सवाल दर सवाल

‘पागल’ विकास से भाजपा ने ‘पल्ला’ क्यों झाड़ा( राकेश अग्निहोत्री “सवाल दर सवाल” नया इंडिया)

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सवाल दर सवाल RAKESH AGNIHOTRI

पागल’ विकास से भाजपा ने ‘पल्ला’ क्यों झाड़ा
{गुजरात मॉडल पर सवाल तो शिव के राज का क्या होगा}
गुजरात विधानसभा चुनाव में आखिर क्या वजह है, जो विकास का मुद्दा बहुत पीछे छूट गया.. क्योंकि मोदी और शाह के गुजरात में मुगलकाल से आगे गड़े मुर्दे उखाड़ते हुए ‘नीच’ जैसी शब्दावली चुनाव प्रचार का मुख्य हिस्सा वह भी निर्णय दौर में बन गया है.. ऐसे में सियासत की दशा और दिशा कुछ नए सवाल खड़े करती है.. आखिर वजह क्या है जो ‘विकास पागल हो गया’ का जुमला भाजपा के लिए परेशानी का सबब बना और वह पागल विकास से पल्ला झाड़ने को मजबूर हुई.. क्या जिस गुजरात मॉडल ने नरेंद्र मोदी को दिल्ली पहुंचाकर भाजपा ही नहीं, देश का एक बड़ा ब्रांड बनाकर विश्व के गिने-चुने नेताओं में शुमार कर दिया.. आखिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उद्बोधन में प्रचार के दौरान उस विकास की गूंज क्यों सुनाई नहीं दे रही.. इससे उलट दूसरे जुमलों पर प्रचार का मुख्य फोकस बन चुका है.. ऐसे में यदि 22 साल तक भाजपा के राज वाले गुजरात में विकास से भाजपा पल्ला झाड़ रही है तो फिर राजस्थान, छत्तीसगढ़ के साथ उस मध्यप्रदेश में आखिर विकास को बीजेपी कैसे चुनावी मुद्दा बनाएगी जहां उसके सरकार में अब भ्रष्टाचार के नए चौंकाने वाले मामले चर्चा का विषय बन रहे हैं..

