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स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को पहली तिमाही में अनुमान से उलट 4,876 करोड़ का घाटा

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नई दिल्ली
स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) को अप्रैल-जून तिमाही में 4,875.85 करोड़ रुपये का चौंकानेवाला घाटा हुआ है। हैरत की बात यह है कि ईटी नाउ के पोल में ऐनालिस्ट्स ने एसबीआई को जून तिमाही में 242 करोड़ रुपये के मुनाफे का अनुमान जताया था। लेकिन, बैंक ने इसके उलट लगातार तीसरी तिमाही नुकसान दर्ज किया।

तब पहली बार हुआ था घाटा
देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक ने पिछले वित्त वर्ष की आखिरी तिमाही में 7,718.17 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था जबकि एक वर्ष पहले इसी तिमाही में यानी जनवरी-मार्च 2017 के दौरान उसे 2,005.53 करोड़ रुपये का लाभ हुआ था। वित्त वर्ष 2018 की दिसंबर तिमाही में बैंक को 2,416.40 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था। एसबीआई को यह घाटा पहली बार हुआ था।

ब्याज से कमाई बढ़ी
जून तिमाही में एसबीआई को 21,798 करोड़ रुपये का नेट इंट्रेस्ट इनकम (ब्याज शुद्ध आय) हुआ जो एक साल पहले इसी तिमाही में17,606 करोड़ रुपये रहा था। ईटी नाउ के पोल में इसके 20,426 करोड़ रुपये ही रहने का अनुमान लगाया गया था। अप्रैल-जून के दौरान बैंक को को 7.1 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 58,813.18 करोड़ रुपये रहा जो पिछले साल इसी तिमाही में 54,905.40 करोड़ रुपये रहा था।

प्रविजनिंग का असर
जून क्वॉर्टर के लिए बैंक ने 19,228.26 करोड़ रुपये की प्रविजनिंग की जो मार्च तिमाही के लिए 28,096.07 करोड़ और एक वर्ष पहले की इसी तिमाही में 8,929.48 करोड़ रुपये की थी। वहीं, ग्रॉस नॉन-परफॉर्मिंग ऐसेट्स (सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां) घटकर कुल दिए कर्ज का 10.69 प्रतिशत पर आ गईं जो मार्च तिमाही में 10.91 प्रतिशत और पिछले वित्त वर्ष की जून तिमाही में 9.97 प्रतिशत थीं। वहीं, नेट नॉन-परफॉर्मिंग ऐसेटे्स की बात करें तो जून तिमाही में यह घटकर 5.29 प्रतिशत पर आ गईं जो मार्च तिमाही में 5.73 प्रतिशत जबकि पिछले वित्त वर्ष की जून तिमाही में 5.97 प्रतिशत थी।

कानूनी सलाह पर खर्च
बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) को दी गई जानकारी में एसबीआई ने बताया कि उसने 1 नवंबर 2017 से लागू नई सैलरी के तहत बकाया रकम के लिए 30 जून 2018 तक 2,655.40 करोड़ रुपये की प्रविजनिंग की थी जो मार्च 1,659.41 करोड़ रुपये थी। नैशनल कंपनी लॉ ट्राइब्यूनल (एनसीएलटी) की ओर से रेजॉलुशन प्लान को हरी झंडी मिलने पर बैंक ने एक केस पर अप्रैल-जून 2018 के दौरान कानूनी सलाह के लिए 1,952.94 करोड़ रुपये खर्च किए।