सवाल दर सवाल

योगी की ‘साख’ के बाद शिवराज की ‘पुण्याई’ कसौटी पर{ राकेश अग्निहोत्री} “सवाल दर सवाल” (नया इंडिया)

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  1. सवाल दर सवाल
    योगी की ‘साख’ के बाद शिवराज की ‘पुण्याई’ कसौटी पर
    राकेश अग्निहोत्री
    (उप चुनाव:कोलारस, मुंगावली को नजरअंदाज करना किसी के लिए भी आसान नहीं होगा)
    विधानसभा के शीतकालीन सत्र के समाप्त होते ही प्रदेश की राजनीति का फोकस मुंगावली और कोलारस का बनना तय है। जहां कांग्रेस से ज्यादा ज्योतिरादित्य सिंधिया पर दबाव होगा कि वो अपने संसदीय क्षेत्र की विधानसभा की दोनों सीटों पर कांग्रेस का कब्जा बरकरार रखें। तो भाजपा से ज्यादा 12 साल का कीर्तिमान बनाने वाले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की पुण्याई यहां कसौटी पर होगी। कांग्रेस के लिए यह उपचुनाव इसलिए और मायने रखता है क्योंकि तब तक राहुल गांधी की ताजपोशी के साथ गुजरात के चुनाव परिणाम भी आ चुके होंगे, लेकिन यह मौका होगा जब कांग्रेस राहुल गांधी को जीत का तोहफा दे सकती है। उत्तर प्रदेश निकाय चुनाव में भगवा फहराने के साथ योगी ने मोदी-शाह और उनकी भाजपा को गुजरात से पहले ताकत दी तो मध्यप्रदेश के यह दो उपचुनाव मिशन 2018 और 19 का माहौल बनाने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। जहां भाजपा लगातार तीन चुनाव जीत चुकी । ऐसे में सवाल खड़ा होना लाजमी है कि अटेर और चित्रकूट विधानसभा उपचुनाव के बाद कोलारस और मुंगावली मध्य प्रदेश की सियासत से ज्यादा आखिर भाजपा और कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में क्या गुल खिलाते हैं?

