सवाल दर सवाल
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सवाल दर सवाल

(कांग्रेस : ‘कायाकल्प’ के इंतजार में ‘वनवास’ के 14 साल)
(चमत्कार की उम्मीद में नेता बदले, चेहरा बदला फिर भी नहीं बदला कांग्रेस का भाग्य)

  

दिग्विजय सिंह की सरकार जाने के बाद कांग्रेस के आंतरिक समीकरण पर गौर किया जाए तो अलग-अलग चुनाव में नेता, विवादों के बीच चेहरा, रणनीति और भी बहुत कुछ बदला है, समय के साथ कई प्रयोग किए गए, फिर भी एक नहीं लगातार विधानसभा के तीन चुनाव वह हार गई। लोकसभा में भी उसका परफॉर्मेंस नहीं सुधर पाया। हनुमनथप्पा बी, नारायण स्वामी, बीके हरिप्रसाद, मोहन प्रकाश और अब दीपक बाबरिया कांग्रेस हाईकमान के प्रतिनिधि के तौर पर प्रदेश प्रभारी की भूमिका निभाते रहे। इस दौरान अध्यक्ष के तौर पर सुभाष यादव, सुरेश पचौरी, कांतिलाल भूरिया और अरुण यादव जैसे नेताओं को मध्यप्रदेश में कांग्रेस की कमान सौंपी गई तो विधानसभा के अंदर जमुना देवी, अजय सिंह, सत्यदेव कटारे के बाद एक बार फिर अजय सिंह नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभा रहे हैं। एक ऐसा भी दौर आया जब उपनेता के तौर पर चौधरी राकेश सिंह से लेकर बाला बच्चन के हाथ में अस्थाई तौर पर ही सही सदन के अंदर नेतृत्व मौजूद था। विधानसभा में पिछले तीन चुनाव में कांग्रेस की सीट का ग्राफ ऊपर-नीचे होता रहा लेकिन भाजपा पर दबाव बनाने में वह सफल नहीं हो पाई। लोकसभा में यदि कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया और कांतिलाल भूरिया को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश सीटों पर पिछले तीन चुनाव में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। इस दौरान ज्यादातर समय दिल्ली में सोनिया गांधी का दबदबा बरकरार रहा। तो केंद्र में मनमोहन सरकार ने भी 10 साल गुजारे लेकिन मध्यप्रदेश में लगातार जीत की हैट्रिक बनाने से वह भाजपा को नहीं रोक पाई। कांग्रेस के अंदर बदलाव से ज्यादा बिखराव देखने को मिला तो चाहकर भी दिल्ली का दखल और भरोसा मध्यप्रदेश में कांग्रेस के कायाकल्प का सहयोगी नहीं बन सका। पिछले तीन चुनाव में बसपा, सपा, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के अलावा 2008 में भारतीय जनशक्ति ने भी मैदान में अपनी मौजूदगी दर्ज कराकर कांग्रेस को ज्यादा नुकसान पहुंचाया। विधानसभा से लेकर लोकसभा के परफॉर्मेंस और सीट पर वोट प्रतिशत का ग्राफ निकाय चुनाव में भी देखने को मिला जहां भाजपा उस पर भारी साबित होती रही। भाजपा ने न सिर्फ कांग्रेस के सत्ता में रहते चुनाव जीता बल्कि  खुद सरकार में रहते एंटी इनकंबेंसी पर विराम लगा कर अभी तक लगातार दो विधानसभा के चुनाव जीते। इन तीन चुनाव में भाजपा को कांग्रेस की जिन कमजोरियों का फायदा मिला उसकी पार्टी के नेताओं ने उसे दूर करने में जितनी दिलचस्पी लेना चाहिए वह नहीं ली। चाहे फिर वह पार्टी के अंदर नेतृत्व का संकट हो या फिर जिताऊ उम्मीदवार को प्राथमिकता देते हुए टिकट चयन में मतभेद ही क्यों न हो। पर्दे के