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गलतफहमी में हैं विराट और शास्त्री की जोड़ी, यह नहीं है विदेशों में सर्वश्रेष्ठ टीम

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अगर भारत और इंग्लैंड सीरीज की बात की जाए तो इस पूरे दौरे में लगभग हर हार और एक जीत के बाद भारतीय टीम के कोच रवि शास्त्री यह कहने से नहीं चूके कि यह वर्तमान समय में विदेशी दौरे करने वाली सर्वश्रेष्ठ टीम (बेस्ट टूरिंग टीम) है। पांचवें टेस्ट से पहले उन्होंने यह तक कहा कि पिछले 10-15 वर्षो में विदेश जाने वाली यह भारत की ‘सर्वश्रेष्ठ टूरिंग टीम’ है।

भारतीय कप्तान विराट कोहली ने कहा कि हमें स्कोर बोर्ड से टीम का आकलन नहीं करना चाहिए। हमने इंग्लैंड को कड़ी चुनौती दी। उन्होंने पांच मैचों की सीरीज 1-4 से हारने के बाद कहा कि मैंने देखा है कि अगर कोई दूसरी टीम होती तो आसानी से मैच छोड़ देती, लेकिन इस टीम ने ऐसा नहीं किया। विराट और शास्त्री को यह समझना होगा कि वह अफगानिस्तान या केन्या की टीम का नेतृत्व नहीं कर रहे हैं। वह दुनिया की नंबर वन टीम का नेतृत्व कर रहे हैं और उनसे इस तरह के बहानों की अपेक्षा नहीं की जाती है। भारतीय टीम इंग्लैंड के खिलाफ वनडे सीरीज भी 1-2 से हारी थी। उसने टी-20 सीरीज 2-1 से जीती थी।

तथ्य साथ नहीं

हालांकि, तथ्य कोच की बातों से मेल नहीं खाते। सौरव गांगुली की अगुआई में भारत ने इंग्लैंड (2002) और ऑस्ट्रेलिया (2003-04) में सीरीज ड्रॉ करवाई और वेस्टइंडीज में टीम टेस्ट मैच और पाकिस्तान में सीरीज जीतने में सफल रही। राहुल द्रविड़ के नेतृत्व में भारत ने वेस्टइंडीज में 2006 और इंग्लैंड में 2007 में सीरीज जीती व दक्षिण अफ्रीका में भी टीम एक टेस्ट जीतने में सफल रही।

अनिल कुंबले की अगुआई में भारत ने पर्थ के उछाल भरे विकेट पर पहली बार टेस्ट जीता, जबकि महेंद्र सिंह धौनी के नेतृत्व में भारत ने न्यूजीलैंड में सीरीज जीती और पहली बार दक्षिण अफ्रीका में सीरीज ड्रॉ कराने में सफल रही। विराट की कप्तानी में दक्षिण अफ्रीका और इंग्लैंड में लगातार दो सीरीज गंवाने के बाद विदेशी दौरे पर अच्छा प्रदर्शन करने वाली टीम का मिथक टूट गया है और टीम इंडिया यह साबित करने में नाकाम रही है कि वह उपमहाद्वीप के बाहर सीरीज जीतने में सक्षम है।

शास्त्री पर सवाल

जो भी टीम को करीब से जानते हैं उन्हें पता है कि इस समय टीम को कौन चला रहा है और बाकी लोगों की क्या हालत है? अनिल कुंबले को हटाकर रवि शास्त्री को 2019 विश्व कप तक टीम इंडिया का कोच बनाया गया। उनके आने के बाद टीम घरेलू टेस्ट सीरीज तो जीती, लेकिन विदेश में हाल बेहद बुरा हो गया। घरेलू सीरीज में तो टीम अनिल कुंबले के समय भी जीत रही थी, बल्कि उनके समय तो विदेश में कम हार मिलीं। शास्त्री के कोच रहते हुए दक्षिण अफ्रीका में 1-2 से और यहां 1-4 से सीरीज हारे।

सबसे बड़ी बात यह है कि जो गलतियां दक्षिण अफ्रीका में की गई वही इंग्लैंड में हुई। भारतीय टीम के कहने पर दक्षिण अफ्रीका में टेस्ट सीरीज से पहले अभ्यास मैच नहीं हुआ। पहले टेस्ट से एक दिन पहले वैकल्पिक अभ्यास रखा गया, जिसमें एक भी खिलाड़ी अभ्यास करने नहीं आया। नतीजा आपके सामने आ चुका है। टीम में लगातार बदलाव किए गए।

दक्षिण अफ्रीका में शुरुआती दो टेस्ट में उप कप्तान अजिंक्य रहाणे को बाहर कर दिया गया तो इंग्लैंड में पहले टेस्ट में चेतेश्वर पुजारा को बाहर का रास्ता दिखाया गया। इससे सीनियर खिलाडि़यों के अंदर यह भावना आ गई है कि उन्हें कभी भी बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है और यही कारण है कि उनका प्रदर्शन दिन पर दिन खराब होता जा रहा है। निश्चित तौर पर शास्त्री की भूमिका पर फिर विचार करने की जरूरत है। शास्त्री ने दक्षिण अफ्रीकी दौरे में हार के बाद कहा था कि इस सीरीज से इंग्लैंड में अच्छा प्रदर्शन करने में मदद मिलेगी, लेकिन यहां तो हाल उससे भी बुरा हुआ।