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मध्यप्रदेश विधानसभा के कोलारस और मुंगावली उपचुनाव की तारीख का ऐलान भले ही ना हुआ हो लेकिन दोनों क्षेत्रों में सरगर्मियां तेज हो चुकी हैं। भाजपा की ओर से करीब एक दर्जन मंत्रियों के साथ संगठन के पदाधिकारियों की सक्रियता गौर करने लायक है। शिवपुरी क्षेत्र की राजनीति पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की व्यक्तिगत तौर पर पैनी नजर है। संगठन की बैठकों के साथ विकास के एजेंडे चाहे फिर वह पूर्व में की गई घोषणाएं और आने वाले समय में दी जाने वाली सौगात का आंकलन जारी है। पिछले दिनों मुख्यमंत्री शिवराज ने अपनी कैबिनेट की सहयोगी यशोधरा राजे सिंधिया से उनके आवास पर जाकर मुलाकात भी की जो फिलहाल उपचुनाव की सियासत से दूरी बनाए हुए हैं। चित्रकूट में चोट खाने के बाद शिवराज संभलकर अपने कदम आगे बढ़ा रहे हैं लेकिन चुनावी जमावट के दौरान यहां पहुंचे संगठन के प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान से लेकर उपाध्यक्ष रामेश्वर शर्मा के विवादित बयान ज्यादा सुर्खियों में हैं। चित्रकूट में प्रदेश अध्यक्ष, प्रदेश महामंत्री भाजपा के बीच उम्मीदवार चयन में सहमति न बन पाने की खूब चर्चा रही है। ऐसे में इन दोनों उपचुनावों में शिवराज को अपने वीटो पॉवर का उपयोग समय रहते करना होगा। इस बार नंदकुमार सिंह चौहान यह कहकर नहीं बच सकते हैं कि चित्रकूट की तरह कोलारस और मुंगावली भी कांग्रेस की परंपरागत सीटें हैं। इस उपचुनाव के परिणाम बताएंगे कि भाजपा के नए नारे अबकी बार 200 पार के इरादे में कितनी दम होगी । कांग्रेस के कब्जे वाली सीट पर यदि कमल नहीं करता तो फिर इसे जुमला ही माना जाएगा ।तो मुख्यमंत्री के विकास की परीक्षा के साथ शिवराज की पुण्याई एक निर्णायक फैक्टर के तौर पर होगी। संगठन ने पुरानी और नई पीढ़ी के कार्यकर्ताओं को मंडल से लेकर बूथ तक की जिम्मेदारी सौंप दी है तो बैठकों में भीड़ जुटाकर भाजपा सिंधिया पर दबाव बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। यह तो अच्छा है कि जब चुनाव का ऐलान होगा तब तक गुजरात के परिणाम सामने आ चुके होंगे नहीं तो योगी आदित्यनाथ की तरह शिवराज पर भी अतिरिक्त दबाव ये दोनों सीटें जीतने का बढ़ जाता। लेकिन यह उपचुनाव सिर्फ मध्यप्रदेश की राजनीति को एक नई दिशा देने तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि उपचुनाव के परिणाम को मिशन 2018 से जोड़ कर भी यदि देखा जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। कल्पना कीजिए यदि कांग्रेस की जीत के साथ उपचुनाव में भाजपा की हार का सिलसिला जारी रहा तोहीन परिणाम के वक्त प्रदेश में क्या माहौल बनेगा। इसके बाद विधानसभा और लोकसभा की जमावट को लेकर मोदी और शाह किसी नई स्िक्रप्ट के साथ आगे बढ़ सकते हैं। लगातार गुजरात में भाजपा सत्ता में रही है। भले ही वो अपनी जीत को सुनिश्चित मानकर चल रही हो लेकिन कांग्रेस को नजरअंदाज करना उसके लिए आसान नहीं होगा। गुजरात की तरह ही आने वाले समय में जिन राज्यों में विधानसभा के चुनाव होना हैं उसमें राजस्थान और छत्तीसगढ़ के साथ मध्यप्रदेश भी एक बड़ा राज्य है जहां भाजपा की सरकार है और लगातार तीन चुनाव जीत चुकी है। कहने वाले तो यह भी कहते हैं गुजरात की जीत-हार कुछ भी हो भाजपा के 2 बड़े नेता मोदी और शाह बड़े लक्ष्य मिशन 2019 को लेकर जरूरत पड़ने पर कुछ अप्रत्याशित फैसले ले सकते हैं। ऐसे में शिवराज पर अतिरिक्त दबाव कोलारस और मुंगावली जीतने का बढ़ता जाएगा। यदि सिंधिया को उनके घर में ही शिवराज और उनकी भाजपा ने मात दे दी तो मिशन 2018चुनाव में भाजपा की राह आसान हो सकती है। क्यो किकांग्रेस चेहरे और सामूहिक नेतृत्व जिस फार्मूले के साथ भी चुनाव में जाने वाली है उसमें ज्योतिरादित्य सिंधिया की भूमिका प्रभावी तौर पर सामने आना तय है।