पीछे एक-दूसरे की जड़ों में मट्ठा डालने की कोशिश, दिल्ली और प्रदेश के नेताओं के बीच अनबन, समन्वय का अभाव, प्रदेश प्रभारी का तटस्थ होकर हाईकमान को सही फीडबैक पहुंचाने की बजाय खुद पार्टी बन जाना। यही नहीं सोनिया गांधी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते केंद्रीय नेतृत्व ने मध्यप्रदेश को कभी अपनी प्राथमिकताओं में शामिल नहीं रखा। कुछ नेता यह कहकर पार्टी छोड़ कर चले गए कार्यकर्ताओं ही नहीं नेताओं की पहुंच से बाहर हो गए सोनिया गांधी और राहुल गांधी ।कांग्रेस की दुर्दशा में उनके जिम्मेदार नेताओं के विवादित बयानों ने भी बड़ी भूमिका निभाई। नेता मजबूरी के चलते एक मंच पर नजर आए लेकिन विपक्ष में रहते मध्यप्रदेश में पिछले 14 साल में कांग्रेस कोई बड़ा आंदोलन नहीं कर पाई। जब भी कोई नेता चाहे वह नेता प्रतिपक्ष, प्रदेश अध्यक्ष यदि जनता के बीच जाने के लिए यात्रा पर निकले तो उसकी टांग खींच दी गई। चर्चा तो इस बात की भी रही है कि कांग्रेस के कुछ विधायक और बड़े नेताओं के कारोबार ने उन्हें आक्रामक मुखर नहीं होने दिया। व्यक्तिगत तौर पर कुछ नेताओं के बीच मानहानि के प्रकरण भी कोर्ट-कचहरी तक जा पहुंचे लेकिन कांग्रेस व्यापम के मुद्दे को छोड़ दिया जाए तो कभी एकजुट नजर नहीं आई। तो कह सकते हैं कि पिछले 14 साल में उसे भाजपा के खिलाफ जिस एकजुटता और किसी स्वीकार्य चेहरे को लेकर मोर्चाबंदी असरदार साबित करना चाहिए थी वह सामने नहीं आई। जिम्मेदार पदों पर बैठे नेता विज्ञप्ति और बयान तक सीमित होकर रह गए। सदन के अंदर उस की रणनीति कई बार फेल हुई तो सड़क पर वह जनता का भरोसा नहीं जीत पाई। कांग्रेस की पूंजी उसकी सफल सोशल इंजीनियरिंग को यदि भाजपा ने फेल किया तो वजह कांग्रेस के नेताओं के ध्वस्त होते जातीय समीकरण भी रहे। सबसे बड़ी बात यह है कि विपक्ष में रहते उसके पास जीवंत मुद्दों का कभी अभाव नहीं रहा लेकिन वह किसी एक मुद्दे पर अडिग रहकर उसे अंजाम तक नहीं पहुंचा पाई। यही कारण है कि शिवराज सरकार की उपलब्धियां और उनके मुख्यमंत्री की संवेदनशीलता और विनम्रता कांग्रेस पर भारी साबित होती रही। कांग्रेस की रणनीति कभी कारगर सिद्ध नहीं हुई। उसे पता ही नहीं चला और एन टाइम पर उसके अपने रणनीतिकार और बड़े नेता दामन झटक कर भाजपा की गोद में बैठ गए। सदन के अंदर या फिर संगठन की बैठकों में कांग्रेस के रणनीतिकार, नेताओं-कार्यकर्ताओं के बीच उनके अपने दिग्गज नेताओं और क्षत्रपों के बीच तकरार भी इसका एक कारण बनी। विपक्ष में रहते कांग्रेस को अभी तक जिस तरह कार्यकर्ताओं को एकजुट, अपने संगठन को प्रभावी और असरदार साबित करना चाहिए उसका अभाव अभी भी नजर आता है। पीढ़ी परिवर्तन के दौर में जब कमान धीरे-धीरे राहुल गांधी के हाथ में जा रही थी तब उम्रदराज और लंबे समय से बड़े नेताओं का तमगा लगाकर घूम रहे मध्यप्रदेश के दिग्गजों को यह जरूर समझ में आ गया कि अबकी बार यदि चूक गए तो फिर सिर्फ उनको ही घर नहीं बैठना होगा, बल्कि मोदी और शिवराज के मध्यप्रदेश को कांग्रेस मुक्त सपने