विराट पर सवाल

भारतीय कप्तान विराट कोहली का निजी प्रदर्शन लाजवाब है। इसमें किसी को कोई शक नहीं होना चाहिए। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में भी सबसे ज्यादा रन बनाए और इंग्लैंड में भी सबसे ज्यादा 593 रन बनाए, लेकिन उनकी कप्तानी और फैसलों पर ध्यान देने की जरूरत है। निश्चित तौर पर टीम में लगातार बदलाव और हारने के लिए वह भी बराबर के जिम्मेदार हैं। यही नहीं, डीआरएस लेने में उनका सबसे खराब रिकॉर्ड है। वह भावना में बहकर रिव्यू लेते हैं और पांचवें टेस्ट में इंग्लैंड की दूसरी पारी के दौरान उन्होंने 12 ओवर के अंदर ही दोनों रिव्यू खराब कर दिए। इसके बाद जब टीम को जरूरत थी तब उसके पास रिव्यू बचा ही नहीं। भारत को इस साल ऑस्ट्रेलिया का दौरा करना है और यही हालात रहे तो उसका वहां जीतने का सपना भी चूर हो सकता है।

सीओए पर सवाल

इस समय बीसीसीआइ को सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त प्रशासकों की समिति (सीओए) चला रही है। विनोद राय के नेतृत्व वाली समिति ने दक्षिण अफ्रीका में मिली हार के बाद भी समीक्षा करने की बात कही थी और इंग्लैंड में हार के बाद भी उसकी तरफ से यही कहा गया। हालांकि, अगर समीक्षा हुई होती तो इंग्लैंड में भारतीय टीम की यह दुर्दशा नहीं होती। साफ है कि सीओए विदेशी दौरों पर टीम के बेहतर प्रदर्शन को लेकर कदम उठाने में असफल साबित हुआ है।

अच्छा मौका गंवाया

भारतीय टीम के पास इंग्लैंड में सीरीज जीतने का अच्छा मौका था। उसकी गेंदबाजी अब तक के सर्वश्रेष्ठ आक्रमण में से एक थी, लेकिन उसके बल्लेबाज और क्षेत्ररक्षकों ने सब मटियामेट कर दिया। विराट कोहली के अलावा कोई बल्लेबाज लगातार दो पारियों में रन बनाने में असमर्थ रहा। इसमें कोई शक नहीं इस टीम की गेंदबाजी बेहतरीन है और उसने कई बार विपक्षी टीम को ऑलआउट किया, लेकिन बल्लेबाजी ने हमें शर्मिदा किया। पांच मैचों की सीरीज के आखिरी मुकाबले की आखिरी पारी में भारत का कोई ओपनर (केएल राहुल) 50 या उससे ज्यादा रनों की पारी खेल सका।

तीसरे टेस्ट को छोड़ दिया जाए तो किसी मैच में ओपनिंग जोड़ी नई गेंद को ढंग से नहीं खेल पाई, जिसका दबाव बाकी बल्लेबाजों पर पड़ा। जब भारतीय टीम इंग्लैंड का दौरा करने आई तो मेजबान टीम समस्याओं से जूझ रही थी। उसके पास स्पिनर नहीं था। उसके ओपनर रन नहीं बना रहे थे, लेकिन जब सीरीज खत्म हुई तो वह चार टेस्ट जीतने के बाद सीना ताने खड़ी थी और वहीं नंबर वन टीम के टैग के साथ यहां पहुंचे मेहमान सिर झुकाकर वापस जा रहे हैं।

बहाने नहीं समीक्षा की जरूरत

दो कप्तानों में क्या अंतर होता है यह पांचवें टेस्ट के बाद हुई प्रेस कांफ्रेंस से पता चलता है। सीरीज जीतने वाले इंग्लिश कप्तान जो रूट ने मैच के बाद एक इंग्लिश पत्रकार को अपनी टीम की तरफ से पैड गिफ्ट किए। यह उस पत्रकार का आखिरी टेस्ट था। यहीं नहीं, रूट ने कहा कि मुझे उम्मीद है कि आप मुझसे कठिन सवाल पूछते रहेंगे। रूट ने कहा कि इस सीरीज को जीतने के बावजूद हमारी टीम में कई कमियां हैं जिसे सुधारने की दरकार है। हम सर्वश्रेष्ठ नहीं हैं। वहीं, 1-4 से सीरीज हारने वाले भारतीय कप्तान पत्रकार के सवाल पर उनसे ही तकरार करने लगे। वह अपनी गलतियों की समीक्षा करने की जगह अपनी टीम को किसी ना किसी तरह से सर्वश्रेष्ठ बताने से नहीं चूके।