सवाल दर सवाल

‘सिंधिया’ की राह में रोड़ा कौन? (राकेश अग्निहोत्री) “सवाल दर सवाल” (नया इंडिया)

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सवाल दर सवाल
सिंधिया’ की राह में रोड़ा कौन?

राकेश अग्निहोत्री
गुजरात चुनाव से आगे राहुल गांधी के कांग्रेस राष्ट्रीय अध्यक्ष की कमान संभालने के साथ देश की नजर आने वाले समय में जिन राज्यों पर टिकने वाली है उनमें मध्यप्रदेश सबसे ऊपर होगा। जहां पिछले 14 साल से बीजेपी की सरकार और शिव का राज कांग्रेस की आंख की किरकिरी बना हुआ है। मध्यप्रदेश में शिवराज के खिलाफ कांग्रेस का हर फार्मूला और चेहरा जब चुनावी परीक्षा में फेल साबित होता रहा है तब एक बार फिर कमलनाथ के मुकाबले ज्योतिरादित्य सिंधिया का पलड़ा भारी माना जा रहा है। तब सवाल खड़ा होना लाजमी है कि आखिर सिंधिया की राह में रोड़ा कौन और क्यों? मुद्दों, चेहरे की स्वीकार्यता, सामूहिक नेतृत्व, कमजोर प्रबंधन जैसे सवालों की लंबी फेहरिस्त के बीच बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि क्या सिंधिया की राह में सबसे बड़ा रोड़ा उनकी अपनी महराज की छवि है? जिसे उन्होंने बदलने की कोशिश तो बहुत की बावजूद इसके कांग्रेस के अंदर उनकी राह आसान अभी तक नजर नहीं आती रही है। सवाल यह भी खड़ा होता है कि क्या ज्योतिरादित्य भाजपा के पर्याय बन चुके शिवराज को मात देने के लिए उनकी खूबियों को आत्मसात कर उनकी तरह उनसे ज्यादा विनम्र, मिलनसार, लो प्रोफाइल नजर आएंगे या फिर सिंधिया एक अलग लाइन अख्तियार कर अपनी अलग पहचान बनाना चाहेंगे जिसमें सिर्फ लोकप्रियता ही नहीं बल्कि स्वीकार्यता भी नजर आए?