की सच्चाई भी सामने देखने को मिल सकती है। कांग्रेस यह समझने को मजबूर हो चुकी है कि विपक्ष की भूमिका यदि उसने अब प्रभावी तरीके से नहीं निभाई तो विकल्प की तलाश में कोई तीसरा दल या गठबंधन भाजपा के सामने खड़ा नजर आ सकता है और कांग्रेस आने वाले समय में उत्तर प्रदेश की तरह हाशिए पर जाने को मजबूर होगी। ऐसा नहीं है कि प्रबंधन के इस दौर में कांग्रेस की समस्याएं कम हो गई हैं उसके पास आर्थिक तौर पर मजबूत नेता यदि मौजूद हैं जो चमत्कारी व्यक्तित्व के युवा नेताओं की भी फौज है लेकिन पुरानी और नई पीढ़ी के बीच तालमेल का अभाव और सहमति नजर नहीं आना भाजपा को फायदा पहुंचाती थी। प्रदेश कांग्रेस के नए प्रभारी दीपक बाबरिया अब मध्यप्रदेश में कार्यकर्ताओं की टीम नए सिरे से तैयार कर संगठन को मजबूत करने की मंशा पर काम जरूर कर रहे हैं लेकिन सस्पेंस अभी भी कांग्रेस के फार्मूले और चेहरे को लेकर बरकरार है। कांग्रेस को यदि विपक्ष की भूमिका में रहते सत्ता वापसी का ख्वाब देखना है तो उसे किसी ब्लू प्रिंट और रोडमैप के साथ अगले 15 साल के मध्यप्रदेश की बात तर्क और तथ्यों के साथ करना होगी। शिवराज भाजपा का स्वीकार्य चेहरा है इसलिए कांग्रेस पर भी किसी एक चेहरे को प्रोजेक्ट करने का दबाव बढ़ता जा रहा है। कमलनाथ और राहुल गांधी एक दूसरे की पीठ थपथपाकर उन्हें मिशन 2018 को लेकर बड़ी भूमिका में सामने रखते हैं, लेकिन यदि हाईकमान किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा तो समझा जा सकता है कि सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है। दिल्ली के तीन दिग्गजों में से एक दिग्विजय सिंह 6 माह के लिए यदि नर्मदा यात्रा पर निकल गए हैं तो उसके सियासी करण को भी समझा जाना चाहिए ।और यदि मध्यप्रदेश में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह और अरुण यादव की जोड़ी बरकरार है तो कांग्रेस की मजबूरी भी समझ में आ जाती है। कांग्रेस के सामने बड़ा संकट राहुल गांधी की ताजपोशी के बाद सामने आने वाला है वह पीढ़ी परिवर्तन के दौर में अनुभवी और युवा नए नेतृत्व के बीच संतुलन बनाना होगा। यही नहीं विधानसभा चुनाव से लेकर लोकसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस में टिकट के क्राइटेरिया को लेकर भी बवाल मच सकता है ।सबसे बड़ा संकट कांग्रेस में चेहरे का भाव जो उसे भाजपा और शिवराज के मुकाबले कई कदम पीछे मोड़ देता है। तो पिछले तीन विधानसभा चुनाव में इस प्रयोगधर्मी कांग्रेस को एक ऐसे नेता की दरकार जरूर रहेगी जो शिवराज और उनकी सरकार के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी को हवा दे सके। यही नहीं एक ऐसे मैनेजर और मैनेजमेंट गुरु की भी आवश्यकता महसूस होगी जो प्रबंधन के मोर्चे पर कांग्रेस को फ्रंट फुट पर खडा दिखाएं। तो कांग्रेस के लिए जितना जरूरी एक स्वीकार्य,जुझारू नेता है उससे ज्यादा पार्टी की नियत और हाईकमान की गलतियों से सीख ले कर नीतियां भी जरूरी है।

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failaan Bhopal