विकास की राजनीति को भाजपा ने एक नया आयाम देकर यदि राज्यों में अपनी सरकार ही नहीं बनाई, बल्कि वापस लौटी। इसी विकास के गुजरात मॉडल की गूंज पिछले लोकसभा चुनाव में खूब सुनाई दी.. विकास का चेहरा बनकर नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री से बाहर निकलकर देश के प्रधानमंत्री बने.. मोदी के विकास के नारे में संघ के कोर इशू में शामिल हिंदुत्व, धारा 370, राम मंदिर, समान आचार संहिता जैसे मुद्दे पीछे छूट गए थे, लेकिन उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव आते-आते कब्रिस्तान जैसे मुद्दों को लेकर मोदी और शाह की भाजपा संजीदा नजर आने लगी थी.. अब गुजरात मे कहने वाले कह सकते हैं कि इन मूल मुद्दों पर सहमति नहीं बन पाने की स्थिति में भाजपा ने दूसरे रास्ते चाहे वह तीन तलाक जैसे जाति, समुदाय, विशेष से जुड़े मुद्दों को हवा देकर एक ऐसा माहौल बनाया, जिसमें फिर यही संदेश गया कि विकास पीछे छूट रहा है.. गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान जिस तरह विरोधियों ने ‘विकास पागल हो गया’ के जुमले को उछाला उसके बाद भाजपा ने मानो पागल विकास से पल्ला झाड़ लिया और 22 साल से सरकार में रहते उपलब्धियों की जगह दूसरे मुद्दों ने ले ली.. भाजपा ने कांग्रेस पर जाति की राजनीति करने का आरोप लगाकर मुगलकाल, औरंगजेब से जोड़कर अपने हमले तेज किए। पहले दौर के मतदान तक भाजपा विकास के मुद्दे पर जिस तरह बैकफुट पर खड़ी नजर आई उसने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया कि मोदी और शाह की भाजपा उस विकास से दूरी क्यों बना रही है, जिसने उन्हें और उनके गुजरात को एक नई पहचान दी.. भाजपा के चुनावी विजन डॉक्यूमेंट भी विकास के मुद्दे पर फ्रंट फुट पर आकर खड़े हो गए हों, ऐसा संदेश नहीं जा पाया। उलट संदेश यही गया विकास के एजेंडे की जगह इमोशनल इशू ने ले ली। खासतौर से कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने जो अभी तक 10 सवाल विकास पर खड़े किए उसका जवाब मोदी द्वारा नहीं दिए जाने से इस बात को और बल मिला कि गुजरात मॉडल इस चुनाव में कम से कम सवालों के घेरे में है.. न्यूज़ चैनल के डिस्कशन हों या फिर सोशल मीडिया पर बढ़चढ़कर पोल खोल अभियान खूब चर्चा में रहे। गुजरात में प्रचार के दौरान भाजपा सरकार के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी तो उसके नेताओं को अहंकारी साबित करने में विरोधियों ने कोई कसर नहीं छोड़ी तो बीजेपी ने इसे गरीब के सम्मान से जोड़कर विकास के मुद्दे को पीछे छोड़ दिया।
तो बड़ा संदेश अभी तक यही गया कि भाजपा गुजरात में पागल साबित किए जा रहे विकास से पल्ला झाड़ रही है.. बावजूद इसके मोदी की धमक और अमित शाह का बूथ स्तर पर माइक्रो मैनेजमेंट चुनावी बहस में भाजपा की निर्णायक ताकत बताकर उसकी सरकार लौटने की संभावना जता रहा है.. जीत-हार से आगे भाजपा जिस तरह विकास के ट्रेक से उतरती हुई नजर आ रही है उसकी भरपाई वह भले ही इमोशनल मुद्दे सामने लाकर पूरी कर दे, लेकिन उसकी जो पहचान दूसरे राज्यों में है आखिर वहां क्या होगा जब चुनाव होंगे.. गुजरात के बाद मध्यप्रदेश में भी विधानसभा के चुनाव को लेकर पहले ही सरगर्मी बढ़ चुकी है जहां शिव के राज में भाजपा ने विकास के मुद्दे पर ही कई चुनाव जीते, लेकिन विधानसभा के दो उपचुनावों में अटेर और चित्रकूट में मिली हार ने यहां भी विकास के एजेंडे पर सवाल खड़ा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है.. गुजरात विधानसभा चुनाव के परिणाम सामने आने के बाद जिन राज्यों में विधानसभा के चुनाव होना हैं वहां भाजपा के लिए जरूरी है कि वह गुजरात मॉडल की विश्वसनीयता और भरोसे को लेकर आगे बढ़े, क्योंकि गुजरात की तरह इन चुनावों में भी नरेंद्र मोदी पार्टी का बड़ा चेहरा होंगे, इसलिए मध्यप्रदेश के नेताओं की भी गुजरात चुनाव पर पैनी नजर है और इससे भाजपा ही नहीं, कांग्रेस भी अछूती नहीं है.. मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के 12 साल पूरे हो जाने के बाद अचानक घपले-घोटालों की बाढ़ सी आ गई है.. वह भी तब जब दो उप चुनाव हारने के बाद कांग्रेस के कब्जे वाली दो और सीटों पर भाजपा कमजोर मानी जा रही है.. शिवराज की पूंजी भी उनकी सरकार की जनहितैषी योजनाओं के साथ विकास का बढ़ता हुआ एजेंडा ही है.. मध्यप्रदेश में जब बात विकास की होगी तो निश्चित तौर पर किसान फोकस में रहेगा, जिसके लिए शिवराज ने अपना खजाना खोला है। बावजूद इसके किसानों का भरोसा जीतना अभी किसी चुनौती से कम नहीं है.. बात जब विकास से आगे निकलेगी तो युवाओं-बेरोजगारों को रोजगार मुहैया कराने की होगी.. विकास की बात दूर तलक जाएगी तो जाति, धर्म, समुदाय, उम्र के मापदंड से आगे समाज का हर तबका सरकार से अपनी अपेक्षाओं को जरूर जोड़कर देखेगा और जब बात विकास के मुद्दे पर चुनाव में फिर जाने की होगी तो भाजपा को विरोधी दल कांग्रेस के रणनीतिकारों से सतर्क रहना होगा, जो 14 साल की भाजपा के घपले-घोटालों को उजागर करने के लिए मंत्रियों से लेकर विधायकों की कुंडली बना रहे हैं। बड़ा सवाल यही कि यदि गुजरात में विकास पागल हो गया और पागल विकास से भाजपा ने पल्ला झाड़ लिया तो मध्यप्रदेश में भाजपा की रणनीति क्या होगी। क्योंकि गुजरात में तो इमोशनल इशू खासतौर से हिंदू-मुस्लिम को जोड़कर भाजपा सियासी हित हासिल कर सकती है। लेकिन मध्यप्रदेश में शिवराज की गिनती एक सेकुलर नेता के तौर पर होती है तो गुजरात मॉडल पर खड़े किए जा रहे सवालों से मिशन 2018 में अबकी बार 200 पार का नारा देने वाली बीजेपी को नए सिरे से अपनी रणनीति बनाना होगी। अमित शाह ने गुजरात में डेढ़ सौ पार का दावा किया है लेकिन किसी भी चुनावी सर्वेक्षण ने अभी तक इस मैजिक फिगर तक पहुंचने की संभावना नहीं जताई है।