(ज्योतिरादित्य कैसे बनेंगे शिवराज की काट )
ज्योतिरादित्य सिंधिया जो कुछ महीने पहले तक अपने आपको अपने संसदीय क्षेत्र शिवपुरी-गुना तक सीमित रखते हुए राष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा बनाए हुए थे। उन्होंने संसदीय क्षेत्र से बाहर मध्यप्रदेश के दूसरे क्षेत्रों का दौरा किया तो कांग्रेस संगठन के साथ खड़े होकर मुद्दों को भुनाने के लिए पूरी दम भी लगाई। सिंधिया कांग्रेस के आंदोलन का हिस्सा बने लेकिन उनके अपने प्रतिस्पर्धी और महत्वाकांक्षी नेताओं ने आंदोलन का चेहरा नहीं बनने दिया । जो खुद बड़े पैरोकार बन कर मिशन 2018 के लिए चुनाव में चेहरा प्रोजेक्ट करने की आवश्यकता जताते रहे हैं। अब जबकि पार्टी की कमान राहुल गांधी को सौंपी जा चुकी है और सिंधिया की गिनती संसद के अंदर और बाहर राहुल के करीबी भरोसेमंद नेताओं में होती है तो सिंधिया की राष्ट्रीय अध्यक्ष से अपेक्षाएं बढ़ना लाजमी है। मध्यप्रदेश की राजनीति में ज्योतिरादित्य उन गिने-चुने नेताओं में शामिल हो चुके हैं जिन्हें मुख्यमंत्री का दावेदार माना जाने लगा है। स्वयं सिंधिया भी इससे इंकार नहीं करते। तो बदलते सियासी परिदृश्य में यह सवाल खड़ा होता है कि ज्योतिरादित्य की राह में रोड़ा कौन है। क्या अनुभवी पुरानी पीढ़ी के कमलनाथ जो अभी तक किंगमेकर की भूमिका मध्यप्रदेश में निभाते रहे? उनकी महत्वाकांक्षाएं सिंधिया की राह में रोड़ा बन सकती हैं या फिर दिग्विजय सिंह जिनके वीटोपॉवर के चलते पिछले विधानसभा चुनाव में भी सिंधिया सीएम इन वेटिंग के तौर पर सामने नहीं आ सके। क्या नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह और प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव सिंधिया की स्वीकार्यता पर पर्दे के पीछे ही सही सवाल खड़े करते रहेंगे। यदि इन बातों में दम नहीं है तो फिर क्या खुद राहुल गांधी नहीं चाहते हैं कि किसी दूसरे युवा चेहरे को प्रदेश की राजनीति में एकतरफा आगे बढ़ने दिया जाए। या फिर वह उनकी भूमिका राष्ट्रीय राजनीति में संसद के अंदर अपने साथ बनाए रखना चाहते हैं। क्या इसलिए कमलनाथ की भूमिका को लेकर पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व में अभी तक सस्पेंस बरकरार रखा है। क्या ज्योतिरादित्य को सीएम इन वेटिंग घोषित करने से भाजपा को ज्यादा आसानी हो जाएगी जो हमेशा महाराजा और किसान पुत्र के बीच में इस लड़ाई को पेश करती रही है। कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति और भाजपा से मिलने वाली चुनौती से आगे सवाल यह भी खड़ा होता है कि आखिर ज्योतिरादित्य सिर्फ एक लुभावना चेहरा भर है, कांग्रेस के दूसरे नेताओं को साथ लेकर चल पाना उनके लिए आसान नहीं है। कांग्रेस हाईकमान ने अलग-अलग राज्यों में चेहरा प्रोजेक्ट करने और सामूहिक नेतृत्व को लेकर विधानसभा के चुनाव लड़े। मध्यप्रदेश में भी सीएम इन वेटिंग के दूसरे दावेदारों ने कभी खुलकर ज्योतिरादित्य की पैरवी नहीं की बावजूद इसके कमलनाथ समेत दूसरे चेहरों के मुकाबले सिंधिया का दावा ज्यादा मजबूत बना हुआ है। फिर भी ज्योतिरादित्य की छवि को लेकर नए सवाल खड़े होते हैं जिसे भाजपा के सेनापति शिवराज से जोड़कर देखा जाना भी जरूरी है। मुकाबले में जब दोनों आमने-सामने होंगे तो फिर खूबियां, ताकत और कमजोरियों का मूल्यांकन जनता द्वारा किया जाना तय है। अभी तक भ्रष्टाचार के किसी भी आरोप से दूर रहे ज्योतिरादित्य की इमानदारी छवि पर क्या उनकी महाराजा की छवि भारी पड़ती नजर आती है। लोकतंत्र में जिसकी दुहाई बीजेपी देने का कोई भी मौका हाथ से नहीं जाने देती। यह सच है कि ज्योतिरादित्य ने सांसद और मंत्री रहने से ज्यादा अपनी छवि यदि बदलने की कोशिश की तो वह है केंद्र से मनमोहन सरकार के जाने के बाद। मध्यप्रदेश में आंदोलनों की भागीदारी के दौरान अपने संसदीय क्षेत्र से बाहर सिंधिया के लिए चाहे फिर वह पार्टी के क्षेत्रीय और छोटे नेताओं से संवाद का तौर तरीका और उनके नाम से अनजान रहना हो या फिर दिल्ली और मध्यप्रदेश के गिने-चुने मीडियाकर्मियों तक सीमित रहना। सिंधिया ने पिछले दिनों कांग्रेस के सत्याग्रह के दौरान खास होकर आम आदमी के तौर पर खुद को प्रस्तुत करने की कोशिश की थी। जिसे लोगों ने सराहा भी लेकिन ज्योतिरादित्य की छवि एक आम नेता और आम आदमी की पहुंच साबित होने वाली बन गई हो ऐसा भी नजर नहीं आता है। सिंधिया के लिए चुनौती कांग्रेस के बड़े नेताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बनाने की ही नहीं बल्कि कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं के अनुरूप उनके बीच घुल-मिल जाने की भी होगी। देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा सरकार में निर्णायक भूमिका निभा रहे शिवराज जिन्होंने 12 साल के मुख्यमंत्री रहते एक विनम्र, मिलनसार और लो प्रोफाइल नेता के तौर पर आम लोगों का भरोसा जीता है। ज्योतिरादित्य उस लाइन पर आगे बढ़ते हुए नजर आएंगे या फिर शिवराज के मुकाबले एक अलग अंदाज अलग कार्यशैली के साथ आगे बढ़ेंगे। जिससे उनकी महाराज वाली छवि खुद और कांग्रेस के लिए कमजोरी नहीं बल्कि ताकत साबित हो सके। तो फिर सवाल यही खड़ा होता है कि ज्योतिरादित्य की राह में रोड़ा कौन है। एक पूर्व केंद्रीय मंत्री और सांसद अपने संसदीय क्षेत्र शिवपुरी से बाहर ज्योतिरादित्य के लिए पार्टी का चेहरा बनने की राह में आखिर कार्यकर्ता से लेकर आम मतदाताओं के बीच उनकी अपनी महाराजा की छवि रोड़ा तो नहीं बन जाएगी।

