चीखते सवाल

चार साल में भी नहीं बन पाया वाराणसी का खूनी फ्लाईओवर

Varanasi's bloody flyover

वाराणसी/ लखनऊ : इसे सरकारी तंत्र की विफलता न कहा जा तो और कहा जाए? जिस जनता की सहूलियतों के लिए फ्लाइओवर बनाया जाना था, उसी ने वाराणसी में मंगलवार को कई लोगों की जान ले ली और वह खूनी फ्लाइओवर बन गया. इस प्रस्तावित फ्लाइओवर का निर्माण चार साल में भी पूरा नहीं हो पाया है. जिसका खामियाजा लोगों को अपनी जान देकर उठाना पड़ा.

पिछले चार साल से कैंट रेलवे स्टेशन के सामने से चौकाघाट-लहरतारा फ्लाइओवर विस्तारीकरण निर्माण हो रहा है. मार्च 2015 को इसकी स्वीकृति मिली तो अक्तूबर 2015 में इसको बनाने का काम शुरू हुआ. पहले इस कार्य की जिम्मेदारी सेतु निगम की वाराणसी इकाई को दी गयी थी, लेकिन बाद में कार्य की गति धीमी होने के कारण तत्कालीन सपा सरकार के राज्यमंत्री सुरेंद्र सिंह के आदेश पर गाजीपुर इकाई को पुल निर्माण की जिम्मेदारी दी गयी. इसके बाद भी कार्य की गति तेज नहीं हुई, क्योंकि सर्विस लेन पर कई प्रकार की बाधाएं थीं. इसमें मंदिर व पेड़ के साथ हैवी ट्रैफिक भी प्रमुख था.

सेतु निगम की ओर से कई बार जिला प्रशासन को इससे अवगत कराया गया था. जिसके बाद मंदिर व पेड़ तो हटा दिए गए, लेकिन रूट डायवर्जन नहीं किया गया. इसका नतीजा था कि जो कार्य मार्च 2017 में समाप्त हो जाने चाहिए थे वह पूरा नहीं हो सका. वहीं, ट्रैफिक डायवर्जन की अनदेखी शुरू से की गयी.

कमिश्नर ने भी बैठक में कैंट के पास हैवी ट्रैफिक को डायवर्ट करने का आदेश दिया, लेकिन उनका आदेश भी कारगर नहीं हुआ और हादसा हो गया. प्रदेश में भाजपा सरकार बनते ही विकास कार्यो को गति देने के लिए नए सिरे से टाइम लाइन तय की गयी. इसका फ्लाइओवर को जून 2018 तक बन जाना था और काम में तेजी के लिए अभियान चलाकर तीन शिफ्ट में कार्य कराने का आदेश मिला, जिसके लिए अतिरिक्त श्रमिकों और मशीनों को लगाकर निर्धारित समय तक मानसून से पहले प्रत्येक दशा में कार्य कराना था, लेकिन नतीजा सिफर रहा और यह हादसा हो गया.