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मध्य प्रदेश कांग्रेस खेमे में इन दिनों उत्साह का कारण अटेर के बाद चित्रकूट विधानसभा उपचुनाव में मिली जीत है। पीढ़ी परिवर्तन के इस दौर में कांग्रेस का नेतृत्व राहुल गांधी के हाथ में हस्तांतरण होने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। ऐसे में हाईकमान की मध्यप्रदेश से अपेक्षाएं बढ़ना लाजमी हैं। मध्यप्रदेश उन राज्यों में से एक है जहां गुजरात की तरह लगातार भाजपा की सरकार बनती आ रही है। इस बार जिस तरह कांग्रेस ने गुजरात में दबाव बनाया है उससे मध्यप्रदेश में भी नेताओं के हौसले बुलंद हैं। प्रदेश प्रभारी दीपक बाबरिया की कवायद के बीच संगठन में कसावट और नए फार्मूले के साथ एक नए ब्लू प्रिंट को साथ लेकर जनता के बीच जाने के लिए कांग्रेस कमर कस चुकी है। कांग्रेस संगठन की सियासत राहुल गांधी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए जाने की औपचारिक घोषणा के साथ मध्यप्रदेश में जल्द नए फार्मूले के साथ सामने आ सकती है। शिवराज की सरकार रहते कांग्रेस के क्षत्रप ने लगातार कुछ उप चुनाव जीतकर अपनी ताकत का एहसास कराया है चाहे फिर वह मोदी लहर में लोकसभा का चुनाव जीतने वाले कांतिलाल भूरिया ही क्यों ना हों जो अब चुनाव जीतकर सांसद फिर बन चुके हैं। तो ग्वालियर-चंबल की राजनीति में अपना दबदबा साबित करने में ज्योतिरादित्य सिंधिया भी तब सफल हुए जब अटेर विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस अपनी सीट बचाने में सफल रही। यही नहीं कमलनाथ जब अपनी छिंदवाड़ा में पैनी नजर बनाए हुए हैं, तब नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने भी शहडोल और मैहर की हार से कांग्रेस को बाहर निकालते हुए चित्रकूट विधानसभा उपचुनाव में जीत दिलवाने में बड़ी भूमिका निभाई है। दूसरों के लिए मैदान खुला छोड़ कर दिग्विजय सिंह पहले ही नर्मदा यात्रा पर निकल चुके हैं तो कह सकते हैं। कांग्रेस के क्षत्रप पिछले तीन चुनाव के मुकाबले इस बार कुछ ज्यादा संजीदा और एकजुट होने को मजबूर हुए हैं। गुजरात के परिणाम मध्यप्रदेश में इससे पहले ज्यादा प्रभाव नहीं डालते रहे लेकिन इस बार वहां जो माहौल बना है उसने मध्यप्रदेश के कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं के हौसले अभी तक बुलंद जरूर किए हैं। वह बात और है कि गुजरात यदि राहुल गांधी के मंसूबों पर पानी फिर गया तो फिर मध्यप्रदेश में भाजपा अपना दबाव कांग्रेस पर बनाने और बढ़ाने में नहीं चूकेगी। ज्योतिरादित्य सिंधिया फिलहाल अकेले अपने संसदीय क्षेत्र के कोलारस और मुंगावली में कार्यकर्ताओं और मतदाताओं से संवाद का सिलसिला बदस्तूर जारी रखे हुए हैं चाहे फिर इसके लिए कार्यकर्ता या फिर जातीय समीकरण दुरुस्त करने के लिए जरूरी सम्मेलन का दौर। ज्योतिरादित्य इन दिनों गुजरात में भी चुनाव प्रचार में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। राहुल गांधी की ताजपोशी का माहौल बनाने में दूसरे नेताओं की तरह सिंधिया जिस तरह लंबे समय से सक्रिय हैं ।उससे उम्मीद की जा रही है कि मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए उन्हें जल्द कोई बड़ी जिम्मेदारी राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के साथ मिल सकती है। ज्योतिरादित्य पर भी दबाव होगा कि वह विधानसभा चुनाव 2018 से पहले अपने संसदीय क्षेत्र के दो उप चुनाव में कमल नहीं खेलने दें। इस लोकसभा सीट पर अमित शाह की नजर पहले ही लग चुकी है। सिंधिया यह भी अच्छी तरह जानते हैं कि कांग्रेस के लिए इससे अच्छा माहौल कभी नहीं रहा है और पार्टी खासतौर से हाईकमान को उनसे इस बार भी कुछ ज्यादा अपेक्षा रहेगी। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि राहुल गांधी मध्यप्रदेश में कांग्रेस को मजबूत बनाने के लिए जिन चेहरों पर दांव लगा सकते उसमें कमलनाथ के साथ ज्योतिरादित्य बड़ा नाम है। कांग्रेस में चेहरे की स्वीकार्यता को लेकर झगड़ा कोई नई बात नहीं है लेकिन यदि कमलनाथ को किसी दूसरी सम्मानजनक भूमिका में सामने लाने के साथ युवा और ऊर्जावान चेहरे के तौर पर ज्योतिरादित्य को प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंपी जाती है तो इसका फायदा कोलारस और मुंगावली विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस को भी मिल सकता है। फिलहाल यह सब आसान नहीं है लेकिन सत्ता का वनवास खत्म करने के लिए हाईकमान को इस बार कुछ सख्त फैसले लेने होंगे। ज्योतिरादित्य का पलड़ा इसलिए कमलनाथ और दूसरे नेताओं के मुकाबले भारी माना जा रहा है क्योंकि खुद पीढ़ी परिवर्तन के दौर में राहुल गांधी के हाथ में कांग्रेस की कमान जा रही है। ऐसे में राज्यों की राजनीति में राहुल के भरोसेमंद और युवा जनाधार वाली चेहरों को नई जिम्मेदारी सौंपने की लाइन राजस्थान की तर्ज पर आगे बढ़ाई जा सकती है।

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