(अनुभवी नेताओं को नकारना राहुल के लिए आसान नहीं होगा)
कांग्रेस के नेतृत्व और सोनिया गांधी के उत्तराधिकारी के तौर पर संगठन का हस्तांतरण कर जब राहुल गांधी को कमान सौंपे जाने की औपचारिकता पूरी होने जा रही है तब गुजरात चुनाव के परिणाम कांग्रेस को एक नई दिशा देने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं ।चाहे फिर वह सरप्राइज़ के तौर पर एक बड़ी जीत का दावा कर रहे राहुल गांधी के बढ़ते कदम उनके आत्मविश्वास से जुड़ा हो या फिर मोदी-शाह और बीजेपी के साथ गुजरात में बने विपरीत माहौल के बावजूद कांग्रेस के लिए अपेक्षित परिणाम सामने आना ही क्यों न मान लिया जाए। जिज्ञासा इन परिणाम के साथ राहुल गांधी की नई टीम को लेकर कुछ ज्यादा है। राहुल गांधी की गिनती युवा, ऊर्जावान, जोशीले और अब आक्रामक राजनीति करने वाले एक ऐसे नेता के तौर पर हो रही है जो खुद संयमी और धैर्यवान साबित करने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में जब पीढ़ी परिवर्तन के इस दौर में राहुल गांधी की नई टीम में युवाओं को प्राथमिकता के साथ अनुभवी और पुरानी पीढ़ी के नेताओं को नए सिरे से नई भूमिका में एडजस्ट करने की संभावनाओं को बल मिला है तब नई चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए राहुल गांधी के फैसले महत्वपूर्ण हो गए। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए जाने की प्रक्रिया पूरी होते ही गुजरात चुनाव के परिणाम अगले कुछ घंटे में सामने आ चुके होंगे। निश्चित तौर पर यह परिणाम कांग्रेस से ज्यादा राहुल गांधी के लिए व्यक्तिगत तौर पर कुछ ज्यादा ही मायने रखते हैं। इस बात की उम्मीद कुछ ज्यादा ही है कि अब मिशन 2019 लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए राहुल गांधी जो भी अपनी टीम बनाएंगे उसमें युवा नेतृत्व को नजरअंदाज नहीं किया जा सकेगा। ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि यदि परिणाम कांग्रेस और राहुल गांधी के पक्ष में जाते हैं तो क्या वह सोनिया गांधी की टीम के अनुभवी लोगों को मुख्यधारा से दूर करेंगे और यदि चुनाव परिणाम कांग्रेस से ज्यादा राहुल गांधी के खिलाफ जाते हैं तो क्या पुरानी पीढ़ी के अनुभवी नेताओं का दबदबा संगठन की राजनीति में बढ़ना तय है। मणिशंकर अय्यर जैसे वरिष्ठ नेता को उनके विवादित बयान के चलते पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित किए जाने के फैसले के साथ राहुल गांधी कांग्रेस के अनुभवी नेतृत्व राजनेताओं को पहले ही अनुशासन की आड़ में बहुत संदेश एक साथ दे चुके हैं और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की हैसियत से प्रदेश से लेकर दिल्ली की राजनीति में युवा नेतृत्व की भागीदारी चर्चा का विषय पहले से ही बनी हुई है। गुजरात चुनाव परिणाम भले ही देश के साथ कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में एक बहस का मुद्दा बनने जा रहे हैं लेकिन यह भी तय है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष की भूमिका में राहुल गांधी यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निशाने पर आए पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बचाव में विशेष दिलचस्पी ले रहे हैं तो फिर ऐसी पुरानी पीढ़ी के दूसरे नेताओं को उनके लिए नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। यही वह संकेत है जिसे यदि समझा जाए तो राहुल गांधी के लिए भी गुजरात चुनाव के परिणाम व्यक्तिगत तौर पर अहम माने जाएंगे जिसके बाद ही कांग्रेस की दशा सुधारने के लिए उनकी दिशा गौर करने लायक होगी।
गुजरात चुनाव के परिणाम जितना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए मायने रखते हैं राहुल गांधी के लिए उससे कम नहीं। गुजरात यदि मोदी का गृह राज्य है तो राहुल गांधी ने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल ली है। बात यहां राहुल गांधी की तो उनका लक्ष्य  मिशन 2019 लोकसभा चुनाव ही होगा लेकिन उससे पहले जिन राज्यों में चुनाव होना है उसमें मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, कर्नाटक का महत्व कम नहीं होगा जिसे गुजरात चुनाव के परिणाम एक दिशा दे सकते हैं। यदि मोदी के कांग्रेसमुक्त अभियान को गुजरात में बड़ा झटका लगता है तो राहुल गांधी के लिए राह आसान हो जाती है लेकिन यदि राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के साथ गुजरात में कांग्रेस चारों खाने चित्त हो जाती है तो कांग्रेस के अंदर से ही राहुल को चुनौती मिल सकती है तो राहुल गांधी की राह में रोड़ा कौन इसके लिए इंतजार करना होगा। सिर्फ बीजेपी या फिर गुजरात के साथ कांग्रेस के अंदर से अनुभवी और पुरानी पीढ़ी के नेता भी किसी चुनौती के तौर पर सामने आ सकते।