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कर्नाटक चुनाव: आक्रामक बयानों के बावजूद कांग्रेस-भाजपा में घबराहट भी

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नई दिल्ली: कर्नाटक विधानसभा चुनाव का प्रचार रुकते ही बाहरी शोर बंद और अंदरूनी विचार-मंथन शुरू हो गया है। ज्यादातर विशेषज्ञों का अनुमान है कि त्रिशंकु विधानसभा के आसार हैं। पर खामोशी के ठीक पहले अमित शाह के इस दावे को भी वे हल्के में नहीं ले रहे हैं कि हम 130 से ज्यादा सीटें जीतेंगे। राहुल गांधी भी दावा करके गए हैं कि हम गुजरात में जीत के करीब आ गए थे, पर कर्नाटक में जीतेंगे। बहरहाल फैसला अनिर्णीत रहा तो सवाल है कि उसे कौन अपने पक्ष में भुनाएगा? कर्नाटक के कई सवाल हैं। इनके जवाबों में आश्चर्यजनक परिणाम छिपे हैं।
आक्रामक बयानों के बावजूद दोनों खेमों में घबराहट भी है। कर्नाटक में 1985 के बाद से सत्तारूढ़ दल को दुबारा जिताने का चलन नहीं है। पिछले दो चुनाव से फैसला एकतरफा होता रहा है। पिछले विधानसभा चुनाव में येदुरप्पा के भाजपा से अलग हो जाने के कारण मुकाबला चतुष्कोणीय था। पर उसके एक साल बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में कहानी बदली।

77 क्षेत्रों तक ही सिमट गई कांग्रेस
येदुरप्पा की वापसी के बाद भाजपा का वोट प्रतिशत 43 फीसदी हो गया और उसे 132 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त मिली। कांग्रेस 77 क्षेत्रों तक सिमट गई। बेशक अब 2014 का माहौल नहीं है। पर वह बदला है तो कितना? सिद्धारमैया के नेतृत्व में कांग्रेस ने सारे घोड़े रखे हैं। लोक-लुभावन योजनाओं की झड़ी लगी है। पर कांग्रेस का वोट कितना बढ़ेगा? और यह भी कि 2014 के मुकाबले बीजेपी के वोट प्रतिशत में गिरावट आएगी तो कितनी? पर सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है एक-एक चुनाव क्षेत्र का गणित। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश और गुजरात के नतीजों में आश्चर्य भरी बातें भी थीं। दोनों राज्यों के परिणामों ने विशेषज्ञों के अनुमानों को गलत साबित किया था।

चुनाव के शुरुआती दौर में बैकफुट पर थी बीजेपी
गुजरात में बीजेपी ने पाटीदारों और जीएसटी ने चुनाव को उतना प्रभावित नहीं किया, जितना किसानों की नाराजगी ने प्रभावित किया। कर्नाटक में भी किसान परेशान हैं। यहां अमित शाह ने कहा है कि हमारी यहां अमित शाह ने कहा है कि हमारी सरकार पहले दस दिन में किसानों के एक लाख के कर्ज माफ करेगी। यह संदेश गांव-गांव तक गया है। चुनाव के शुरुआती दौर में बीजेपी बैकफुट पर थी, पर प्रचार के आखिरी हफ्ते में नरेन्द्र मोदी की रैलियों ने माहौल बदला है। मोदी कहकर गए हैं कि इस चुनाव के बाद कांग्रेस च्पीपीपी पार्टी रह जाएगी। बीजेपी के चुनाव दस्ते बूथ-स्तर तक संगठित हैं। साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण भी है। दक्षिण, पश्चिम और उत्तर कर्नाटक की जमीन पर यह ध्रुवीकरण साफ है, जहां च्लव जेहाद राजनीतिक मसला बन गया है। लिंगायत कार्ड का इस चुनाव पर असर होगा, उल्टा या सीधा। कांग्रेस च्हिन्दू-छविज् को लेकर भी संवेदनशील है। राहुल गांधी ने कर्नाटक के मंदिरों और मठों की यात्राएं की हैं। पूरे देश में मोदी के नेतृत्व के सामने मजबूती से खड़े नेताओं में सिद्धरमैया ने अलग पहचान बनाई है। पर वे खुद अपने चुनाव को लेकर आश्वस्त नहीं हैं। वे चामुंडेश्वरी और बादामी दो सीटों से चुनाव लड़ रहे हैं।

कुछ जगहों पर आश्चर्यजनक नतीजे देगी जेडीएस
अमित शाह की रणनीति के कारण वे दोनों सीटों पर घिरे हुए हैं। अंतिम क्षणों में उन्होंने चामुंडेश्वरी चुनाव से हट जाने की घोषणा भी कर दी। यह नकारात्मक घोषणा उनपर भारी पड़ेगी। बीजेपी और कांग्रेस पर सबका ध्यान है, एचडी देवेगौडा की पार्टी जेडीएस पर नहीं। जेडीएस कुछ जगहों पर आश्चर्यजनक नतीजे देगी। उसका बसपा के साथ गठबंधन है। यह एक नई परिघटना है। राज्य के 13-14 फीसदी मुसलमान वोटरों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी। चुनाव-पूर्व सर्वेक्षण अक्सर गलत साबित होते हैं। एक्जिट पोल बेहतर तस्वीर पेश करेंगे। इस लिहाज से 12 मई की रात तस्वीर कुछ साफ होगी। कर्नाटक की हवाएं दक्षिण के पांचों राज्यों में जाती हैं। इस चुनाव का असर साल के अंत में होने वाले उत्तर भारत के तीन राज्यों के चुनाव पर पड़ेगा। वस्तुत: 2019 के चुनाव का काउंटडाउन शुरू हो गया है।