रहे लेकिन गुना से कोलारस पहुंचने तक गाड़ियों का काफिला यह बता रहा था कि कोई खास उस राह पर निकल पड़ा है जो चुनावी मैदान की ओर जाती है ..मंच पर हो हल्ला के बीच भाव-भंगिमाएं ऐसी कि जैसे पहली बार नहीं बल्कि उनका ऐसे कार्यक्रमों से नाता बना रहा हो.. वरिष्ठ जनों का सम्मान  अपनों को दुलार और सजग करते हुए  पुरानी और नई पीढ़ी के बीच तालमेल बनाकर  भाजपा का गुणगान  दो कांग्रेस को आईना दिखाना  वह नहीं भूले.. हाथ जोड़कर अभिवादन स्वीकार करना हो या फिर अपनी नजरों से लोगों को इस बात का एहसास दिलाना कि बिना बोले भी वह एक दूसरे के संपर्क में आ चुके हैं ..मीडिया से लगभग पूरी तरह से दूरी लेकिन उसका बेहतर इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है यह साबित किया ..मंच के सामने पंडाल में बैठे भाजपा, समाज विशेष के कार्यकर्ताओं को भरोसे में लेने के लिए सोच समझकर सारगर्भित अपनी बात रखी ..कार्तिकेय सिंह चौहान को जो संदेश भविष्य को ध्यान में रखते हुए दे देना चाहिए था उसे लोगों तक पहुंचाने में वह सफल भी रहे.. फिर वही बात कि उम्र इतनी नहीं कि कार्तिकेय को चुनाव के लिए जरूरी टिकट का इंतजार हो लेकिन भविष्य की संभावनाओं का आंकलन जरूर शुरू कर सारे विकल्प खोल दिए हैं.. कह सकते हैं कि सियासत के मैदान में एक पत्थर उछाल कर उन्हें शायद प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा..

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कार्तिकेय ने कोलारस में महाराजा को दिखाया आईना
कार्तिकेय सिंह चौहान ने बिना नाम लिए ही सही लेकिन राजवंश को सीधे निशाने पर लेकर महाराजा सिंधिया पर सीधा हमला बोला है.. उन्होंने कहा राजतंत्र से नहीं लोकतंत्र से तेज चलता है कार्तिकेय ने अखबारों के हवाले से ही सही ज्योतिरादित्य के उस बयान का मखौल उड़ाया… जिसमें उन्होंने लड़ाई सीधी शिवराज से होने और क्षेत्र से बाहर निकाल देने की बात कही थी.. कार्तिकेय ने सवाल खड़ा किया कि भाजपा की लड़ाई गरीबी भुखमरी और अपराध के खिलाफ है ऐसे कैसे कोई सांसद मुख्यमंत्री को भगा देगा जिन्होंने कांग्रेस के पिछले60  साल की तुलना में 12 साल शिवराज के और 14 साल भाजपा  सरकार में करीब 160 योजनाओं के जरिए प्रदेश की जनता को उसका हक दिलाया है कार्तिकेय ने जोर देकर कहा उनके पिता शिवराज सिंह चौहान ने लोगों के दिल में जगह बनाई है शिवराज पुत्र कार्तिकेय सिंह कोलारस में धाकड़ किरार समाज को संबोधित कर रहे थे उन्होंने उप चुनाव में समाज का हर व्यक्ति उम्मीदवार के तौर पर भाजपा को जिताने के लिए काम करेगा कार्तिकेय ने भाजपा सरकार की योजनाओं की तुलना कांग्रेस खास तौर से यूपीए सरकार से की सड़क बिजली पानी के मुद्दे पर कार्तिक की पूरी तरह से आंकड़ों के साथ आए थे जिन्होंने यह साबित किया कि भाजपा की सरकार रहते इन तीनों क्षेत्रों में मध्यप्रदेश में विकास के नए मापदंड स्थापित किए हैं जिन सड़कों पर कांग्रेस के नेता घूमते हैं उन अच्छी सड़कों के लिए कांग्रेस को भाजपा का शुक्रिया कहना चाहिए..

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पॉलिटिक्स में में परसेप्शन और टाइमिंग मायने रखती है
किसी ने  सच ही कहा है पॉलिटिक्स में परसेप्शन और टाइमिंग बहुत मायने रखते हैं और जब चुनावी साल हो तो हर फैसला चाहे फिर वह सरकार कहो या फिर पारिवारिक स्तर पर खासतौर से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के लिए भी मायने रखता है मध्य प्रदेश की सियासत लगातार 12 साल के मुख्यमंत्री का कीर्तिमान अपने नाम स्थापित कर चुके शिवराज मैं दूसरे नेताओं के मुकाबले ज्यादा बेहतर समझ जरूर होगी जिन्होंने भाजपा ही नहीं कांग्रेस की जमात में खुद को सबसे आगे लाकर खड़ा कर रखा है शिवराज ने हमेशा खुद को ही नहीं अपनी सरकार और पूरी भाजपा को संकट से बाहर जरूर निकाला है लेकिन कुछ फैसलों को लेकर किरकिरी भी खूब हुई है बावजूद उसके गलतियों से सीख लेकर शिवराज ने समय रहते उस माहौल को भी बदल कर दिखाया जो उनके खिलाफ बना तारीफ हर नेता को अच्छी लगती है और आलोचना पचा पाना हर किसी के बूते की बात नहीं शिवराज ने साबित किया कि वह तारीफ से आत्ममुग्ध नहीं तो अपनी कमजोरियों को ताकत बनाकर ही डंके की चोट पर मध्य प्रदेश सियासत की अब जबकि भाजपा विरोधी दलों को वंशवाद का पाठ पढ़ा रही है तब मोदी और शाह के इस दौर में सियासत में परिवारवाद को सोच समझकर ही संरक्षण देना होगा शिवराज सिंह चौहान के पुत्र कार्तिकेय चौहान के पास सियासत में आने के लिए 2 साल का समय रखते हैं लेकिन कैबिनेट के दूसरे मंत्री और संगठन से जुड़े नेताओं के पुत्रों की लंबी फेहरिस्त किसी से छुपी नहीं है फिलहाल कार्तिकेय ने समाज के मंच से सियासत की हुंकार भर कर अपने इरादे भले ही जता दिए हो लेकिन भाजपा कि सक्रिय राजनीति के लिए उन्हें भी संघर्ष के लिए तैयार रहना होगा.. कोलारस में कार्तिकेय ने क्षेत्र के सांसद के विकास पर सवाल खड़े कर जिस तरह उपचुनाव में भाजपा की जीत का आवाहन किया है वह गौर करने लायक है क्योंकि बुधनी विदिशा से आगे बढ़कर कार्तिकेय ने उस कोलारस का चयन किया है जहां के सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस के सीएम इन वेटिंग के सबसे बड़े दावेदार माने जाते हैं.. कार्तिकेय ने अपने कदम सियासत की ओर उस वक्त बढ़ाएं हैं जब प्रदेश में दिग्गज नेताओं का जमावड़ा लगा हुआ चाहे फिर वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ही नहीं सरसंघचालक मोहन भागवत और उनकी टीम के प्रतिनिधि मध्यप्रदेश में दो थे.. तो बड़ा सवाल यहीं पर खड़ा होता है उम्र भले ही अगले चुनाव में टिकट हासिल कर मैदान में उतरने की नहीं हो लेकिन क्या इसे सियासत की सक्रियता से इनकार किया जा सकता है..